विज्ञापन

भारत पर कितना भारी पड़ रहा है होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना, कैसे निपट रही है सरकार

डॉ. नीरज कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 15, 2026 18:53 pm IST
    • Published On अप्रैल 15, 2026 18:53 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 15, 2026 18:53 pm IST
भारत पर कितना भारी पड़ रहा है होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना, कैसे निपट रही है सरकार

अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में हुई वार्ता के विफल होने के साथ ही वैश्विक ऊर्जा संकट और बढ़ गया है. अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इस संकट को 1970 के दशक से ज्यादा बड़े संकट के रूप में देख रहे हैं. क्योंकि, एक तरफ युद्ध से मध्य पूर्व का ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर ना केवल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है बल्कि ऊर्जा उत्पादन में भी कमी आई है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी होर्मुज स्ट्रेट के नाकाबंदी की घोषणा कर दी है. इस वजह से तेल का दाम 100 बैरल डॉलर के पार पहुंच चुका है. इस वजह से भारत में भी तेल और वाणिज्यिक गैसों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है. होर्मुज़ स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्गों में से एक है. दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल और एलएनजी का परिवहन इसी जलमार्ग से होता है. भारत अपनी खपत का करीब 90 फीसद पेट्रोलियम पदार्थ आयात करता है.भारत कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है. भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 90 फीसद तेल आयात करता है. जिसमें 50 फीसद होर्मुज़ से होकर आता है. अभी जो भी ख़रीद हो रही है, वो ऊंचे दामों पर हो रही है. अमेरिकी ब्लॉकेड इस समस्या को बढ़ाएगा ही. भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में भारत के कच्चे तेल के आयात का 50 फीसदी से ज़्यादा हिस्सा मध्य पूर्व से आया था, ख़ासकर इराक़, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से. लेकिन 2019 से 2022 के बीच भारत की मध्य पूर्व पर यह निर्भरता 60 फीसदी से भी ऊपर चली गई थी. इस भारी निर्भरता को देखते हुए, क्षेत्र में किसी भी तरह की रुकावट आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है.

तेल की दुनिया में भारत

कच्चे तेल के दुनिया के तीसरे सबसे बड़े आयातक, लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के चौथे सबसे बड़े आयातक और लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) के दूसरे सबसे बड़े उपभोक्ता के तौर पर भारत वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आने वाली रुकावटों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बना हुआ है. मांग के इस बड़े पैमाने के साथ-साथ क्षेत्रीय एकाग्रता भी बहुत ज़्यादा है. भारत के लगभग 45 फीसदी कच्चे तेल, 60 फीसद नेचुरल गैस और 90 फीसद से ज़्यादा LPG का आयात मध्य पूर्व से होता है. भारत के कुल कच्चे तेल का लगभग 85 फीसद पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों से ही आता है. इस मामले में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक प्रमुख सहयोगी हैं. ये देश भारत को करीब 50 फीसद कच्चा तेल सप्लाई करते हैं. 2025 में इन देशों से 68 फीसद से ज्यादा एलएनजी और 91 फीसद से अधिक एलपीजी का आयात हुआ. अकेले होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से 50 फीसद से अधिक कच्चे तेल, 60 फीसद एलपीजी और 50 फीसद एलएनजी सप्लाई प्रभावित हो रही है.यह ढांचागत निर्भरता भारत की उस संवेदनशीलता को और बढ़ा देती है जो होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में आने वाली रुकावटों के कारण पैदा होती है. इन्हीं मार्गों से वैश्विक तेल और LNG की खेप का एक बड़ा हिस्सा गुज़रता है. 

Latest and Breaking News on NDTV

इसके अलावा, अमोनिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस ज़रूरी है, जो यूरिया और दूसरे उर्वरकों का आधार है. भारत का करीब 40 फीसद उर्वरक आयात मध्य पूर्व से होता है, जिससे ऊर्जा में रुकावटें सीधे तौर पर कृषि आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़ जाती हैं. भारत यूरिया बनाने में इस्तेमाल होने वाली लगभग 60 फीसद LNG कतर से आयात करता है. भारत के 32 में से 30 यूरिया प्लांट कच्चे माल के तौर पर प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं. LPG, जो आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए खाना पकाने का मुख्य ईंधन है, सबसे ज़्यादा संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है. करीब 33 करोड़ परिवार और 30 लाख से ज़्यादा छोटे-बड़े कारोबार LPG सिलेंडरों पर निर्भर हैं. इससे भारत इस ईंधन का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बन गया है. एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अभी 16.2 मिलियन घरेलू PNG कनेक्शन हैं, जबकि LPG उपभोक्ताओं की संख्या 33.2 करोड़ से भी ज़्यादा है. यह संख्या 2014 में 140 मिलियन थी. इसमें पीएम उज्ज्वला योजना के तहत सब्सिडी वाले कनेक्शन पाने वाले 105.6 मिलियन गरीब परिवार भी शामिल हैं.

ऊर्जा संकट का भारत पर प्रभाव

जैसे-जैसे LNG की उपलब्धता कम हो रही है, कई उर्वरक उत्पादकों ने गैस की कम आपूर्ति को संभालने के लिए अपने रखरखाव के लिए होने वाले शटडाउन को पहले ही कर लिया है. हालांकि कम समय के लिए तो भंडार पर्याप्त है, लेकिन लंबे समय तक रुकावटें रहने से कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है. इस वजह से खाद्य पदार्थों की कीमतों में महंगाई आ सकती है. उर्वरकों के अलावा, LNG में रुकावटों का असर औद्योगिक और शहरी ऊर्जा प्रणालियों पर भी पड़ रहा है. सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) सेक्टर, जो घरों को पाइप वाली प्राकृतिक गैस (PNG) और परिवहन के लिए कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) की आपूर्ति करता है, उसे बढ़ती लागत का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि LNG महंगी होती जा रही है और घरेलू गैस की उपलब्धता कम हो रही है. इन रुकावटों का असर सिर्फ़ कुछ खास सेक्टर तक ही सीमित नहीं है. ऊर्जा की कमी का असर अब कई तरह की औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ने लगा है. इनमें पेट्रोकेमिकल्स, मैन्युफैक्चरिंग और गैस पर निर्भर छोटी-छोटी इंडस्ट्रीज़ शामिल हैं. शुरुआती संकेतों से जैसे कि स्टील सेक्टर के कुछ हिस्सों में उत्पादन में रुकावटें, पता चलता है कि सप्लाई में लंबे समय तक कमी रहने से पूरे उद्योग में मंदी आ सकती है और लागत बढ़ सकती है. 

चिंता की बात कतर के 'रास लफ़ान कॉम्प्लेक्स' को भारी नुकसान पहुंचा भी है. यह दुनिया के सबसे बड़े LNG और LPG निर्यात केंद्रों में से एक है. यह भारत के लिए एक अहम सप्लायर है. ऊर्जा संकट से पहले, वैश्विक LNG बाज़ारों में सप्लाई बढ़ने की उम्मीद थी, जिससे नई क्षमता के कारण स्पॉट कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना थी. रास लफ़ान में आई रुकावटों ने कम समय के लिए इस उम्मीद को पलट दिया है; इससे बाज़ार में सख्ती आई है, ज़्यादा कीमतों वाले स्पॉट कार्गो पर निर्भरता बढ़ी है और सुधार की समय-सीमा को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है. 

ऊर्जा संकट से कैसे निपट रही है भारत सरकार 

आपूर्ति में आई कमी के जवाब में सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत प्रावधानों को लागू किया है. इससे विभिन्न क्षेत्रों में नेचुरल गैस के विनियमन और पुनर्वितरण को संभव बनाया जा सके. पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय,  द्वारा जारी यह आदेश अधिकारियों को घरेलू स्तर पर उत्पादित गैस और आयातित LNG, दोनों को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की ओर मोड़ने की अनुमति देता है, जबकि गैर-आवश्यक उपयोगकर्ताओं को की जाने वाली आपूर्ति में कटौती की जाती है. इस ढांचे के तहत, गैस के आवंटन को इस तरह से पुनर्गठित किया गया है कि घरेलू उपभोग और आवागमन (PNG और CNG), LPG उत्पादन और उर्वरक निर्माण को प्राथमिकता दी जा सके. वहीं औद्योगिक और वाणिज्यिक उपयोगकर्ताओं जिनमें विनिर्माण इकाइयां और शहर गैस वितरण से जुड़े उद्योग शामिल हैं, को होने वाली आपूर्ति में कटौती करके उसे हाल के उपभोग स्तरों के 70 से 80 फीसद के बीच सीमित कर दिया गया है. इस बीच रिफाइनरियों को मिलने वाले आवंटन में भी कमी की गई है. उन्हें करीब 65 फीसद गैस ही आवंटित की जा रही है, आपूर्ति के इस पुनर्वितरण की देखरेख का जिम्मा सरकारी गैस कंपनी GAIL को सौंपा गया है. वैश्विक अनिश्चितता के जवाब में, सरकार ने बाहरी झटकों और सप्लाई चेन में रुकावटों से निपटने के लिए 573 अरब रुपये (6.20 अरब अमेरिकी डॉलर) का एक 'आर्थिक स्थिरीकरण कोष' बनाने का प्रस्ताव रखा है. यह ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बढ़ते राजकोषीय प्रभावों को दर्शाता है. 

अंत में, सप्लाई-साइड रणनीतियों के साथ-साथ, एनर्जी एफिशिएंसी में सुधार करना एनर्जी सुरक्षा का एक और महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाने वाला पहलू है. इंडस्ट्री, बिल्डिंग और ट्रांसपोर्ट में एफिशिएंसी उपायों के ज़रिए कुल एनर्जी की मांग को कम करने से, अस्थिर वैश्विक ईंधन बाज़ारों के जोखिम को सीमित करने में मदद मिल सकती है. इसके साथ ही आर्थिक और पर्यावरणीय, दोनों लक्ष्यों को भी समर्थन मिल सकता है. इस लिहाज़ से, एफिशिएंसी में सुधार, लचीलापन बढ़ाने के सबसे किफ़ायती तरीकों में से एक है. मौजूदा संकट यह दिखाता है कि एनर्जी सुरक्षा अब केवल संसाधनों तक पहुंच से ही तय नहीं होती, बल्कि उन सिस्टमों के लचीलेपन से तय होती है जो इन संसाधनों को आपस में जोड़ते हैं. भारत के लिए, जोखिम को कम करने के लिए विविध स्रोतों, बढ़े हुए रिज़र्व, लचीले इंफ्रास्ट्रक्चर और तेज़ एनर्जी बदलाव के मिले-जुले प्रयासों की ज़रूरत होगी. तेज़ी से अनिश्चित होते वैश्विक एनर्जी परिदृश्य में,लचीलापन केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि भारत क्या आयात करता है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वह व्यवधानों को कितनी प्रभावी ढंग से झेल पाता है और उनके अनुसार खुद को ढाल पाता है.

(डिस्क्लेमर: डॉ नीरज कुमार बिहार के वैशाली स्थित सीवी रमन विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

पाठकों से अपील:  अगर आप भी किसी विषय पर लेख लिखना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. आप अपने पसंद के विषय पर लेख लिखकर हमें भेजें. लेख की शब्द सीमा 1500 शब्द है. लेख मंगल फॉन्ट में टाइप होना चाहिए. एक जरूरी बात, लेख मौलिक होना चाहिए, वह कहीं और प्रकाशित नहीं होना चाहिए, वह पूरा या आंशिक तौर पर भी कहीं से कॉपी किया हुआ या AI की मदद से तैयार किया हुआ नहीं होना चाहिए. लेख पसंद आने पर उसे हम अपने ब्लॉग सेक्शन में जगह देंगे. लेख को आप हमारी ईमेल आईडी पर Edit.Blogs@ndtv.com पर भेज सकते हैं.

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com