नमस्कार... मैं रवीश कुमार। 2014-15 के आर्थिक सर्वेक्षण ने भारत के ऐसे बिंदु पर पहुंचने का एलान कर दिया है, जहां से यह दो अंको वाली विकास दर की ओर कदम बढ़ा सकता है। इससे न सिर्फ हर आंख से आंसू पोंछा जाएगा बल्कि युवा, मध्यमवर्गीय और महत्वकांझी भारत के लिए अवसर पैदा होंगे, जिससे वे असीमित क्षमता को साकार कर सकेंगे।
दो खंडों की इस समीक्षा को सरकार और सरकार से बाहर के जानकारों ने तैयार किया है। इस पर मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहमन्यन का दस्तख़त है। इसकी प्रस्तवाना में लिखा गया है कि दो अंकों के विकास दर का रास्ता इसलिए खुला है क्योंकि तथ्य और भाग्य भारत के पक्ष में हैं। अर्थव्यवस्था स्थिर हो गई है, सुधारों की शुरुआत हो गई है, विकास में गिरावट खत्म हो गई है। यानी भारत अब आगे बढ़ने के लिए तैयार है। आज का भारत संकटग्रस्त नहीं है।
संकट से तो बाहर आ गए, लेकिन क्या हम बैकडेट में संकट से उबरे हैं। जीडीपी की गिनती का पैमाना बदल गया है। इसके हिसाब से भारत उन तीन साल में भी 6.9 प्रतिशत की दर से तरक्की कर रहा था जब 5 प्रतिशत से नीचे आ जाने की बात हो रही थी। 2013-14 में 7.2 प्रतिशत के आस पास रही है। अब सरकार दावा कर रही है कि 2015-16 में बाज़ार मूल्य पर 8 प्रतिशत जीडीपी हासिल कर लेगी।
अब यह कमाल जीडीपी की गिनती में बदलाव से हुआ है या वाकई हमारी अर्थव्यवस्था पिछले दो साल से बेहतर प्रदर्शन कर रही है। जनवरी के अंत में सरकार ने जीडीपी तय करने के पैमाने को अंतरराष्ट्रीय स्तर के बराबर ला दिया। अभी तक 2004-05 साल के बाज़ार दर के आधार पर जीडीपी तय होती थी, लेकिन अब 2011-12 के आधार पर होगी। इससे 2013-14 में जीडीपी तो 7 प्रतिशत पर पहुंच जाती है। लेकिन क्या इससे हमारी अर्थव्यवस्था का आकार भी बढ़ा। आंकड़े कहते हैं कि नहीं बढ़ा। क्या मैन्यूफैक्चरिंग, उद्योग, रोज़गार निर्यात इन सबमें भी वृद्धि हुई।
मिन्ट अखबार में मानस चक्रवर्ती ने लिखा है कि अगर अर्थव्यवस्था बेहतर हो ही गई है तब हम रिज़र्व बैंक से ब्याज दरों की कटौती की उम्मीद क्यों कर रहे हैं। सरकार का राजकोषीय घाटा 4.6 प्रतिशत ही क्यों रह गया है।
इकोनोमिक टाइम्स में अभिक बर्मन ने ब्लॉग लिखा है कि आर्थिक सर्वे में जो दावे किए गए हैं वह हकीकत नहीं है। श्रम सुधार या भूमि सुधार पर दोष देना ठीक नहीं है, क्योंकि भारत सरकार सबसे बड़ी ज़मींदार है। रक्षा और रेलवे के पास इतनी ज़मीन है कि उनके कुछ हिस्सों पर उद्योग जगत को उद्योग लगाने या दुकानें खोलने के लिए बुलाया जा सकता है।
अभिक का कहना है कि बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट रुके पड़े हैं। वह पंद्रह साल से रुके पड़े हैं। इनमें जो पूंजी फंसी है वह जीडीपी का 7 से 8 प्रतिशत है, जो बहुत ही बड़ी राशि है। सिर्फ यह कह देना कि लाल फीताशाही हटा दी, या क्लियरेंस लेना आसान कर दिया इससे सारे प्रोजेक्ट चल पड़ेंगे स्थिति का सही मूल्यांकन नहीं है। कई कारणों से ज्यादातर प्रोजेक्ट की लागत कई गुना बढ़ चुकी हैं। कंपनियां बैंक लोग चुकाने की स्थिति में नहीं है और अगर सरकार ने ये भरपाई बैंकों को पैसे देकर की तो जो भी पूंजी आई है वह ज़मीन पर उतरने से पहले हवा हो जाएगी।
आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि करीब नौ लाख करोड़ की योजनाएं लटकी पड़ी हैं, लेकिन दिसंबर महीने में इन्हीं अरविंद सुब्रमण्यन साहब ने अपनी मध्यावधि समीक्षा में कहा था कि 18 लाख करोड़ की योजनाएं अटकी पड़ी हैं। दो महीने में इतना अंतर कैसे आ गया।
अब आते हैं सर्वे में सब्सिडी पर क्या कहा गया है। अरविंद सुब्रमण्यन लिखते हैं कि सब्सिडी का लाभ ग़रीब को कम अमीर को ज्यादा मिलता है। सब्सिडी से उत्पादकता कम होती है और अक्सर गरीब व कमज़ोर वर्ग ही सबसे अधिक आहत होते हैं।
सर्वे में कहा गया है कि सबसे ज्यादा लीकेज गेहूं और चावल पर दी जाने वाली सब्सिडी में है। इन दोनों पर सरकार सवा लाख करोड़ की सब्सिडी देती है। गेहूं और चावल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य ज्यादा देने से किसान दूसरी फसल नहीं उगाते। इससे गेंहू चावल के दाम गिर जाते हैं और दूसरी फसलों के दाम बढ़ जाते हैं। नतीजा महंगाई बढ़ जाती है और गरीब फिर प्रभावित होता है।
सरकार ने यह तो नहीं कहा कि जिस सब्सिडी से गरीब प्रभावित होते हैं उसे समाप्त कर देगी, लेकिन लीकेज रोकने के लिए सबके खाते में कैश राशि देने के लक्ष्य को पूरा करना चाहेगी। सर्वे में दावा है कि अगर लीकेज कम कर दें तो सब्सिडी का लाभ ज्यादा पहुंचेगा। लेकिन सर्वे में यह भी कहा गया है कि सब्सिडी से तो लाभ ही नहीं होता है। उल्टा गरीब और गरीब होते है।
अब इस बात से मनरेगा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं पर काम करने वाली संस्थाएं चिंतित हो गई हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि मनरेगा यूपीए की नाकामी का स्मारक है। वह इसे बंद नहीं करेंगे बल्कि लोगों को घूम-घूम कर बताएंगे कि कांग्रेस ने गड्ढे खुदवाए हैं।
मनरेगा पर काम करने वाली रीतिका खेड़ा कहती हैं कि यह सही धारणा नहीं है। कई जगहों पर सड़कें बनी हैं, कुएं खुदवाए गए हैं, पानी रोकने के छोटे बांध बने हैं, तालाब भी बने हैं। इसे देखने के नज़रिये का भी सवाल आता है। शहर में पक्की सड़क साल में दस बार मरम्मत तो होती ही है, क्या कच्ची सड़क को दो-तीन बार भरने की ज़रूरत नहीं होती। ज़मीन को समतल करने का काम बेकार नहीं होता, इससे बहुत सी ज़मीन खेती योग्य बनी है।
रीतिका ने कहा कि मनरेगा का पहला उद्देश्य यह है कि ऐसे लोग जिनके पास काम नहीं है और काम करने का कौशल भी नहीं है उन्हें काम और कुछ कैश मिल जाए। इसलिए इस योजना में 60 प्रतिशत हिस्सा मज़दूरी का है। वैसे भी पिछले तीन साल में मनरेगा की राशि 54,000 करोड़ से घटकर 33,000 करोड़ हो गई है।
कैश ट्रांसफर योजना के बारे में एक दूसरी राय आ रही है। दिल्ली में ही इस योजना को कारगर तरीके से अभी लागू नहीं किया जा सका है। आज ही हृदयेश जोशी ने खबर दिखाई है कि कैसे उन गरीब लोगों को राशन का अनाज नहीं मिल रहा है, जिनके पास आधार कार्ड नहीं है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आधार कार्ड न भी हो तो भी राशन कार्ड बनाया जाए।
कैश ट्रांसफर कुछ योजनाओं में तो बेहतर बताई जा रही है, लेकिन खाद्य सुरक्षा के बारे में अलग राय है। हृदयेश जोशी ने अपनी इस रिपोर्ट में आपको दिखाया भी। उसी तरह बिजनेस स्टैंडर्ड में नितिन सेठी की रिपोर्ट छपी है कि मध्य प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडू जैसे राज्यों ने कैश ट्रांसफर पर आपत्ति जताई है। वह इसलिए कि राशन की दुकान तो गांव-गांव में है मगर बैंक काफी दूर हैं। सरकार राशन की दुकानों पर अपने खर्चे से अनाज पहुंचाती है। उस खर्चे से सरकार तो बच जाएगी, लेकिन आम गरीब लोगों पर वो बोझ आ जाएगा। साथ ही साफ नहीं है कि बाज़ार में जब अनाज के दाम बढ़ेंगे तो क्या होगा। हर राज्य में स्थानीय बाज़ारों में अनाज के दामों में काफी अंतर होता है। तो अगर हम 7 प्रतिशत वाली जीडीपी हो चुके हैं तो क्या मुमकिन है कि अरुण जेटली के बजट में खुशियों की बौछार होने वाली है।
This Article is From Feb 27, 2015
क्या अर्थव्यवस्था का संकट ख़त्म हो गया?
Ravish Kumar, Saad Bin Omer
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Updated:फ़रवरी 28, 2015 00:19 am IST
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Published On फ़रवरी 27, 2015 21:11 pm IST
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Last Updated On फ़रवरी 28, 2015 00:19 am IST
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