युद्ध का स्वरूप हमेशा से तकनीकी, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के अनुसार विकसित होता रहा है. प्रथम विश्व युद्ध में स्वचालित हथियारों और टैंकों से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध में परमाणु बमों के प्रयोग और 1991 के खाड़ी युद्ध में सटीक-निर्देशित हथियारों के उपयोग ने, सैन्य मामलों में क्रांति (RMA) लाने का काम किया. 21वीं सदी में यह परिवर्तन और तेज हो गया.इसमें डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मानव रहित प्रणालियों (ड्रोन) का एकीकरण प्रमुख है. 'रूस-यूक्रेन युद्ध' ने ड्रोन स्वार्म्स, सस्ते कम्पोजिट ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की शक्ति दिखाई, जहां महंगे टैंक और विमान सस्ते ड्रोन के आगे कमजोर साबित हुए. 'ऑपरेशन सिंदूर' में भारत ने ब्रह्मोस, SCALP मिसाइल, लोइटरिंग म्यूनिशन और AI आधारित टारगेटिंग (Trinetra, Electronic Combat & Surveillance System) का उपयोग कर पाकिस्तानी आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले किए. इससे स्टैंड-ऑफ वारफेयर और मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस का नया स्वरूप उभरा.'अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध' में AI टारगेटिंग सिस्टम (Maven) ने पहले 12 घंटों में सैकड़ों स्ट्राइक्स संभव बनाए, जबकि ईरान के ड्रोन-मिसाइल बैराज ने सैचुरेशन अटैक की क्षमता प्रदर्शित की. इन संघर्षों ने साबित किया कि पारंपरिक प्लेटफॉर्म अब साइबर, अंतरिक्ष और सूचना युद्ध के आगे संवेदनशील हैं. भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के लिए इनसे प्राप्त सबक महत्वपूर्ण हैं.
21वीं सदी में युद्ध कैसे बदल गया है
ड्रोन केंद्रित युद्ध: मानव रहित हवाई प्रणालियों ने वायु शक्ति का लोकतंत्रीकरण कर दिया है. इससे अपेक्षाकृत कमजोर देश या गैर-राज्य अभिनेता (जैसे हमास, हिज़्बुल्लाह, हूती) भी निगरानी, सटीक हमले और मनोवैज्ञानिक युद्ध कर सकते हैं. रूस–यूक्रेन युद्ध में Bayraktar TB2 और Switchblade जैसे ड्रोन का व्यापक उपयोग किया गया है. FPV (First-Person View) कामिकाज़े ड्रोन, जो अक्सर साधारण क्वाडकॉप्टर से निर्मित होते हैं, ने छोटे सैन्य दलों को उच्च-मूल्य लक्ष्यों को नष्ट करने में सक्षम बनाया है. इसी प्रकार, ईरान ने Shahed-136 जैसे कम लागत वाले लोइटरिंग म्यूनिशन का उपयोग तेल संयंत्रों और सैन्य ठिकानों पर हमलों में किया है. ऑपरेशन सिंदूर में भी ड्रोन का उपयोग खुफिया जानकारी (ISR), निगरानी और सटीक हमलों के लिए किया गया.

स्वार्म और सेचुरेशन रणनीतियों द्वारा रूस और ईरान ने एक साथ बड़ी संख्या में ड्रोन हमले करके दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली को कमजोर किया है. नागोर्नो-कराबाख युद्ध (2020) में अज़रबैजान ने ड्रोन स्वार्म का उपयोग कर अरमानिया के टैंक और रक्षा प्रणालियों को नष्ट कर युद्ध में निर्णायक जीत हासिल प्राप्त की थी. ड्रोन OODA लूप को तेज करके real-time में पहचान, निर्णय और हमला संभव बनाते हैं और किल चेन को कम्प्रेशन करते हैं. आधुनिक युद्ध को अब 'ड्रोन + डेटा + AI' के रूप में समझा जा सकता है, जहां वास्तविक समय में डेटा विश्लेषण और स्वचालित निर्णय युद्ध की सफलता निर्धारित करते हैं.
कम लागत से बड़ा नुकसान वाला युद्ध
आधुनिक युद्ध की एक प्रमुख विशेषता लागत-विषमता है. यूक्रेन में कम लागत वाले FPV ड्रोन (लगभग $500–$2000) ने लाखों डॉलर के टैंकों को नष्ट किया है. यूक्रेन ने 2025 में 40 लाख ड्रोन का उत्पादन किया, यह वृद्धि युद्ध की प्रकृति को बदल रही है. इसी प्रकार, ईरान समर्थित समूहों ने सस्ते ड्रोन का उपयोग कर विरोधियों के महंगे Patriot मिसाइल सिस्टम का उपयोग करने के लिए मजबूर किया. उदाहरण के लिए $30,000 के ड्रोन को रोकने के लिए $3–4 मिलियन की मिसाइल का उपयोग करना आर्थिक रूप से असंतुलित है. इससे यह स्पष्ट होता है कि अब युद्ध में लागत और संख्या तकनीकी श्रेष्ठता से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है.
एआई और रोबोटिक प्रणालियां
पारंपरिक युद्ध जहां मानव निर्णय और बड़े सैन्य बलों पर निर्भर था, वहीं अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित प्रणालियां निर्णय प्रक्रिया को स्वचालित कर रही हैं. AI आधारित टारगेटिंग सिस्टम विभिन्न स्रोतों से प्राप्त डेटा का विश्लेषण करके प्राथमिकता के आधार पर लक्ष्य चुनते हैं. लोइटरिंग म्यूनिशन लंबे समय तक हवा में मंडराकर लक्ष्य मिलने पर स्वतः हमला कर सकते हैं, जबकि रियल-टाइम डेटा विश्लेषण सैटेलाइट, ड्रोन और रडार से प्राप्त सूचनाओं को एकीकृत कर त्वरित निर्णय लेने में मदद करता है. इसी क्रम में 2030–2040 तक युद्ध में रोबोटिक सैनिक (Robot Soldiers) आम हो सकते हैं, जो स्वायत्त ग्राउंड रोबोट्स के रूप में सैनिकों के साथ मिलकर लड़ेंगे, घायलों को सुरक्षित निकालेंगे, खतरनाक क्षेत्रों में प्रवेश करेंगे और दुश्मन की स्थिति का आकलन करेंगे. इन तकनीकों के कारण युद्ध की गति इतनी बढ़ गई है कि कई स्थितियों में मानव निर्णय प्रक्रिया पीछे छूट जाती है.
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध आधुनिक संघर्षों में एक निर्णायक भूमिका निभा रहा है. यूक्रेन में रूस और यूक्रेन दोनों ने GPS जामिंग, सिग्नल बाधित करने और ड्रोन नियंत्रण को प्रभावित करने के लिए उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) सिस्टम (जैसे Krasukha) का उपयोग किया है. EW का उपयोग संचार प्रणाली को बाधित करने, खुफिया जानकारी को प्रभावित करने और युद्धक्षेत्र की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है.इस प्रकार, विद्युत-चुंबकीय स्पेक्ट्रम पर नियंत्रण अब भूमि, वायु और समुद्र जितना ही महत्वपूर्ण हो गया है.
बहु-आयामी युद्ध और हाइब्रिड संघर्ष
आधुनिक युद्ध अब केवल पारंपरिक युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भूमि, वायु, समुद्र, साइबर, अंतरिक्ष (Space) और सूचना क्षेत्रों तक विस्तृत हो चुका है. यह परिवर्तन युद्ध को बहु-आयामी (Multi-Domain) और हाइब्रिड स्वरूप प्रदान करता है, जहां विभिन्न क्षेत्रों में एक साथ रणनीतिक कार्रवाई की जाती है. रूस–यूक्रेन युद्ध इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां साइबर हमलों के माध्यम से ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया गया, उपग्रह प्रणालियों (जैसे-Starlink) के जरिए निरंतर संचार बनाए रखा गया, सैटेलाइट इमेजरी से रियल-टाइम खुफिया जानकारी प्राप्त हुई और सूचना युद्ध के माध्यम से वैश्विक जनमत को प्रभावित किया गया. ऑपरेशन सिंदूर में भी भारत के खिलाफ चीन द्वारा पाकिस्तान को उपग्रह आधारित निगरानी, रियल-टाइम इंटेलिजेंस और डिजिटल समर्थन उपलब्ध कराना नेटवर्क-आधारित युद्ध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है.इससे पाकिस्तान की स्थिति-जागरूकता (situational awareness) और लक्ष्य निर्धारण क्षमता में वृद्धि हुई. इसी प्रकार, पश्चिम एशिया में ईरान की रणनीति भी रूस और चीन से प्राप्त सैटेलाइट इमेजरी, नेविगेशन सिस्टम (जैसे-BeiDou) और इलेक्ट्रॉनिक और साइबर सहायता के माध्यम से प्रॉक्सी समूहों, ड्रोन हमलों और सूचना युद्ध को एकीकृत किया गया है. अतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में युद्ध बहु-आयामी युद्ध का स्वरूप ले चुका है. भविष्य के युद्धों में विजय उसी पक्ष की होगी जो विभिन्न आयामों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करते हुए तकनीक, सूचना और गति (Speed of Decision-making) को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सके.
अंतरिक्ष से लड़ा जा रहा युद्ध
21वीं सदी में अंतरिक्ष युद्ध (Space Warfare) एक नए और अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य क्षेत्र के रूप में उभरा है. आधुनिक सैन्य अभियानों की सफलता अब काफी हद तक उपग्रहों पर निर्भर हो गई है, जो संचार, नेविगेशन (GPS/NavIC), निगरानी और टोही तथा मिसाइल मार्गदर्शन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को संभव बनाते हैं. उदाहरण के रूप में, रूस–यूक्रेन युद्ध में SpaceX के Starlink उपग्रहों ने यूक्रेनी सेना को निरंतर और सुरक्षित संचार सुविधा प्रदान की. इससे युद्ध संचालन में बड़ी सहायता मिली. इसी प्रकार, अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने सैटेलाइट इमेजरी के माध्यम से रूसी सैनिकों की गतिविधियों पर निगरानी रखी. रणनीतिक नजरिए से, यदि किसी देश के उपग्रह नष्ट या निष्क्रिय कर दिए जाएं, तो उसकी संचार प्रणाली बाधित हो सकती हैं, GPS सेवाएं ठप हो सकती हैं और ड्रोन तथा मिसाइल प्रणालियां प्रभावहीन हो सकती हैं. इसलिए भविष्य के युद्धों में अंतरिक्ष पर नियंत्रण (Command of Space) निर्णायक भूमिका निभाएगा. जो देश इस क्षेत्र में बढ़त बनाएगा, वही सैन्य बढ़त हासिल करेगा.
भारत के लिए सबक क्या है
उपरोक्त परिवर्तनों से स्पष्ट होता है कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को तकनीकी अनुकूलन, सैन्य सिद्धांतों में नवाचार और संस्थागत पुनर्गठन के माध्यम से निरंतर विकसित करना जरूरी है. इनके प्रमुख आयाम निम्नलिखित हो सकते हैं-
बड़े पैमाने पर ड्रोन क्षमता का निर्माण
भारत को एक व्यापक और विविधतापूर्ण ड्रोन पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए. यद्यपि MALE और HALE जैसे उच्च-स्तरीय ड्रोन रणनीतिक अभियानों के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हालिया युद्धों से स्पष्ट हुआ है कि कम लागत वाले, उपयोग के बाद त्यागे जा सकने वाले (Expendable) ड्रोन—विशेषकर FPV ड्रोन—सामरिक स्तर पर अधिक निर्णायक सिद्ध हो रहे हैं. इसलिए, महंगे प्लेटफॉर्म पर निर्भरता कम करते हुए सस्ते ड्रोन के बड़े पैमाने पर उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो निगरानी, सटीक हमले और स्वार्म संचालन में सक्षम हों. भविष्य के युद्धों में वही पक्ष सफल होगा जो गुणवत्ता और मात्रा दोनों का संतुलन स्थापित कर सके.
स्वदेशी रक्षा उत्पादन को मजबूत बनाना
स्वदेशी रक्षा उत्पादन को सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि रूस–यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की कमजोरियों को उजागर किया है, विशेषकर दीर्घकालिक संघर्षों के दौरान. विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता रणनीतिक जोखिम उत्पन्न करती है, इसलिए भारत को 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे. ड्रोन, मिसाइल, एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक घटकों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों में घरेलू उद्योग को सशक्त बनाना जरूरी है. भारत को अपने मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम और प्राइवेट सेक्टर का उपयोग रक्षा नवाचार के लिए करना चाहिए ताकि उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाने (Scaling Up) और युद्धकालीन मांगों के अनुरूप त्वरित नवाचार एवं अनुकूलन की क्षमता विकसित की जा सके.
प्रभावी एंटी-ड्रोन प्रणालियों का विकास
आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन स्वार्म, लोइटरिंग म्यूनिशन और स्वायत्त हवाई खतरों का प्रभुत्व बढ़ रहा है, जबकि पारंपरिक वायु रक्षा प्रणालियां इन कम लागत वाले खतरों से निपटने में सीमित साबित हो रही हैं. भारत को एक बहु-स्तरीय और किफायती एंटी-ड्रोन प्रणाली विकसित करनी चाहिए, जिसमें लेजर जैसे निर्देशित ऊर्जा हथियार, जामिंग और स्पूफिंग के लिए इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां और एंटी-ड्रोन गन जैसे साधन शामिल हों. ईरान में चल रहे युद्ध से यह बात महत्वपूर्ण रूप से साफ हुई है कि रक्षा की लागत, हमले की लागत से कम होनी चाहिए.
समर्पित ड्रोन और मिसाइल बल की स्थापना
ड्रोन और मिसाइल युद्ध के बढ़ते महत्व को देखते हुए संस्थागत नवाचार अत्यंत आवश्यक है. यूक्रेन ने 2024 में दुनिया का पहला Unmanned Systems Forces स्थापित कर ड्रोन संचालन को अलग कमांड दिया. भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल द्वारा पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए, जबकि स्वायत्त ड्रोन ने एयर डिफेंस को कमजोर किया. ईरान के द्वारा बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों ने दिखाया कि बड़े पैमाने पर मिसाइल सैल्वो दुश्मन की रक्षा को ओवरलोड कर सकते हैं. भारत को भी समर्पित ड्रोन और मिसाइल कमांड स्थापित करना चाहिए, जो मानव रहित प्रणालियों, हाइपरसोनिक मिसाइलों से युक्त हो.
AI, ISR और स्ट्राइक क्षमताओं का एकीकरण
आधुनिक युद्ध में खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही (ISR) को सटीक हमलों के साथ जोड़ना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है. 'Sensor-to-Shooter Loop' की अवधारणा युद्ध की सफलता का प्रमुख आधार बन चुकी है. भारत को ऐसे सिस्टम विकसित करने चाहिए जो रियल-टाइम डेटा संग्रह, विश्लेषण और प्रसारण सुनिश्चित कर सकें. कृत्रिम बुद्धिमत्ता बड़े डेटा के विश्लेषण, लक्ष्य पहचान और निर्णय प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. इन क्षमताओं का एकीकरण युद्धक्षेत्र की स्थिति-जागरूकता को बढ़ाएगा और प्रतिक्रिया समय को कम करेगा.
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को सुदृढ़ करना
विद्युत-चुंबकीय स्पेक्ट्रम पर नियंत्रण आधुनिक युद्धों में एक निर्णायक कारक बन गया है. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां संचार नेटवर्क को बाधित कर सकती हैं, GPS सिग्नल को जाम कर सकती हैं और ड्रोन को निष्क्रिय कर सकती हैं. भारत को उन्नत एंटी-जैमिंग तकनीकों, स्पेक्ट्रम निगरानी प्रणालियों और आक्रामक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरणों में निवेश करना चाहिए.भविष्य के युद्धों में प्रभावी संचालन के लिए स्पेक्ट्रम प्रभुत्व (Spectrum Dominance) आवश्यक होगा.
प्रशिक्षण और सैन्य सिद्धांतों में सुधार की जरूरत
बदलते युद्ध स्वरूप के अनुसार सैन्य प्रशिक्षण और सिद्धांतों में मूलभूत परिवर्तन आवश्यक है. भविष्य के सैनिकों को ड्रोन संचालन, डेटा विश्लेषण और साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की समझ होनी चाहिए. ड्रोन युद्ध और नई तकनीकों के लिए विशेष प्रशिक्षण संस्थानों का विस्तार किया जाना चाहिए. इसके साथ ही, सैन्य सिद्धांतों को बहु-आयामी युद्ध के अनुरूप अद्यतन करना जरूरी है.
21वीं सदी में युद्ध का स्वरूप प्लेटफॉर्म-केंद्रित से नेटवर्क-केंद्रित और अब ड्रोन-केंद्रित प्रणाली की ओर विकसित हो गया है. हालिया संघर्ष यह दर्शाते हैं कि मानव रहित प्रणालियां, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध आधुनिक संघर्षों के केंद्र में आ गए हैं. भविष्य का युद्ध डेटा, एल्गोरिदम और मशीन का होगा. भारत की युवा आबादी, IT ताकत और रक्षा सुधार इसे वैश्विक लीडर बना सकते हैं. इसके लिए हमें आज से ही तैयारी करनी होगी.
(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )