- बिहार के चर्चित दुलारचंद यादव हत्याकांड में मोकामा विधायक अनंत सिंह को पटना हाई कोर्ट से जमानत मिली है.
- शुरुआती धारणा थी कि दुलारचंद की मौत गोली से हुई, लेकिन रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मौत वाहन की टक्कर से हुई.
- हत्या में इस्तेमाल वाहन का पता नहीं चल पाया है और पुलिस अब तक कोई ठोस सबूत बरामद नहीं कर सकी है.
बिहार के चर्चित दुलारचंद यादव हत्याकांड में एक बड़ा मोड़ तब आया जब मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह को पटना हाई कोर्ट से जमानत मिल गई. 19 मार्च को कोर्ट ने राहत दी और 23 मार्च को वे बेऊर जेल से बाहर आ गए. करीब 142 दिनों बाद जेल से रिहाई के बाद अनंत सिंह ने साफ कहा कि वे निर्दोष हैं और उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया है.
लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल अब भी जस का तस है अगर अनंत सिंह ने हत्या नहीं की, तो आखिर दुलारचंद यादव की जान किसने ली?
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क्या हुआ था उस दिन?
30 अक्टूबर 2025, बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान मोकामा में माहौल बेहद तनावपूर्ण था. घोसवरी थाना क्षेत्र के बसावनचक गांव में चुनाव प्रचार के दौरान दो राजनीतिक काफिले आमने-सामने आ गए. एक तरफ जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह थे, तो दूसरी तरफ जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी.
इसी दौरान झड़प हुई और दुलारचंद यादव की मौत हो गई. दुलारचंद, जो पहले आरजेडी से जुड़े थे, उस समय जन सुराज पार्टी के समर्थन में सक्रिय थे. बताया जाता है कि उनका अनंत सिंह से पुराना व्यक्तिगत विवाद भी था, जिसने इस घटना को और संवेदनशील बना दिया.
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पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बदली दिशा
इस केस में सबसे बड़ा ट्विस्ट पोस्टमार्टम रिपोर्ट से आया. शुरुआती धारणा थी कि दुलारचंद की मौत गोली से हुई, लेकिन रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मौत किसी भारी वाहन की टक्कर से लगी चोट के कारण हुई. डॉक्टरों ने इसे कार्डियो-रेस्पिरेटरी फेलियर बताया.
यही वह बिंदु था जिसने अनंत सिंह के पक्ष को मजबूत किया. उनके वकीलों ने कोर्ट में तर्क दिया कि जब मौत गोली से नहीं हुई तो उन पर लगाए गए आरोप कमजोर हो जाते हैं. इसी आधार पर उन्हें जमानत मिल गई.
जांच में सबसे बड़ी कमी गायब सबूत
इस मामले की सबसे बड़ी कमजोरी अब सामने आ रही है हत्या में इस्तेमाल हुई गाड़ी का अब तक कोई पता नहीं है.
पुलिस अब तक:
- उस वाहन को नहीं खोज पाई जिसने कथित तौर पर कुचलकर हत्या की
- कोई ठोस हथियार बरामद नहीं कर सकी
- घटना के निर्णायक सबूत पेश नहीं कर पाई
जांच की निगरानी जयंत कांत कर रहे हैं और सीआईडी की टीम लगातार काम कर रही है. सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं, लेकिन पांच महीने बीत जाने के बाद भी कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है.
राजनीतिक एंगल भी गहरा
इस केस में सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि राजनीति भी गहराई से जुड़ी हुई है. जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी भी घटना के समय मौके पर मौजूद थे. जांच के दौरान उनके नाम की चर्चा हुई, लेकिन अब तक उनके खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई.
यह सवाल उठता है कि क्या जांच पर राजनीतिक दबाव है, या फिर पुलिस के पास ठोस सबूत ही नहीं हैं?
कई गिरफ्तारियां, लेकिन मुख्य आरोपी गायब
अब तक इस मामले में 5 अलग-अलग एफआईआर दर्ज हुई हैं, 80 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इतनी बड़ी कार्रवाई के बावजूद, सबसे अहम व्यक्ति जिसने हत्या को अंजाम दिया अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर है. यह दिखाता है कि जांच कहीं न कहीं अधूरी है या दिशा से भटक गई है.
यह समझना जरूरी है कि अनंत सिंह को मिली जमानत का मतलब यह नहीं है कि वे दोषमुक्त हो गए हैं. कोर्ट ने सिर्फ यह माना कि फिलहाल उन्हें जेल में रखने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है. केस अभी भी अदालत में जारी है और अंतिम फैसला आना बाकी है.
आगे क्या?
अब इस केस में तीन बड़े सवाल हैं. क्या पुलिस उस गाड़ी को खोज पाएगी जिससे दुलारचंद की मौत हुई? क्या असली हत्यारा कभी सामने आएगा? क्या यह मामला राजनीतिक दबाव में दब जाएगा? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक दुलारचंद यादव को न्याय अधूरा ही माना जाएगा.
दुलारचंद हत्याकांड अब सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि बिहार की कानून-व्यवस्था और जांच एजेंसियों की क्षमता की परीक्षा बन चुका है. एक तरफ आरोपी को जमानत मिल चुकी है, दूसरी तरफ असली हत्यारा अब भी आजाद घूम रहा है.
अगर जल्द ही इस केस में ठोस प्रगति नहीं होती है तो यह मामला जनता के भरोसे पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है.
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