क्या उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के लिए आने वाले विधानसभा चुनाव में अखिलेश का चेहरा और काम दोबारा जीत दिला पायेगा? मंगलवार (16 फरवरी) को आये तीन उपचुनावों के नतीजों के बाद सत्तारूढ़ सपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच इस सवाल के जवाब पर चिंता और चिंतन का माहौल है। गत 13 फरवरी को हुए मतदान के बाद आये नतीजों में सपा को केवल एक सीट पर जीत मिली, जबकि एक-एक सीट भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस के खाते में गयी। गौरतलब है कि अभी तक ये तीनों सीटें सपा के पास थीं और तीनों जगह निवर्तमान विधायकों के निधन के बाद उपचुनाव हुए थे।
सपा का तीन में से दो सीटें हारना बड़ा झटका
सपा में ऐसे नतीजे की बिलकुल उम्मीद नहीं थी। तीनों सीटों पर मुकाबला सपा, कांग्रेस और बीजेपी के बीच रहा और बहुजन समाज पार्टी चुनाव मैदान में नहीं थी। तीनों ही जगह मतदान का प्रतिशत कम (45 से 50 प्रतिशत तक) था और प्रचार के दौरान किसी प्रकार के ध्रुवीकरण का माहौल नहीं बन पाया था। जहां बाकी पार्टियां प्रचार और मतदान के दौरान सत्तारूढ़ दल पर सरकारी मशीनरी के बेजा इस्तमाल का आरोप लगा सकती हैं, वहीं सपा के लिए इस तरह के आरोप लगाना भी संभव नहीं है। शायद इसीलिए हार के कारण को सपा के नेता “विभाजन की राजनीति” का नतीजा बता रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। पिछले कुछ समय से अखिलेश सरकार अपने विज्ञापनों और प्रचार में प्रदेश में चल रहीं तमाम योजनाओं का बखान करती आ रही है, ऐसे में तीन में से दो सीटों पर हारना पार्टी के गले नहीं उतर रहा है।
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सहानुभूति वोट भी नहीं मिले
जहां पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दोनों सीटों, मुज़फ्फरनगर और देवबंद (सहारनपुर) पर सपा को अपने भूतपूर्व विधायकों चित्तरंजन स्वरूप और राजेन्द्र सिंह राणा की मृत्यु पर क्षेत्रीय मतदाताओं के सहानुभूति वोट नहीं मिले, वहीं फैजाबाद के बीकापुर में सपा के दिवंगत विधायक मित्रसेन यादव के बेटे आनंदसेन यादव ने जीत हासिल की। बीकापुर में एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने हाल ही में चुनाव प्रचार के दौरान स्पष्ट रूप से दलित-मुस्लिम गठजोड़ का नारा दिया था और उनकी पार्टी ने एक दलित उम्मीदवार प्रदीप कुमार कोरी को प्रत्याशी बनाया था, लेकिन यह चौथे स्थान पर रहे। सपा के आनंद सेन यादव ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय लोकदल के मुन्ना सिंह चौहान को लगभग 7000 वोटों से हराया। यहां बीजेपी से रामकृष्ण तिवारी, कांग्रेस से असद अहमद, पीस पार्टी से अजमुद्दीन भी चुनावी अखाड़े में उतरे थे। जनता दल (यूनाइटेड) और आरएलडी के विलय की घोषणा के बाद बिहार के जेडीयू-आरजेडी गठबंधन के लिए यह एक झटका है। सपा द्वारा बिहार के गठबंधन से अलग होने के बाद लगातार यही कहा जा रहा था कि उत्तर प्रदेश में ऐसे किसी भी महागठबंधन की गुंजाइश नहीं है।
देवबंद में किसी प्रत्याशी को एकतरफा समर्थन नहीं दिखा
सहारनपुर की देवबंद सीट से कांग्रेस उम्मीदवार माविया अली ने जीत हासिल की। माविया को 50921 वोट, सपा की मीणा राणा को 47231 वोट और बीजेपी के रामपाल पुंडीर को 45327 वोट मिले। तीनों उम्मीदवारों को मिले वोटों के बीच इतने कम अंतर से किसी एक उम्मीदवार के प्रति कोई एकतरफा समर्थन नहीं दिखता। मुजफ्फरनगर में बीजेपी उम्मीदवार कपिल देव अग्रवाल ने सपा उम्मीदवार गौरव बंसल को 7364 वोटों से हराया। उनके खिलाफ लड़ रहे सपा के गौरव स्वरूप को 58026 वोट मिले, जबकि राष्ट्रीय लोक दल व कांग्रेस के प्रत्याशी को 15000 से कम वोट में संतोष करना पड़ा। वर्ष 2013 में यहाँ हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद से ही यहां का माहौल प्रदेश सरकार के खिलाफ बना हुआ था और दंगा पीड़ितों में सरकार के द्वारा की गयी कार्यवाही के प्रति असंतोष था। जीत के बाद केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री संजीव बालियान के नेतृत्व में विजय जुलूस भी निकला गया।
नतीजे को सपा सरकार के कुशासन का जवाब मान रही बीजेपी
बीजेपी की ओर से पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रदेश प्रभारी ओम प्रकाश माथुर ने कहा कि ये नतीजे “सपा सरकार के कुशासन को जनता का जबाव” हैं। माथुर ने कहा कि मुज़फ्फरनगर के उपचुनाव और गाज़ियाबाद के मेयर के चुनाव में बीजेपी की जीत से सिद्ध हो गया है कि राज्य की जनता अखिलेश सरकार के कुशासन एवं ध्वस्त कानून-व्यवस्था से त्रस्त है।” बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने भी कहा कि ये नतीजे विकास और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर अखिलेश सरकार की नाकामी का संकेत हैं।
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नतीजों को इसलिए भी चिंताजनक मान रही पार्टी
सपा के लिए ये नतीजे इसलिए भी चिंताजनक हैं कि 2012 में सत्ता में आने के बाद से पार्टी 14 में से 11 उप चुनाव जीत चुकी है। सपा प्रमुख कई मौकों पर अखिलेश सरकार की कार्यशैली, मंत्रियों के भ्रष्टाचार और पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं की अनुशासनहीनता पर टिप्पणी कर चुके हैं। इन चुनावों के पहले भी उनकी ओर से पार्टी कार्यकर्ताओं को यही सन्देश दिया गया था कि ये चुनाव किसी भी हालत में जीतने हैं। अब देखना है कि मुलायम इन नतीजों के बाद अपने मुख्यमंत्री पुत्र को क्या सीख देते हैं।
रतन मणिलाल वरिष्ठ पत्रकार हैं...
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This Article is From Feb 16, 2016
उपचुनावों के नतीजों से अखिलेश के चेहरे, काम पर उठे सवाल
Ratan Mani Lal
- ब्लॉग,
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Updated:फ़रवरी 16, 2016 21:20 pm IST
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Published On फ़रवरी 16, 2016 19:17 pm IST
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Last Updated On फ़रवरी 16, 2016 21:20 pm IST
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