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This Article is From Apr 21, 2023

कर्नाटक चुनाव में हर तरफ दिख रही है वंशवाद की छाया...

Maya Sharma
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    April 21, 2023 10:57 IST
    • Published On April 21, 2023 10:57 IST
    • Last Updated On April 21, 2023 10:57 IST

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...तो हम यह उम्मीद क्यों करें कि राजनेता बाकी इंसानों से कुछ अलग होंगे...?

कर्नाटक चुनाव ने एक बार फिर साबित किया कि खून आखिर खून ही होता है, और बाकी सब रिश्तों पर भारी पड़ता है. शुरुआत करते हैं राज्य में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सबसे ज़्यादा जाने-माने नेता बी.एस. येदियुरप्पा से. वह मुख्यमंत्री की कुर्सी काफी पहले छोड़ चुके हैं, और इस बार चुनाव भी नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन सत्तासीन पार्टी के प्रचार अभियान का चेहरा आज भी वही हैं. वह शिवमोग्गा जिले की अपनी विधानसभा सीट शिकारीपुरा से खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी जगह लेने वाला कोई और नहीं, उन्हीं का पुत्र बी.वाई. विजयेंद्र है.

कांग्रेस में देखा जाए, तो कहानी कतई उलट गई है. सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में अपनी सुरक्षित सीट वरुणा अपने पुत्र यतींद्र को दे दी थी, लेकिन इस बार पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के मज़बूत दावेदार होने के नाते सिद्धारमैया ने सीट को वापस ले लिया, और उनके पुत्र ने भी 'श्रवण कुमार' की तरह पिता के लिए रास्ता छोड़ दिया.

कर्नाटक में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी जनता दल सेक्युलर (JDS) की तो पहचान ही परिवार की पार्टी के रूप में बनी हुई है. पार्टी के सर्वेसर्वा एच.डी. देवेगौड़ा जिस वक़्त देश के प्रधानमंत्री बन गए थे, उस छोटे-से वक़्फ़े में भी उन्होंने राज्य की राजनीति से नज़र नहीं हटाई थी. उनके पुत्र एच.डी. कुमारस्वामी भी दो बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

वर्ष 2018 में कुमारस्वामी ने दो सीटों - चन्नपटना और रामनगर - से चुनाव लड़ा था, और दोनों पर जीत हासिल की थी. उन्होंने चन्नपटना सीट को अपनाए रखा, और बाद में रामनगर सीट पर हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी अनिता को जीत हासिल हुई.

कुमारस्वामी इस बार भी चन्नपटना पर कब्ज़ा बरकरार रखना चाहेंगे. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में मांड्या संसदीय सीट से चुनाव लड़कर हार जाने वाले उनके पुत्र निखिल को इस बार रामनगर सीट से चुनाव लड़ाया जा रहा है, जो फिलहाल निखिल की मां की सीट है.

इस बार, कुमारस्वामी के बड़े भाई एच.डी. रेवन्ना की पत्नी भवानी भी राजनैतिक महत्वाकांक्षा लेकर सामने आई थीं, और वह हासन सीट से JDS प्रत्याशी होना चाहती थीं. देवर कुमारस्वामी ने इसका विरोध किया, और उन्हीं की चली. एच.डी. रेवन्ना इस बार भी उसी होलनरसीपुरा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे वह पिछली बार जीतकर विधायक बने थे.

रेवन्ना के पुत्र प्रज्वल इस वक़्त JDS के एकमात्र सांसद हैं. वर्ष 2019 में दादा एच.डी. देवेगौड़ा ने अपनी सुरक्षित हासन सीट पोते प्रज्वल को दी थी. देवेगौड़ा ने खुद तुमकुरू से चुनाव लड़ा था, और हार गए थे. प्रज्वल का छोटा भाई सूरज इस समय कर्नाटक विधानपरिषद का सदस्य (MLC) है.

यदि देवेगौड़ा परिवार का वंशवृक्ष आपको कन्फ़्यूज़ कर रहा है, तो बस इतना याद रखें कि राजनीति इनकी रग-रग में बसी है. इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि विधानसभा चुनाव के नतीजे त्रिशंकु रह सकते हैं, यानी कांग्रेस या BJP - दोनों में से किसी एक - को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा, तो उस स्थिति में JDS द्वारा जीती गई एक-एक सीट बेहद अहम हो जाएगी, और उनकी किंगमेकर की भूमिका को संबल देगी.

एक कम चर्चित जोड़ा पिता-पुत्री का भी है, जिसमें कांग्रेस के पूर्व गृहमंत्री रामलिंग रेड्डी और उनकी पुत्री सौम्या शामिल हैं, जो दक्षिणी बेंगलुरू की सीटों बीटीएम लेआउट और जयनगर सीटों को अपने पास बरकरार रखना चाहते हैं.

शहर की दो अन्य सीटों विजयनगर और गोविंदराज नगर से मौजूदा विधायक हैं कांग्रेस के एम. कृष्णप्पा और उनके पुत्र प्रियकृष्ण, और इस बार भी दोनों इन्हीं सीटों से चुनाव मैदान में उतारे गए हैं.

शिवमोग्गा जिले की सोराब सीट से कुमार बंगारप्पा BJP उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ेंगे, और एक बार फिर वह अपने ही भाई मधु के खिलाफ उतरेंगे, जो कांग्रेस उम्मीदवार हैं. कुमार ने 2018 में भी मधु को ही हराया था. कुमार और मधु - दोनों राज्य के भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय एस. बंगारप्पा के पुत्र हैं.

कांग्रेस की दिग्गज नेता मार्गरेट अल्वा के बेटे निवेदित अल्वा भी पार्टी उम्मीदवार के रूप में कुमता सीट पर अपने परिवार की लंबी राजनीतिक परंपरा को जारी रखेंगे. उन्हें बधाई देते मां ने ट्वीट किया है, "प्रतिबद्ध, साहसी और ईमानदार बने रहना, मेरे बेटे... सकारात्मक प्रचार अभियान चलाना..."

कोप्पल विधानसभा सीट से BJP ने मंजुला को टिकट दिया है, जो मौजूदा BJP सांसद कराडी संगन्ना की पुत्रवधू हैं, और बताया जाता है कि यह टिकट ससुर के दबाव के चलते ही उन्हें हासिल हुआ है.

BJP नेता अरविंद लिम्बावल्ली की पत्नी को बेंगलुरू में उनकी सीट महादेवपुरा से पार्टी का टिकट दिया गया है.

विजयनगर से भी BJP के मौजूदा विधायक आनंद सिंह चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन इस बार टिकट उन्हीं के पुत्र सिद्धार्थ को दिया गया है.

मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई खुद भी भूतपूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय एस.आर. बोम्मई के पुत्र हैं.

यह सूची बेहद लम्बी हो सकती है, लेकिन फिर भी सम्पूर्ण नहीं है. ऐसे बहुत-से उदाहरण बाकी हैं. कर्नाटक में जब राजनेता कहें कि पार्टी ही उनका परिवार है, तो यह सच भी हो सकता है.

बेंगलुरू में बसी माया शर्मा वरिष्ठ टीवी पत्रकार और लेखिका हैं...

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

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