मज़हब को लेकर जब भी बहस होती है उसमें एक तरफ से महान बताने वाले कूद पड़ते हैं तो दूसरी तरफ शैतान बताने वाले। इस खांचे से आप निकलते ही हैं कि दो मज़हबों के बीच के फुटबाल मैच में फंस जाते हैं। भारत में इस मैच का नाम है हिन्दू-मुस्लिम प्रीमीयर लीग। धर्मों की महानता के अनुसार अगर दुनिया इतनी अच्छी हो जाती तो बुराई दूर करने वाले बेरोज़गार हो जाते। सभी धर्मों का सार एक है तो कम से कम यही तय कर लें कि सार बताने वाले अलग-अलग फिरकों पंथों और गुटों में क्यों बंटे हुए हैं।
गोलीबारी की ये जो आवाज़ आप सुन रहे हैं बुधवार सुबह सुबह की है। उत्तरी फ्रांस का उपनगर है सेंडिनिज के इस मकान में पुलिस और आतंकवादियों के बीच सात घंटे तक गोलीबारी चली है। इस ऑपरेशन में कथित रूप से दो आतंकवादी मारे गए हैं जिनमें से एक महिला भी है जिसने खुद को उड़ा लिया। पहले खबर आई कि मास्टरमांइड अबाउद मारा गया है लेकिन बाद में इस खबर की पुष्टि नहीं हो सकी। सात लोग के गिरफ्तार होने की खबर आई है। पास के एक चर्च का भी पुलिस ने दरवाज़ा तोड़ा। इस आशंका में कि वहां कुछ हथियार रखे हो सकते हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने कहा है कि आतंकी हमले के ज़रिये फ्रांस को बांटने का प्रयास किया जा रहा है। हम धार्मिक कट्टरता को समाप्त करेंगे। हमारा आईएसआईएस के साथ युद्ध शुरू हो चुका है। लेकिन हर तरह की नफरत का आखिर तक विरोध होना चाहिए। अंधराष्ट्रवाद और मुस्लिम विरोधी भावनाओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फ्रांस में इस बात पर भी विचार हो रहा है कि आपातकाल की समयसीमा तीन महीने तक बढ़ा दी जाए।
पेरिस में शुक्रवार के हमले के बाद 400 से अधिक छापे पड़े हैं और 60 गिरफ्तारियां हुईं हैं। 75 हथियार बरामद हुए हैं। फ्रांस ने कहा है कि रेडिकल मस्जिदों को बंद किया जाएगा। रूस के राष्ट्रपति ने एक आयोग का गठन किया है जो पता लगाएगा कि आतंकवाद को कौन पैसे दे रहा है। वो जानना चाहते हैं कि 31 अक्टूबर को जिस रूसी विमान में धमाका हुआ था उसे किसने फंड किया था। इस्लामिक स्टेट ने उस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी लेकिन इस फैसले पर पहुंचने के लिए क्या पुतिन को पेरिस हमले ने प्रभावित किया या वे उन 40 देशों के बारे में और पता लगाना चाहते हैं जो उनके मुताबिक इस्लामिक स्टेट को फंड कर रहे हैं। इस्लामिक स्टेट को किसने पैदा किया, किसने पैसे दिये इन सब सवालों के जवाब आप सर्च करेंगे तो अब आपको गूगल से ओबामा का बयान मिलेगा कि चरमपंथियों को रोकने के लिए मुस्लिम समाज पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है।
यह सुनते ही भारत के मुस्लिम संगठन तुरंत सक्रिय हो गए जैसे ओबामा जी के आग्रह का इंतज़ार हो रहा था। जमीयत उलेमा हिंद ने आज भारत के कई शहरों में आतंकवाद के खिलाफ प्रदर्शन किया है। कहा है कि इस्लाम का ISIS से कोई लेना देना नहीं है। जमीयत ने दहशतगर्दी यानी आतंकवाद के खिलाफ जेहाद का ऐलान करते हुए मुस्लिम देशों से भी इसमें शामिल होने की अपील की है। मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि कुछ लोग ब्रेन वाश करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन हम लोग कट्टर ताकतों के खिलाफ लड़ेंगे। आप जानते हैं कि 2013 में जमीयत ने दिल्ली के रामलीला मैदान में आतंकवाद के खिलाफ सभा कर फतवा जारी किया था।
उससे पहले 2008 में दारुल उलूम देवबंद ने आतंकवाद के खिलाफ फतवा जारी किया था। कुछ समय पहले मरकज़ी जमीयत अहले हदीस नाम की संस्था ने भी रामलीला मैदान में सार्वजनिक सभा की थी जिसमें आतंकवाद के खिलाफ फतवा पढ़ा गया था। इस सभा में गैर मुस्लिम धर्म गुरु भी शामिल हुए थे। 2015 में अहले हदीस ने दाइस यानी इस्लामिक स्टेट के खिलाफ फतवा जारी किया था। 2006 में आतंकवाद के खिलाफ जारी फतवे को एक किताब की शक्ल में छापा गया है। मुंबई में मुफ्ती मोहम्मद मंजर हसन अशरफी ने कहा कि उन्होंने सितंबर महीने में ही अमेरिका से फतवा जारी किया है कि इस्लाम आतंकवाद के ख़िलाफ है। इस फतवे पर 1070 मुफ्ती और इमाम ने दस्तखत किये हैं। मुंबई की रज़ा एकेडमी ने एलान किया है कि वो सारे मस्जिद और मौलवियों से अपील करेगी कि वो आईएस को आतंकी सगंठन बताएं। एक महीना पहले बेंगलुरू के जामा मस्जिद ने कर्नाटक की 6000 मस्जिदों के इमाम को खत लिखा है कि वे अपनी तकरीर में इस्लामिक स्टेट को आतंकी संगठन बताएं। नमाज़ से पहले या बाद में कहें कि इस्लामिक स्टेट नाम का आतंकी संगठन गैर इस्लामी है। मां बाप से कहें कि बच्चों को बताएं कि ऐसे संगठनों की तरफ आकर्षित न हों।
ऐसी सक्रियता अमेरिका, यूरोप, पाकिस्तान, बांग्लादेश इंडोनेशिया में है या नहीं लेकिन भारत के इस्लामी संगठनों ने सराहनीय पहल तो की है। इससे एक मैसेज तो जाएगा पर क्या कट्टरपंथ के रास्ते पर कोई सिर्फ धार्मिक कारणों से ही चल पड़ता है, धार्मिक कारण तो होते ही हैं लेकिन क्या कुछ और कारण नहीं होते होंगे।
जो नौजवान बेल्जियम, ब्रिटेन, फ्रांस से पासपोर्ट वीज़ा लेकर सीरिया चला जाता है, इस्लामिक स्टेट की आतंकी सेना में भर्ती हो जाता है क्या उसे नहीं मालूम कि इस्लाम का आतंक से कोई लेना देना नहीं है। क्या वो इस्लाम को लेकर इतना नासमझ है। लेकिन दूसरी तरफ इस कदर समझदार है कि अपना घर बार छोड़ आतंकवादी बनने चला जाता है। आपने इस संदर्भ की तमाम बहसों में वहाबी इस्लाम का ज़िक्र सुना होगा। इसके लिए आपको पोलिटिकल इस्लाम जैसे शब्दों के माने समझने होंगे। मतलब धर्म के आधार पर राजनीतिक सत्ता का निर्माण जो शरिया से चलेगा संविधान से नहीं। मोटा मोटी इसे पोलिटिकल इस्लाम कह सकते हैं।
वहाब इस्लाम को आप यूं समझिये कि स्थानीय संस्कृति और समाज के असर को समाप्त कर पवित्र किताब के अनुरूप ही आचरण किया जाए। सऊदी अरब को वहाबी इस्लाम का प्रचारक बताया जाता है लेकिन इस्लाम की पवित्र धारा के भी कई रूप हैं। जैसे भारत में आप तबलीग और वहाब को एक नहीं कह सकते। उसी तरह से आप भारत में वहाबी इस्लाम और सऊदी वहाब को एक कह सकते हैं या नहीं इस बात को लेकर खासी सतर्कता बरतनी होगी। क्या भारत का वहाबी मुसलमान भी सऊदी या इस्लामिक स्टेट से जुड़े वहाबी या सलफी मुसलमानों की तरह राजनीतिक सत्ता के लिए लड़ता है। यह सब सवाल ज़रूरी हैं। यह भी कि इस्लामिक स्टेट में शामिल क्या सारे आतंकवादी वहाबी धारा से ही आते हैं। आप जानते हैं कि इस्लाम में तरह तरह के फिरके हैं। पंथ हैं। हर पंथ की एक दूसरे से लड़ाई भी है।
आतंकवाद के खिलाफ मस्जिदों में तकरीर का एलान किया गया है। लेकिन इस्लामिक स्टेट को नौजवान ऑनलाइन से मिल रहे हैं। क्या ऑनलाइन पर कुछ और है जिसके प्रभाव में नौजवान प्रभावित हो रहे हैं। यह भी एक सवाल होना चाहिए। तो मस्जिदों में अपील और तकरीर का ऐलान कर मुस्लिम संस्थाएं बचाव की मुद्रा में हैं या वो अमेरिका, रूस और फ्रांस की मदद कर रही हैं, आतंकवाद से लड़ने में प्राइम टाइम।
This Article is From Nov 18, 2015
प्राइम टाइम इंट्रो : इस्लाम में कट्टरपंथ किस रास्ते से?
Ravish Kumar
- ब्लॉग,
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Updated:नवंबर 18, 2015 21:48 pm IST
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Published On नवंबर 18, 2015 21:38 pm IST
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Last Updated On नवंबर 18, 2015 21:48 pm IST
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