बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार का साथ आना एक मजबूरी ही है, क्योंकि यह दोनों के अस्तित्व के लिए जरूरी है। उन्हें पता है कि यदि साथ नहीं आए तो शायद कहीं के न रहें।
बीजेपी केंद्र में सत्ता में है, बिहार चुनाव मोदी और अमित शाह के लिए एक प्रतिष्ठा का सवाल होगा। यही वजह है कि बीजेपी अपनी पूरी ताकत बिहार चुनाव में झोकेगी। यहां तक कि वे साम- दाम, दंड- भेद किसी से नहीं चुकने वाली है।
बिहार चुनाव का इतना महत्व है कि सरकार ने कवि रामधारी सिंह दिनकर पर दिल्ली में एक बड़े कार्यक्रम का भी आयोजन किया। बीजेपी की इस चाल के पीछे की रणनीति एकदम साफ है। वह एक भी वोट खोने के लिए तैयार नहीं है। दिनकर जिस जाति विशेष से आते हैं, उनका प्रतिशत भले ही कम हो, मगर यह जाति विशेष चुनाव के माहौल बनाने में बहुत कारगर साबित होता है।
बिहार में सवर्ण जातियों को मजाक में लाउडीस्पीकर जाति भी कहते हैं, क्योंकि ये माहौल बनाने में कारगर हैं। ये हर चाय पान की दुकान से लेकर मीडिया तक में किसी मुद्दे को लंबे समय तक कायम रख सकते हैं।
बीजेपी निश्चित तौर पर इन अगड़ी जातियों से यही उम्मीद रखती है। बीजेपी के पास अपने वोट के साथ-साथ कुशवाहा वोट भी है और रामविलास पासवान का दलित वोट भी। बीजेपी बिहार में भी उत्तर प्रदेश मॉडल अपनाने की कोशिश में है कि अगड़ों के साथ दलितों को जोड़ा जाए। इसी की वजह से उत्तर प्रदेश में मायावती लोकसभा चुनाव में खत्म हो गई थी।
यही नहीं बीजेपी जीतन राम मांझी और पप्पू यादव पर भी नजर रखे हुए है। इनसे कोई तालमेल नहीं होता है तो बीजेपी चाहेगी कि मांझी ढेरों उम्मीदवार खड़े करें, ताकि मुकाबला पेचीदा हो जाए। इसके लिए बीजेपी मांझी को फंड भी करेगी ताकि मांझी और पप्पू यादव भी बिहार चुनाव के दौरान हेलिकॉप्टर में घूमें। यही वजह है कि मांझी जब भी प्रधानमंत्री से वक्त मांगते हैं, प्रधानमंत्री उन्हें समय देने में वक्त नहीं गंवाते। भाई नाक का सवाल है बिहार चुनाव...
अब इतनी बड़ी घेराबंदी ने लालू और नीतीश को साथ आने पर मंजबूर कर दिया। लालू यादव की पार्टी के कुछ नेताओं के लगातार बयानों से नाराज़ और निराश हो चुके नीतीश कुमार ने कांग्रेस से यह बयान दिलवा दिया कि वह नीतिश के साथ जाएंगें। यही वजह है कि दिल्ली में लालू से मिलने के पहले नीतिश कुमार राहुल गांधी से मिलने गए।
नीतीश के इस कदम से लालू यादव पर भी दबाब बढ़ा है। अगर लालू और नीतीश साथ आए तो मुस्लिमों में कोई संशय की स्थिति नहीं रहेगी। बिहार में मुस्लिम और यादव अकेले 30 फीसदी का आंकड़ा पार कर जाते हैं और दोनों सौ फीसदी पोलिंग भी करते हैं।
मगर आरजेडी और जेडीयू गठबंधन या विलय के बाद कौन कितनी सीटें लेगा, इस पर विवाद बढ़ेगा। लालू यादव के पास सिर्फ 24 विधायक हैं और वह 144 सीटें मांग रहे हैं। लालू खुद चुनाव नहीं लड़ सकते, मगर उन्हें अपने पूरे परिवार को सेट करना है। लालू इतनी सीटें इसलिए भी मांग रहे हैं कि चुनाव के बाद जब नेता चुनने का वक्त आए तो नीतीश के लोग कम हों। अगर विलय होता है तो कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि दोनों पार्टी के समय में एक ही थी। कांग्रेस के लिए तो बिहार में कुछ खोने के लिए नहीं है। ऐसे में अच्छा होगा लालू नीतिश की पार्टी का विलय हो जाए और नेता का फैसला चुनाव के बाद किया जाए।
लालू एक और अड़चन डालने में लगे हैं, वह नीतीश कुमार पर मांझी को साथ लेकर चलने के लिए दबाब बना रहे हैं। उधर मांझी चाहते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाया जाए। इन हालात में अगले दो महीने लालू और नीतीश के भविष्य के साथ ही बीजेपी और बिहार के लिए भी अहम होंगे।
This Article is From Jun 07, 2015
बाबा की कलम से : इसी महीने तय होगा लालू-नीतीश का भविष्य
Manoranjan Bharti, Saad Bin Omer
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Updated:जून 07, 2015 20:15 pm IST
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Published On जून 07, 2015 19:53 pm IST
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Last Updated On जून 07, 2015 20:15 pm IST
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