बात 1980 के दशक की है. दिल्ली में उन दिनों नावल्टी सिनेमा हॉल हुआ करता था. वो दौर सिंगलस्क्रीन का था. दूरदर्शन और सिनेमाहॉल के अलावा मनोरंजन का कोई जरिया था नहीं. वो बचपन के दिन थे और जब भी इस सिनेमाघर के आगे से निकलने का मौका मिलता तो वहां लगी फिल्म के पोस्टर हमेशा कौतूहल के विषय रहते थे. ये बात साल 1981 की है. इस दौरान दो फिल्में इस सिनेमाघर पर लगीं. दोनों ही फिल्में सुपरहिट रही थीं. यही नहीं इन दोनों फिल्मों के पोस्टर जेहन में हमेशा के लिए छप गए. एक पोस्टर अमिताभ बच्चन की फिल्म कालिया का था, जिसमें मेरा फेवरिट हीरो जंजीरों में बंधा था और पोस्टर पर छपा था कालिया. ये पोस्टर आज भी जेहन में पूरी तरह ताजा है.
लेकिन चार अप्रैल की सुबह एक बार फिर वो नॉवल्टी सिनेमा और 1981 का उस पर लगा दूसरा पोस्टर मेरे जेहन में ताजा हो गया. ये पोस्टर मनोज कुमार की फिल्म क्रांति का था. नॉवल्टी पर मनोज कुमार की क्रांति लंबे समय तक लगी रही थी. हमारे मोहल्ले का हर परिवार इस फिल्म को सिनेमाघर पर यूं देखने जाता था, जैसे कोई त्योहार हो. यही नहीं, हम बच्चों के बीच इस फिल्म की कहानियां छाई रहतीं. पूरे जोश के साथ उसके डायलॉग सुनाए जाते. जिन्होंने इस फिल्म को सिनेमाघर पर देखा वो वक्ता बन जाते और जिन्होंने नहीं देखा वो श्रोता.
जब आज सुबह मनोज कुमार के दुनिया से जाने की खबर आई तो उस पोस्टर के साथ क्रांति का ये डायलॉग याद आ गया, 'जब जिंदगी दौड़ती है तो रगों में बहता हुआ खून भी दौड़ता है...' वो जिंदगी अब थम चुकी है. लेकिन उस जिंदगी की सौगातें हिंदी सिनेमा में हमेशा याद की जाती रहेंगी. फिर वो शहीद हो या फिर उपकार, पूरब पश्चिम या क्रांति.
मनोज कुमार को हिंदी सिनेमा का भारत कुमार भी कहा जाता है, और यह पहचान उन्होंने अपनी फिल्मों से बनाई. लेकिन हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी मनोज कुमार कैसे बना, इसके पीछे भी एक दिलचस्प वाकया बताया जाता है. 1949 में दिलीप कुमार और कामिनी कौशल की एक फिल्म शबनम रिलीज हुई थी. हरिकृष्ण को सिनेमा का खूब शौक था. फिल्म में दिलीप कुमार का नाम मनोज था और फिर क्या था उन्हें यह नाम खूब जम गया. इस तरह यह नाम उनका सिनेमाई नाम बन गया.
1930 के दशक में बने जिस नॉवल्टी सिनेमा हॉल पर कभी क्रांति लगी थी, वो सिनेमा हॉल वक्त का शिकार हो चुका है. मल्टीप्लेक्स के दौर में अब जिस जगह पर नॉवल्टी सिनेमा हॉल था, उसके अवशेष मात्र ही बचे हैं. वहीं मनोज कुमार एक अरसे से सिनेमा से दूर थे और बीमार थे. अब वो चले गए हैं, बेशक दिल्ली के उस नॉवल्टी सिनेमा को बहुत कम लोग ही याद रख पाएंगे, लेकिन उस सिनेमाघर की शान रहे मनोज कुमार और उनकी फिल्में शायद ही यादों से उन्हें कभी दूर होने देंगी...