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सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी नहीं रहे,भोजपुरी बोलने वाला भारतवंशी चला गया

विवेक शुक्ल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अप्रैल 05, 2026 14:05 pm IST
    • Published On अप्रैल 05, 2026 14:05 pm IST
    • Last Updated On अप्रैल 05, 2026 14:05 pm IST
सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी नहीं रहे,भोजपुरी बोलने वाला भारतवंशी चला गया

लघु भारत कहे जाने वाले दक्षिण अमेरिका के टापू देश सूरीनाम के भोजपुरी भाषी पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी का बीती 30 मार्च को निधन हो गया. यह न केवल सूरीनाम बल्कि विश्वभर में फैले भारतवंशियों के लिए एक गहरा भावनात्मक आघात है. वे गुयाना के छेदी जगन, त्रिनिडाड और टोबेगो के वासुदेव  पांडे और मारीशस के अनिरुद्ध जगन्नाथ की परंपरा के नेता थे, जिन्होंने अपनी भारतीय जड़ों से गहरा नाता बनाए रखते हुए वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई.

उनके कार्यकाल में भारत-सूरीनाम संबंध सांस्कृतिक, आर्थिक और कूटनीतिक रूप से मजबूत हुए. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की सूरीनाम यात्रा और संतोखी की भारत यात्रा व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात इसके प्रमाण हैं. उनके निधन पर प्रधानमंत्री मोदी ने भी शोक व्यक्त किया है.

भारतीय मूल्यों के समर्थक

संतोखी के पूर्वज 19वीं शताब्दी में बिहार से अनुबंधित मजदूरों के रूप में सूरीनाम पहुंचे थे. वे वहीं बस गए. संतोखी भोजपुरी भाषा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रबल समर्थक थे. उनके नाम 'चंद्रिका प्रसाद' और 'संतोखी' स्वयं भारतीय परंपरा और भोजपुरी संस्कृति से जुड़े हैं. उन्होंने अपनी सांस्कृतिक पहचान को न केवल संजोया, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी दिलाया. 2020 के चुनाव के बाद 16 जुलाई 2020 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय कोविड-19 महामारी के कारण समारोह सीमित था, फिर भी उन्होंने संस्कृत मंत्रों और श्लोकों का उच्चारण कर भारतीय परंपरा का परिचय दिया. यह सूरीनाम की बहुसांस्कृतिक सहिष्णुता का सुंदर उदाहरण था.

राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल (2020-2025) आर्थिक संकट से भरा था. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ समझौता कर वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और दीर्घकालिक विकास पर जोर दिया, जिससे देश स्थिरता की ओर बढ़ा. भारतवंशी समुदाय (लगभग 27 फीसद) के प्रति उनका विशेष लगाव था. वे भोजपुरी बोलते थे और भारतीय त्योहारों में सक्रिय रहते थे. 2023 में उन्हें प्रवासी भारतीय सम्मान से नवाजा गया.

भारतवंशी नेताओं की प्रेरणादायक परंपरा

संतोखी का निधन विश्वभर के भारतवंशी नेताओं की प्रेरणादायक परंपरा को याद दिलाता है. इस परंपरा के प्रमुख नामों में गुयाना के पूर्व राष्ट्रपति छेदी जगन, त्रिनिडाड एंड टोबैगो के पूर्व प्रधानमंत्री बासदेव पांडे (जिन्हें अक्सर वासुदेवी पांडे भी कहा किया जाता है) और मॉरीशस के शिखर भारतवंशी नेता और पूर्व राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ शामिल रहे हैं. छेदी जगन (1918-1997) गुयाना के पहले हिंदू और भारतीय मूल के प्रमुख नेता थे, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर किसी देश के सरकार प्रमुख के रूप में इतिहास रचा. उनके माता-पिता उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से अनुबंधित मजदूरों के रूप में ब्रिटिश गयाना पहुंचे थे. अगर बात बासदेव पांडे (1933-2024) की करें तो वे त्रिनिडाड और  टोबैगो के पहले भारतीय मूल के और पहले हिंदू प्रधानमंत्री थे. वे ट्रेड यूनियनिस्ट, वकील और राजनेता थे. 1995 में यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस के नेतृत्व में वे प्रधानमंत्री बने और 2001 तक इस पद पर रहे. पांडे ने इंडो-त्रिनिडाडियन समुदाय को मुख्यधारा की राजनीति में लाकर इतिहास रचा. उन्हें 'सिल्वर फॉक्स' के नाम से जाना जाता था. 2005 में उन्हें 'प्रवासी भारतीय सम्मान' भी मिला. अनिरुद्ध जगन्नाथ (1930-2021) मॉरीशस के सबसे प्रभावशाली भारतवंशी नेताओं में से एक थे. उनका जन्म एक भोजपुरी बोलने वाले हिंदू परिवार में हुआ, जिनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से 19वीं शताब्दी में मॉरीशस पहुंचे थे. वे वकील थे और छह बार प्रधानमंत्री और 2003-2012 तक राष्ट्रपति रहे.

संतोखी के पूर्वज 19वीं शताब्दी में बिहार से अनुबंधित मजदूरों के रूप में सूरीनाम पहुंचे थे.

संतोखी के पूर्वज 19वीं शताब्दी में बिहार से अनुबंधित मजदूरों के रूप में सूरीनाम पहुंचे थे.

ये तीनों नेता संतोखी की तरह अपनी भारतीय जड़ों—भाषा, संस्कृति और मूल्यों—को बनाए रखते हुए अपने-अपने देशों में लोकतंत्र, विकास और समावेशिता को मजबूत करने में सफल रहे. सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिडाड और मॉरीशस जैसे देशों में भारतवंशी समुदाय अब बहुसंख्यक या प्रभावशाली अल्पसंख्यक हैं. भारतवंशी जहां भी गए, मेहनत, प्रतिभा और सांस्कृतिक गौरव के साथ योगदान दिया.

वर्तमान भारतवंशी नेतृत्व की छाप

आजकल विश्व राजनीति में भारतवंशी मूल के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कई देशों में सक्रिय हैं, जो भारतीय डायस्पोरा की बढ़ती प्रभावशाली भूमिका को दर्शाते हैं. आजकल भी कई देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भारतवंशी हैं. इनमें गुयाना के राष्ट्रपति मोहम्मद इरफान भी हैं. त्रिनिदाद और टोबैगे की प्रधानमंत्री कमला प्रसाद बिसेसर हैं. कमला प्रसाद के पुरखे बिहार के बक्सर  से थे. कमला प्रसाद बिसेसर के परदादा, पंडित रामलखन मिश्रा, बिहार के बक्सर जिले के इटाढ़ी प्रखंड के भेलपुर गांव से थे. 19वीं सदी के दौरान, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत, रामलखन मिश्रा को मजदूरी के लिए त्रिनिदाद और टोबैगो ले जाया गया था. यह उस समय की सामान्य प्रथा थी, जब हजारों भारतीयों को गिरमिटिया मजदूरों के रूप में कैरेबियाई देशों में भेजा गया. रामलखन मिश्रा त्रिनिदाद में ही बस गए. उनकी संतानें वहां की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगीं.

कमला प्रसाद बिसेसर ने स्वयं कई अवसरों पर अपने भारतीय मूल पर गर्व व्यक्त किया है. वह कहती हैं कि उनके पूर्वज भारत की संस्कृति और परंपराओं से गहरे जुड़े थे और यह सांस्कृतिक विरासत उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है. बक्सर के भेलपुर गांव में आज भी उनका पैतृक घर मौजूद है, जहां उनके नाम की नेमप्लेट लगी हुई है. इस घर के मुख्य द्वार पर 'सीताराम' और 'राधेश्याम' जैसे शब्द अंकित हैं, जो उनके परिवार की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाते हैं. मारीशस में प्रविंद जगन्नाथ प्रधानमंत्री हैं. आप जानते ही हैं कि कुछ समय पहले तक श्रषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे. उनके पुरखे भारत के पंजाब से केन्या जाकर बस गए थे.

संतोखी की विरासत और भविष्य की प्रेरणा

बहरहाल, संतोखी की विरासत बहु-जातीय सद्भाव, कानून के शासन और आर्थिक सुधारों की है. उनके कार्यकाल में दिवाली जैसे त्योहार राजकीय स्तर पर मनाए गए, जिससे भारतीय परंपराओं को नई पहचान मिली. उनका जाना एक युग का अंत है, लेकिन उनकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को भारतीय मूल के लोगों की वैश्विक भूमिका याद दिलाती रहेगी. भारत और विश्व समुदाय को उनके योगदान को संजोना चाहिए और इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाना चाहिए.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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