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This Article is From Jun 20, 2022

'अग्निवीर' के फायदे तो हैं लेकिन फिलहाल इस योजना को निलंबित कर देना चाहिए...

Maj Gen (Dr.) Yash Mor (Retd.)
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 20, 2022 18:30 pm IST
    • Published On जून 20, 2022 18:29 pm IST
    • Last Updated On जून 20, 2022 18:30 pm IST

'अग्निवीर' योजना की हालिया घोषणा इस बात से संबंधित है कि भारतीय रक्षा बलों में युवाओं की भर्ती कैसे की जाएगी. दो साल से अधिक समय से सामान्य भर्ती पर रोक लगी हुई थी और अचानक ही अग्निवीर योजना की घोषणा कर दी गई जिससे भारी उथल-पुथल मचा हुआ है. आम तौर पर भारतीय राजनीति की हलचल से सशस्त्र बल परे होते हैं लेकिन फिर भी वो एक बड़े विवाद में फंस गए हैं. पूरे देश में उम्मीदवारों ने जिस तरह से अपने गुस्से का इजहार किया उससे भर्ती नीति की चमक औऱ प्रतिभा पर एक बड़ा सवालिया निशान लग गया है. हिंसक घटनाएं निस्संदेह दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है. बहरहाल, इसके बाद चीजें इतनी तेजी से आगे बढ़ीं कि जो कुछ भी लिखा जाता है तो उसके प्रकाशित होने तक कई और घटनाएं सामने आ जाती हैं. सरकार द्वारा पहले ही एक बड़ा संशोधन किया जा चुका है. विभिन्न अधिकारियों द्वारा हर घंटे और हर दिन 'डील स्वीटनर' (Deal Sweeteners ) की घोषणा की जा रही है. सार यही है कि अभी अंतिम शब्द लिखा जाना बाकी है. जाहिर है इस मुद्दे में बहुत सारे वैरिएबल हैं लेकिन अच्छा होगा अगर हम कुछ स्थिर बातों पर ध्यान दें. शायद यह हमें आगे का एक रास्ता दिखाएगा. बहरहाल, इस मामले में तीन स्थिर मुद्दे ऐसे हैं जो प्रासंगिक है -- सरकार, रक्षा बल और नागरिक. 

सरकार: चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में हो, ये एक हकीकत है कि भारत सरकार हमेशा ही गन्स बनाम बटर ( Guns v/s Butter ) डिबेट से रोज ही जूझती है. सशस्त्र बलों से संबंधित विभिन्न मापदंडों पर भारत उच्च स्थान पर है लेकिन मानव विकास के कई मापदंडों पर भारत काफी नीचले पायदान पर है. इसमें सुधार की आवश्यकता है लेकिन हमें बहुत सारे संसाधनों की आवश्यकता होगी जिसे हम रक्षा क्षेत्र से दूर कर सकते हैं. जिस तरह का हमारा भूगोल है और जिस तरह से परमाणु शक्तियों से सुसज्जित दो पड़ोसियों के साथ हमारे तनावपूर्ण संबंध हैं उसे देखते हुए हमें रक्षा को प्राथमिकता देनी होगी, यदि भारत क्षेत्रीय शक्ति बनने की अपनी महात्वाकांक्षा को बनाए रखना चाहता है. सरकार यह सुनिश्चित करने के अपने प्रयास में सही है कि रक्षा खजाने को आवंटित हरेक रुपया से किस तरह अधिकतम लाभ प्राप्त करे. उनका कहना होता है कि अपने पैसों का दिमाग लगा कर इस्तेमाल करो और उससे ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाओ. वेतन और पेंशन बिल ऐसे मुद्दे हैं जिसका बचाव नहीं किया जा सकता है और इसमें सुधार की जरूरत है. जरूरत है कि एकाउंटेंट लोग जल्दी से हस्तक्षेप करें क्योंकि संसाधन सीमित हैं और वैध दावेदारों की संख्या काफी अधिक है. युद्ध के लिए सशस्त्र बलों को तैयार रखना निस्संदेह एक महंगा काम है, लेकिन अगर हम अपने पड़ोसियों के साथ अपने संबंधों पर विचार करें तो देश के पास बहुत कम विकल्प है. 

रक्षा बल: संवैधानिक रूप से सशस्त्र बलों को भारत और उसके हर हिस्से की रक्षा करनी होती है. इसके लिए उन्हें सशक्त बनाने की आवश्यकता है -- पुरुषों और भौतिक दोनों ही दृष्टियों से. सीमित रक्षा किटी का कितना हिस्सा पुरुषों (सेवारत और सेवानिवृत्त) पर खर्च होता है और कितना सामग्री की ओर जाता है – इन मुद्दों पर उच्चतम स्तर पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है. सैन्य मामलों में नए क्रांति की वजह से युद्ध के मैदान में अब तकनीकी का जबरदस्त इस्तेमाल हो रहा है. पहले की तुलना में सैन्य हार्डवेयर को खरीदने और उसे दुरूस्त बनाए रखने में भी काफी पैसा लगता है. चीन जैसा विरोधी देश अगर पड़ोसी हो तो ​​तकनीकी सक्षमता के मोर्चे पर भारत कोई शॉर्ट कट रास्ता नहीं अपना सकता है. लेकिन ह्यूमन फैक्टर को खारिज करना भी सरासर गलत होगा. चीन के साथ हालिया गतिरोध, विशेष रूप से सर्दियों के दौरान, में हमने देखा कि जब मशीनें मंद होने लगीं तो भारतीय सैनिकों ने गजब का हिम्मत दिखाया. इसलिए भविष्य में तकनीकी से भरपूर युद्धक्षेत्र में भी हमें ऐसे पुरूषों की आवश्यकता होगी जो युवा हों, शारीरिक रूप से स्वस्थ हों और उच्च स्तर की सैन्य कौशल और मोटिवेशन के साथ हों. यह सब तभी होगा जब सिपाही इसे अपनी जिंदगी का मकसद समझ कर अपने काम पर पहुंचेगा. हमें पेशेवरों की जरूरत है न कि नवसिखुओं की. मैल्कम ग्लैडवेल ने अपनी किताब “आउटलियर्स” में कहा है कि जटिल कौशल में महारत हासिल करने के लिए दस हजार घंटे का गहन अभ्यास करना पड़ता है. दस हजार घंटे का मतलब हुआ लगभग 15 महीने. अगर हम आठ घंटे का कार्य दिवस मानते हैं तो उन दस हजार घंटों के गहन अभ्यास में लगभग चार साल लगेंगे. और ये अभ्यास सिर्फ किसी को कुशल ही बना सकते हैं उसकी कुशलता को अपग्रेड नहीं कर सकते. 'अग्निवीर' योजना के तहत चार साल के बाद 75% सैनिकों को हटा दिया जाएगा. जहां बटालियनों को अपनी दस हजार घंटे की यात्रा नए सिरे से शुरू करने वाले 'अग्निवीरों' का एक नया दल  प्राप्त होगा,  तो जो बाहर निकलते हैं वे अनिश्चित दस-हजार घंटे की यात्रा के साथ एक अलग यात्रा शुरू करेंगे. बहरहाल, इतना कहने के बावजूद इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय सशस्त्र बलों को इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि आज की भर्ती कल के पेंशनभोगी होंगे और इसी को ध्यान में रखते हुए परिचालन आवश्यकताओं को जनशक्ति आवश्यकताओं के साथ जोड़कर सही आकार देने की आवश्यकता है. 

नागरिक: आइए हम सिर्फ संभावित उम्मीदवारों पर ही विचार करें. भारतीय सशस्त्र बल युवाओं के लिए रोजगार का एक स्रोत हैं, खास तौर से उन लोगों के लिए जिन्होंने दूसरी नौकरियों के लिए आवश्यक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल नहीं की है. नौकरी की सुरक्षा और आजीवन पेंशन इस पेशे की सबसे खास बात है. ग्रामीण इलाकों में, जहां से हमारे अधिकांश सैनिकों की भर्ती की जाती है, सेना में करियर आजीवन सम्मान, परिवार के लिए आर्थिक सुरक्षा और पारिवारिक भाग्य में वृद्धि करता है. यह सच है कि सभी को सेना में नौकरी नहीं मिलेगी, लेकिन जब तक सभी रास्ते समाप्त नहीं हो जाते तब तक सभी को उम्मीद रहती है. कुछ भी जो उस उम्मीद को पूरा होने में अड़चन खड़ा करेगा वो पूरी तरह लोगों के द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा. कोई भी निर्णय लेते समय इस पर विचार किया जाना चाहिए. इस प्रकार की योजनाओं पर नीति निर्माताओं को ग्रामीण समाज की मानसिक और मनोवैज्ञानिक संरचना पर विचार करने की जरूरत है. इस तरह के फैसलों की अचानक घोषणा का हमेशा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जैसा कि हाल ही में कृषि कानून आंदोलन के दौरान देखा गया था. यह समाज का वही वर्ग है जो इस नीति से प्रभावित हुआ है. इसलिए इस योजना को रोलआउट करने का समय बहुत खराब रहा है. विमुद्रीकरण, लॉकडाउन, बढ़ती महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी के कारण हाल के वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में तनाव बढ़ा है. इस प्रस्ताव ने गांवों में रहने वाले सैनिकों के अनुभवी समुदाय को भी झकझोर दिया है.   

आगे का रास्ता - ऊपर जिन वैरियेबल की चर्चा हुई है उसको लेकर सरकार से बेहतर संवाद करने की जरूरत है. ये काफी चिंतन-मनन के बाद मेरे विचार हैः  

- सबसे पहले लंबित भर्ती प्रक्रिया को पूरा किया जाए. यह कदम अकेले ही विश्वास पैदा करेगा और किसी भी चरम प्रतिक्रिया को टाल देगा. सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मार्च 2020 में कोविड के कारण रुकी हुई प्रक्रिया को फिर से शुरू करना है. 

- बड़ी संख्या में लॉजिस्टिक्स संगठन अब अप्रासंगिक हो गए हैं. उन्हें भंग करके और बंद करके राजकोषीय मुद्दे पर काम करने की जरूरत है. 

- बड़ी संख्या में प्रशिक्षण प्रतिष्ठानों को एक साथ या तो एक समूह में किया जा सकता है या समाप्त किया जा सकता है; उदाहरण के लिए इन्फैंट्री रेजिमेंट में प्रत्येक के पास रंगरूटों के लिए अपना स्वयं का प्रशिक्षण केंद्र है. आज के अखिल भारतीय ऑल-क्लास आर्मी में यह बेमानी होगा.  

- अगर पेंशन वाकई ऐसी ही कोई समस्या है तो नई भर्तियां अन्य बलों की तरह एनपीएस से शुरू हो सकती है. पेंशन योग्य सेवा बढ़ाने जैसे सेवा के अन्य नियमों और शर्तों पर भी विचार किया जा सकता है. 

- एक अच्छा प्रस्ताव यह है कि हम केवल हथियारों से लड़ने वाले और कम्बैट सपोर्ट  में ही भर्ती करें. 15 साल पूरे करने के बाद वे अधिकारियों की तरह 58 साल तक लाजिस्टिक और प्रशासनिक नौकरियों में जा सकते हैं. इससे पेंशन बिल में काफी फर्क पड़ेगा. 

देश और सशस्त्र बलों के सर्वोत्तम हित में  इस योजना को कुछ महीनों के लिए रोक दिया जा सकता है. औऱ इस मद्दे पर न केवल एक संसदीय समिति द्वारा बल्कि कुछ जेसीओ और एनसीओ सहित आर्मी वेटरेन के एक समूह के साथ भी विचार-विमर्श किया जा सकता है. कुछ हजार युवा लड़के जो पहले से ही भर्ती की प्रक्रिया में थे, उन्हें पिछले नियमों और शर्तों के आधार पर शामिल किया जा सकता है. 

(मेजर जनरल (रिटायर्ड) डॉ. यश मोर लाखों युवा छात्रों के लिए एक प्रेरणा हैं. वे छात्रों के नेतृत्व कोच, शिक्षक और संरक्षक हैं.)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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