
अबू कासिम के जनाजे में शामिल भीड़।
गुरुवार को ही सेना और पुलिस ने एक अभियान में लश्करे ए तैय्यबा के कश्मीर में कमांडर-इन-चीफ अबू कासिम को दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के एक गांव में मुठभेड़ में मार गिराया। मुठभेड़ में सेना के एक जवान ने भी अपने प्राणों की आहुति दी। कश्मीर में आतंक का पर्याय बन चुका अबू कासिम पाकिस्तान के बहावलपुर का रहने वाला था। वह इस साल उधमपुर में बीएसएफ के काफिले पर हुए हमले का मास्टर माइंड भी था, जिसमें दो जवान शहीद हुए थे। इतना ही नहीं अबू कासिम ने 2013 में सेना के काफिले पर भी हमला किया था जिसमें सेना के नौ जवानों समेत कुल ग्यारह लोगों की जान गई थी। कई हमलों में शामिल अबू कासिम अपने आतंकी कारनामों के बूते लश्कर का पोस्टर बॉय कहा जाने लगा था।

कश्मीर के लिए जान की बाजी लगाने वाले सैनिक हैरान
कश्मीर के हर इंच को पाकिस्तान की बुरी नजर से बचाने में रात-दिन एक करने वाले सैनिक भी आतंकवादी को मिलते ऐसे समर्थन से हैरान और आहत होते हैं। सेना की वर्दी के अनुशासन और भारतीय सेना की उच्च परंपराओं के कारण सेना में हर कोई खुलेआम मीडिया में नहीं बोलता, किंतु अंतर्मन टटोलने पर सेना भी अपना दर्द बयां करती है। नाम न छापे जाने के अनुरोध पर सेना के कई लोग कहते हैं कि अगर आतंकी के जनाज़े में इतनी भीड़ जुट रही है तो हम किसके लिए अपना खून बहा रहे हैं ? यह सोचने और समझने की जरूरत है। करगिल की जंग में अपने बेटा गंवाने वाले कर्नल बीएन थापर की आंखें इस सवाल पर शून्य में अटक जाती हैं। कुछ देर रुक कर वे कहते हैं कि यह एक खतरनाक संकेत है जिसे समझने की जरूरत है। यह बात किसी से छुपी नहीं कि स्थानीय आतंकियों को कुछ हद तक स्थानीय लोगों की सहानभूति भी हासिल है। पर पहले यह खुलकर ज़ाहिर नहीं होता था, अब होने लगा है । उधर देश में बेज़ा और गैरजरूरी मसलों पर टिप्पणियां करते रहने वाले नेता इस पर कुछ नहीं बोलते।
इस बारे में चर्चा करने पर एक वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार कहते हैं कि उस आतंकी के प्रति लोगों की हमदर्दी आपको भीड़ की शक्ल में दिख रही है। क्या यह ठीक है इस सवाल पर वे कहते हैं कि यहां पिछले 25 सालों से बेकारी ही बेकारी है। आज कासिम के मारे जाने को लेकर पूरा साउथ कश्मीर बंद पड़ा हुआ है ।

अब सवाल उठता है कि क्या जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद में नई जान फूंकने की कोशिश हो रही है। सीमा पार से तो इसको हवा पानी हमेशा से मिल ही रहा है। कम से कम देश में तो इसका खुलकर विरोध होना ही चाहिए। आए दिन कश्मीर में पाकिस्तान का झंडा सरेआम लहराया जाता है। आतंकी संगठन आईएसआईएस का झंडा भी कश्मीर में जहां तहां जिसका मन आया लहरा देता है। जैसे न कोई खौफ़ हो और न कानून का डर हो। राज्य की कोई भी पार्टी ऐसी घटनाओं के खिलाफ सड़क पर नहीं उतरती। हर मौके पर अपने ट्वीट करने वाले उमर अब्दुल्ला भी कुछ भी नहीं बोलते।
सत्ता में आने के बाद बीजेपी भी चुप
खुद को देश भक्त पार्टी बताने वाली और जम्मू कश्मीर में सरकार की साझीदार बीजेपी भी ऐसी घटनाओं पर सिर्फ तब बोलती थी जब वह विपक्ष में थी। चुनावी रैलियों में कश्मीर का मुद्दा बीजेपी ने ढेरों बार उठाया पर अब केंद्र और कश्मीर दोनों में सत्ता में आने के बाद उसकी चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। ऐसा लगता है कि रैलियों में दिए जाने वाले बयान सिर्फ चुनाव जीतने और सरकारें बनाने के लिए दिए जाते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी हार के हालात में पाकिस्तान में पटाखे फूटने की बात करने वाले बयानवीर नेता कश्मीर की इस घटना पर चुप्पी साधे रहेंगे। खुद को आम आदमी का अकेला नुमाइंदा बताने वाले नव-राजनेता भी कश्मीर में ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साधे रहेंगे। शायद इसलिए क्योंकि यह मामला न तो दादरी में हुई हत्या से जुड़ा है और न ही फरीदाबाद में हुए कत्ल से। फिजूल और बेहद ओछी टिप्पणियों पर हायतौबा मचाने वाली मीडिया भी अमूमन ऐसी घटनाओं का जिक्र नहीं करती।

शहीदों के परिजनों के दिलों से पूछो...
यहां यह समझने की भी जरूरत है कि कश्मीर की आवाम को आतंकवादियों से बचाने में सेना के हजारों जवान अपनी जान गवां चुके हैं। हर साल औसतन सेना के करीब 30 जवान जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लड़ते हुए अपनी जान गंवा रहे हैं। अर्द्धसैनिक बलों और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के जवान अलग हैं। जरा सोचिए निष्ठुर राजनेताओं, बेखबर जनता और आतंकियों के जनाज़ों में कश्मीरियों के ऐसे हुजूम को उमड़ते देख उन सैनिकों के परिजनों के दिलों पर क्या गुजरती होगी?