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This Article is From Jan 03, 2020

गहलोत सरकार का फ़ोकस BJP पर निशाना साधने में ही है, अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में कम है

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 03, 2020 12:37 pm IST
    • Published On जनवरी 03, 2020 12:23 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 03, 2020 12:37 pm IST

ऐसा लगता है कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार का फ़ोकस बीजेपी पर निशाना साधने में ही है. अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में कम है. कोटा के जे के लोन अस्पताल का मामला एक हफ़्ते से पब्लिक में है. इसके बाद भी एक्सप्रेस के रिपोर्टर दीप ने पाया है कि इंटेंसिव यूनिट में खुला डस्टबिन है. उसमें कचरा बाहर तक छलक रहा है. क़ायदे से तो दूसरे दिन वहां की सारी व्यवस्था ठीक हो जानी चाहिए थी. लेकिन मीडिया रिपोर्ट से पता चल रहा है कि वहां गंदगी से लेकर ख़राब उपकरणों की स्थिति जस की तस है. जबकि मुख्यमंत्री की बनाई कमेटी ही लौट कर ये सब बता रही है. सवाल है कि क्या एक सरकार एक हफ़्ते के भीतर इन चीजों को ठीक नहीं कर सकती थी?

गहलोत सरकार को अब तक राज्य के दूसरे अस्पतालों की समीक्षा भी करा लेनी चाहिए थी. वहां की साफ़ सफ़ाई से लेकर उपकरणों के हाल से तो पता चलता कि राज्य के पैसे से क़ौन मोटा हो रहा है. आख़िर दिल्ली से हर्षवर्धन को आने की चुनौती दे रहे हैं तो सिर्फ़ आंकड़ों के लिए क्यों? क्यों नहीं इसी बहाने चीजें ठीक की जा रही हैं? मुख्यमंत्री भरोसा पैदा करने के लिए अस्पताल में सुधार की तस्वीरें ट्विट कर सकते थे मगर नहीं.

हर्षवर्धन की राजनीतिक सुविधा के लिए जो आंकड़े दिए जा रहे हैं उससे कांग्रेस बनाम बीजेपी की राजनीति ही चमक सकती है, ग़रीब मां-बाप को क्या फ़ायदा.

इसलिए नागरिकों को कांग्रेस बनाम बीजेपी से ऊपर उठकर इन सवालों पर सोचना चाहिए. ऊपर उठने का यह मतलब नहीं कि अभी जो मुख्यमंत्री के पद पर हैं वो जवाबदेही से हट जाएगा बल्कि यह समझने के लिए आप कांग्रेस बीजेपी से ऊपर उठ कर देखिए कि स्वास्थ्य के मामले में दोनों का ट्रैक रिकार्ड कितना ख़राब है. काश दोनों के बीच इसे अच्छा बनाने की प्रतियोगिता होती लेकिन तमाम सक्रियता इस बात को लेकर दिखती है कि बयानबाज़ी का मसाला मिल गया है. बच्चे मरे हैं उससे किसी को कुछ लेना देना नहीं.

दीप मुखर्जी ने अपनी रपट में लिखा है कि पहले के वर्षों में भी इस अस्पताल में मौतें होती रही हैं. इसका मतलब है कि सिस्टम जो कल था आज भी वही है. वर्ष 2014 में 1198 मौतें, 2015 में 1260 मौतें, 2016 में 1193 मौतें, 2017 में 1027 मौतें, 2018 में 1005 मौतें और 2019 में अभी तक 963 मौतें हो चुकी है.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

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