आपातकाल को लेकर आडवाणी की आशंका कितनी वाजिब?

आपातकाल को लेकर आडवाणी की आशंका कितनी वाजिब?

नई दिल्‍ली:

सवाल पूछा जा रहा है कि ललित मोदी को भारत सरकार को न बताए जाने की शर्त पर हलफनामा क्यों दिया गया मगर जवाब आ रहा है कि वसुंधरा राजे के साथ कौन-कौन खड़ा है।

जयपुर में राजे सरकार के स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि सभी विधायक वसुंधरा राजे के साथ हैं। वे इस्तीफा नहीं देंगी और हमारी नेता हैं, रहेंगी। ये बहुत ही छोटा मामला है। राठौड़ साहब मामलों की साइज़ भी तय करते हैं।

राठौड़ साहब ने गुप्त रूप से ललित मोदी के हक में हलफनामा दिये जाने पर कुछ नहीं कहा। इतना ही कहा जो वसुंधरा राजे ने कह दिया है वो काफी है। जबकि ललित मोदी ने ही कहा है कि उनका हलफनामा लंदन की कोर्ट में जमा है। दिक्कत है कि बीजेपी एकजुटता के प्रदर्शन के नाम पर सवालों को टाल रही है। यह सवाल भी उठ सकता है कि सुषमा की तरह वसुंधरा राजे के लिए आरएसएस, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह दो चार केंद्रीय मंत्री आगे क्यों नहीं आए। राठौड़ को क्यों कहना पड़ा कि विधायक हमारे साथ हैं। क्या वे केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती दे रहे थे।

कहने को तो उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय बीजेपी भी हमारे साथ है। बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री इस मामले पर चुप हैं। वसुंधरा राजे की तरफ से ख़बर आई है कि उनका कोई भी विधायक आलाकमान से मिलने नहीं गया है। शुक्रवार को पंजाब के आनंदपुर साहिब में वसुंधरा राजे के बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ मौजूद रहने की संभावना है। नीतीश कुमार ने कहा है कि प्रधानमंत्री की चुप्पी ही प्रमाण है। हम लोग को आज जंगल राज कहते हैं ये कानून के राज वाले मंगल राज वालों का हाल देखिये। किसान से ज़मीन लेने पर इन्हें मानवीय आधार नहीं दिखता।

इस मामले पर बीजेपी के प्रवक्ता बहस में हिस्सा नहीं ले रहे हैं लेकिन दूसरे मामले पर ले रहे हैं। क्या वाकई आपको लगता है कि देश में आपातकाल की आडवाणी की आशंका सही है। इस बात की तारीफ की जानी चाहिए कि हर साल जून के महीने में आडवाणी जी आपातकाल की सिहरनों की याद ज़रूर दिला देते हैं लेकिन इस बार उनका इशारा कांग्रेस की तरफ नहीं, बीजेपी और मोदी सरकार की तरफ लगता है।

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की वंदिता मिश्रा ने जब लाल कृष्ण आडवाणी ने पूछा कि क्या आपको लगता है कि आपातकाल फिर से आ सकता है तो जवाब में आडवाणी कहते हैं, 'मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कुछ किया गया है जो मुझे आश्वस्त करता हो कि नागरिक अधिकार फिर से वंचित नहीं किये जाएंगे। उन्हें दोबारा समाप्त नहीं किया जाएगा। बिल्कुल ही नहीं किया गया है। आज आपातकाल के बारे में पर्याप्त जागरूकता नहीं है। प्रेस की आज़ादी और नागरिक स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता नज़र नहीं आती है। हमें लोकतंत्र की शक्तियों को मज़बूत करने की ज़रूरत है। हमे सिस्टम की खामियों के बारे में बात करना चाहिए। मैं इस बात से इनकार नहीं करता हूं कि भविष्य में आपातकाल नहीं आ सकता। इसके बारे में अंतिम रूप से अभी तक नहीं कहा गया है। हां, कोई इतनी आसानी से नहीं कर सकता है लेकिन मैं यह नहीं कह सकता हूं कि दोबारा नहीं होगा। मौलिक अधिकारों में फिर से कटौती हो सकती है।'

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और कांग्रेस के नेता आडवाणी के साथ नज़र आ रहे हैं। आडवाणी बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल में हैं। एक मार्गदर्शक को इस तरह का मार्ग क्यों नज़र आ रहा है।

"The Emergency: A Personal History" नाम से किताब लिखने वाली इंडियन एक्सप्रेस की सलाहकार संपादक कूमी कपूर का मानना है कि आडवाणी जी ने बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व पर आक्षेप किया है। उन्हें बीजेपी के नेताओं पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि वे आडवाणी जी की तरह निराश नहीं हैं लेकिन हमारे नेताओं को मौका मिले तो वे नागरिक स्वतंत्रता समाप्त कर सकते हैं। इंटरनेट की वजह से आपातकाल संभव नहीं है। मीडिया पहले से मज़बूत है।

क्या वाकई हम इंटरनेट पर इतना भरोसा करने लगे हैं कि इसके होते आपातकाल नहीं आएगा। चार पांच अपवादों को छोड़़ दें तो देखने पर वहां भी जनता हाशिये पर नज़र आती है। अब एक किस्सा सुनाना चाहता हूं ताकि आप लोकतंत्र के संकट के दूसरे रूपों को भी पहचान सकें। मैं हैरान हूं कि 12 जून के टाइम्स ऑफ इंडिया की इस खबर पर हमारी राजनीतिक बिरादरी ने कोई हंगामा नहीं किया।

केरल के कोची से एम के सुनील कुमार ने रिपोर्ट लिखी थी कि कोची शहर से 30 किमी दूर है किज़ाकंबलम पंचायत जिस पर कांग्रेस का कब्ज़ा है। इस पंचायत ने 1000 करोड़ टर्नओवर की एक कपड़ा कंपनी को अपनी पंचायत में परमानेंट लाइसेंस नहीं दिया। पंचायत का कहना है कि कंपनी का प्लांट प्रदूषण पैदा करता है, कंपनी कहती है कि राज्य प्रदूषण बोर्ड ने नो आब्जेक्शन सर्टिफिकेट दिया है। मामला अदालत में है लेकिन 8000 कर्मचारियों वाली यह कंपनी पंचायत में उतर गई है। इस साल होने वाले पंचायत चुनावों में सभी 17 वार्डों के लिए अपना उम्मीदावर उतारने जा रही है। इसके लिए कंपनी ने गांव के लोगों के बीच दो साल में 28 करोड़ रुपये खर्च दिये जबकि पंचायत चार साल में 22 करोड़ ही खर्च पाई। छात्रों से लेकर मरीज़ों तक की मदद की और पीने के पानी का प्लांट लगाने से लेकर सड़कें बेहतर कर दी। पंचायत के 77 फीसदी सदस्‍य कंपनी की सुविधा लेने के लिए रजिस्टर्ड हो चुके हैं और वाम दलों के कार्यकर्ता भी कंपनी का बैज लगाकर घूम रहे हैं।

राजनीतिक दलों में कारपोरेट घुस गया, उसके खतरे हम देख भी रहे हैं और नहीं भी देख रहे हैं लेकिन ग्राम सभा के स्तर पर ऐसी घुसपैठ हो गई तो भूमि अधिग्रहण कंपनी के मुताबिक होने लगेगा। पंचायत के अधिकार कंपनी के हाथ में आ सकते हैं। यह सब सोचेंगे तो आप आडवाणी जी की बात को सिर्फ नरेंद्र मोदी सरकार के संदर्भ में ही नहीं देखेंगे। चाहें तो देख सकते हैं खासकर दिल्ली में आए दिन उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच अधिकारों की लड़ाई चल रही है। दिल्ली सरकार की वेबसाइट पर एंटी करप्शन ब्रांच के मुखिया एस.एस. यादव हैं।

दिल्ली के उप राज्यपाल के अनुसार मुखिया ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस एम के मीणा हैं। गुरुवार को एक रिटायर इंस्पेक्टर ने मीणा साहब पर किसी पर्दा घोटाले का आरोप लगा दिया और मुख्यमंत्री केजरीवाल से शिकायत की। दिल्ली सरकार इसे अपने सतर्कता विभाग को भेजने जा रही है जिसके अंदर एसीबी आती है। एफआईआर भी हो सकती है। गुरुवार को अचानक एसीबी के बाहर राजस्थान आर्म्ड कांस्टेबुलरी तैनात कर दी गई। एक दूसरे राज्य की सुरक्षा एजेंसी का सहारा लिया गया। क्या दिल्ली की खींचातानी आपातकाल का ही एक नमूना है। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा है कि कहीं आपातकाल का प्रयोग दिल्ली में तो नहीं हो रहा है।

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आडवाणी अपने विस्थापन पर भड़ास निकाल रहे हैं या वाकई ऐसा कुछ कह रहे हैं जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पर एक बार सोच कर देखिये कि क्या वाकई कोई हमसे हमारी आज़ादी छिन सकता है। आपातकाल भूतकाल है या वर्तमानकाल।