विज्ञापन
This Article is From Jan 02, 2020

आईटी सेल वाले कोटा पर लिखा मेरा यह लेख पढ़ लें, प्रधानमंत्री को पढ़ा दें, गहलोत सरकार भी पढ़े

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 02, 2020 19:29 pm IST
    • Published On जनवरी 02, 2020 19:29 pm IST
    • Last Updated On जनवरी 02, 2020 19:29 pm IST

जब सारे देश में प्राथमिक स्वास्थ्य की खस्ता हालत पर लिखता और प्रोग्राम करता हूं तो आईटी सेल का गिरोह कंबल ओढ़ कर सो जाता है. वह तभी जागता है जब किसी अपराध में शामिल कोई मुसलमान दिखता है या फिर भी वो ग़ैर भाजपा सरकार से संबंधित कोई घटना हो. मुझसे पूछता है कि आप चुप क्यों हैं. वह खुद प्रमाण नहीं देता है कि उसने रोज़गार और स्वास्थ्य के किन मसलों को लेकर ट्रेंड कराया है. कब अपने मंत्रियों पर दबाव बनाया है कि इन क्षेत्रों में भी प्रदर्शन ठीक करो? क्योंकि इन्हें ऐसी घटनाओं से सिर्फ इतना ही लेना-देना है कि किसी भी हाल में सांप्रदायिकता की लौ जलती रहे ताकि नौजवानों और अन्य लोगों को बेवकूफ बनाया जा सके.

राजस्थान के कोटा के जेके लोन अस्पताल में एक महीने के भीतर 99 से अधिक बच्चों की मौत हो गई है. पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार 25 दिसंबर के बाद सात दिनों के भीतर 22 बच्चों की मौत हुई. नवंबर में भी 101 बच्चों की मौत हुई है. लेकिन तब क्यों नहीं किसी को पता चला? क्योंकि इन अस्पतालों के डेटा का कोई सिस्टम नहीं है. सारा सिस्टम इस देश में इसमें लगा हुआ है कि स्मार्ट फोन से कैसे डेटा लीक किया जाए. न मीडिया को, न राजनीतिक दलों को या राज्य सरकार को. भास्कर ने लिखा है कि सिस्टम की कमी के कारण इस अस्पताल में हर साल 800 नवजात बच्चे 29वां दिन नहीं देख पाते हैं. इस अस्पताल में हर साल 15000 डिलिवरी होती है. यह भयानक है. अगर कोई सरकार एक अस्पताल को ही टारगेट कर इन मौतों को नहीं रोक सकती है तो फिर स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक का ख़र्चा जनता ही क्यों उठाए.

क्या यह शर्मनाक नहीं है? बिल्कुल है. टाइम्स आफ इंडिया ने अपने संपादकीय में लिखा है कि NCPCR (NATIONAL COMMISSION FOR PROTECTION OF CHILD RIGHTS) ने वहां जाकर देखा है कि अस्पताल की खिड़कियां टूटी हुई हैं. दरवाज़े टूटे पड़े हैं. अस्पताल में सूअर घूम रहे हैं. नवजात बच्चों पर मौसम की मार भी गहरी पड़ रही है. वेंटिलेटर काम नहीं कर रहे हैं. 19 में से 13 वेंटिलेटर, 111 इंफ्यूज़न पंप में से 81 पंप काम नहीं कर रहे हैं. 71 वार्मर में से 44 वार्मर काम नहीं कर रहे हैं. इसका मतलब है कि वह अस्पताल काम करने लायक नहीं था फिर भी काम कर रहा था. उसे बंद हो जाना चाहिए था या फिर इन सब चीज़ों को दुरुस्त करने के साथ साथ चलना चाहिए था. अगर मशीनों का यह हाल है तो मौत के कई कारणों में से एक संक्रमण की ज़िम्मेदारी सीधे सरकार पर जाती है, लेकिन मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा कि होता रहता है. यह शर्मनाक तो है ही इस बयान का एक मतलब यह भी है कि सबको पता है कि बच्चों की मौत हर दिन होते रहती है.

बेशक मौत के अलग अलग कारण हो सकते हैं लेकिन अस्पताल के खस्ताहाल होने का एक ही कारण हो सकता है. बजट की कमी और सरकार की उपेक्षा. अब आप पूछ सकते हैं कि जब गोरखपुर के अस्पताल में बच्चों की मौत हो रही थी तो आईटी सेल के लोग किस तरफ खड़े थे? अपनी सरकार की लापरवाहियों को बचा रहे थे या बच्चों के माता-पिता के साथ खड़े थे? सिर्फ इतना खुंदक है कि मीडिया ने गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल का केस क्यों उठाया? उन्हें इतना भी पता नहीं है कि जब वहां सपा या मायावती की सरकार थी तब भी हमारे चैनल पर गोरखपुर के उस अस्पताल में इंसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों पर लंबी रिपोर्ट बनती थी. हमारे यहां ही नहीं बल्कि दूसरे अखबारों में भी.

भारत में नवजात शिशु की मृत्यु दर बहुत अधिक है. 2008 से 2015 के बीच 1 करोड़ 11 लाख बच्चे 5 साल से पहले ही दम तोड़ गए. इनमें से 62 लाख बच्चे जन्म के 28 दिनों के भीतर ही दुनिया छोड़कर चले गए. हर साल यह आंकड़ा आता है. आप 99 बच्चों की मौत पर ट्रोल कर रहे हैं लेकिन सोचिए 62 लाख बच्चे पैदा होने के 28 दिनों के भीतर मर जाते हैं. यह कितना भयावह है. 62 लाख मौतें कहां-कहां होती होंगी, क्या कोई राज्य ऐसा है जो बचा होगा? कांग्रेस या भाजपा का? ज़ाहिर है दोनों की सरकारें इस मामले में फेल हैं. क्या नवजात शिशु मृत्यु दर में कुछ भी सुधार नहीं हुआ है? ऐसा नहीं है. हुआ है. 11 साल में 42 प्रतिशत की कमी आई है. 2006 में पैदा होने वाले प्रति 1000 बच्चों में 57 मर जाते थे तो 2017 में मरने वाले बच्चों की संख्या प्रति एक हज़ार पर 33 हो गई. इसके बाद भी यह दुनिया भर में सबसे अधिक है. मध्य प्रदेश, असम, और अरुणाचल प्रदेश में नवजात शिशु मृत्यु दर बहुत अधिक है. यूपी में 1000 बच्चों पर 41 बच्चे मर जाते हैं. इस मामले में नागालैंड, गोवा, केरल, सिक्किम, पुड्डूचेरी और मणिपुर का सबसे अच्छा रिकार्ड है. 11 सालों में सबसे अधिक सुधार दिल्ली और तमिलनाडु ने किया है.

पैदा होने वाले प्रति 1000 बच्चों में 28 दिनों के भीतर मरने वाले बच्चों की संख्या के मामले में भारत से कहीं ज्यादा बेहतर चीन, भूटान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका हैं. पाकिस्तान में तो और भी भयावह है. वहां प्रति 1000 बच्चों में से 90 बच्चे 28 दिनों के भीतर ही मर जाते हैं. यह सारी जानकारी हमने कहां से ली? उसी गूगल से जहां से आईटी सेल वाले ले सकते थे और ट्रेंड कराकर नकारे स्वास्थ्य मंत्रियों पर दबाव बना सकते थे? पर कोई बात नहीं. वो नहीं कर सके तो आप कीजिए. 2 जून 2019 को स्वागत यादवर नामक रिपोर्टर ने इंडिया स्पेंड के लिए पूरी रिपोर्ट तैयार की थी. क्या अब आईटी सेल वाले उस रिपोर्ट को पढ़ेंगे और केंद्र से लेकर राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों को टैग करेंगे? राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का बजट करीब 24000 करोड़ का है. PRS India ने 2018-19 के स्वास्थ्य बजट का एक विश्लेषण किया है. उस लेख में बताया गया है कि देश के सरकारी अस्पतालों में 81 प्रतिशत बाल रोग विशेषज्ञों की कमी है. सोचिए जब डाक्टर ही नहीं होगा तो क्या होल होगा.

यह घटना बताती है कि हम गोरखपुर के बीआर डी अस्पताल में इंसेफ्लाइटिस से हुई बच्चों की मौत से भी सबक नहीं सीखे. सीखे होते तो बिहार के मुज़फ्फरपुर में चमकी बुखार से बच्चों की मौत नहीं होती. कोटा के सरकारी अस्पताल की भी कहानी यही है. क्या यह यहीं रुक जाएगा? ऐसा सोचना दिन में सपने देखने जैसा होगा. सरकारों की प्राथमिकता बदल गई है. नर्सों की बहाली का बुरा हाल है. एंबुलेंस सेवा ठेके पर चलती है. डाक्टर हैं नहीं. सवाल है कि हम सिर्फ कांग्रेस-बीजेपी देख रहे हैं, स्वास्थ्य सेवा नहीं. वर्ना ट्रोल करने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता हाल पर मेरे कई प्रोग्राम का लिंक निकाल कर गोदी मीडिया को बता रहे होते तो अगर सभी मिलकर ऐसे सवाल उठाते तो आज कोटा में 99 बच्चे शायद नहीं मरते. सिर्फ इतना पूछ लीजिए कि हर्षवर्धन के मंत्रालय ने प्राथमिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्या ऐसा काम किया है जिसे उल्लेखनीय माना जाए तो जवाब आते आते 2020 बीत जाएगा. 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति NDTV उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार NDTV के नहीं हैं, तथा NDTV उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे: