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बिहार का ये किसान कभी दिल्ली जाकर करता था मजदूरी, अब गांव में उगा रहा स्ट्रॉबेरी

दिल्ली पंजाब की नौकरी छोड़ कर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे है रानीगंज के किसान अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणाश्रोत बना सरकार से मदद की आस. अररिया से अरुण कुमार की रिपोर्ट

बिहार का ये किसान कभी दिल्ली जाकर करता था मजदूरी, अब गांव में उगा रहा स्ट्रॉबेरी
  • अररिया जिले के किसान घोलटू ऋषिदेव ने अपने गांव की जमीन पर स्ट्रॉबेरी की सफल खेती कर नया उदाहरण स्थापित किया है
  • हरियाणा में स्ट्रॉबेरी खेती देख कर अपनी 70 डिसमिल जमीन पर लगभग तीन लाख रुपये निवेश कर यह प्रयोग शुरू किया
  • वे दिल्ली और पंजाब में काम करने के बजाय अपने गांव में रहकर खेती कर बच्चों के बेहतर भविष्य पर ध्यान दे रहे हैं
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रानीगंज (अररिया):

कहते हैं कि अगर मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो मिट्टी से भी सोना उगाया जा सकता है. बिहार के अररिया जिले के एक छोटे से गांव के किसान ने इस बात को सच कर दिखाया है. कभी रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली और पंजाब की गलियों में भटकने वाले घोलटू ऋषिदेव आज अपने ही खेत में स्ट्रॉबेरी की खेती (Strawberry Farming) कर पूरे इलाके के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं.

हरियाणा की सीख, बिहार में प्रयोग

अररिया जिले के रानीगंज प्रखंड अंतर्गत बैरबन्ना पंचायत के कलावती गांव के रहने वाले घोलटू ऋषिदेव पहले अन्य मजदूरों की तरह पलायन करने को मजबूर थे. उन्होंने हरियाणा में काम के दौरान स्ट्रॉबेरी की खेती देखी थी. वहीं से उनके मन में यह विचार आया कि क्यों न अपने गांव की मिट्टी पर भी यह प्रयोग किया जाए.

70 डिसमिल में लहलहा रही फसल

परंपरागत खेती (धान-गेहूं) को छोड़कर घोलटू ने कैश क्रॉप (नकद फसल) की ओर रुख किया. फिलहाल वह 70 डिसमिल जमीन पर स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं. इस प्रोजेक्ट में उन्होंने लगभग 2.5 से 3 लाख रुपये का निवेश किया है. खेत में लहलहाती लाल स्ट्रॉबेरी को देखने के लिए अब दूर-दराज से किसान पहुंच रहे हैं.

अब नहीं करेंगे पलायन, बच्चों के भविष्य पर फोकस

घोलटू ऋषिदेव का कहना है कि अब वह कमाने के लिए दिल्ली या पंजाब जैसे महानगरों में नहीं जाएंगे. उन्होंने संकल्प लिया है कि वह अपने गांव में ही रहकर खेती करेंगे. उनका मानना है कि इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि वह अपने बच्चों के साथ रहकर उनके भविष्य को भी बेहतर तरीके से संवार सकेंगे. घोलटू ऋषिदेव ने कहा, "सीमांचल के किसान अब जागरूक हो रहे हैं. परंपरागत खेती में अब वह मुनाफा नहीं रहा, इसलिए हमने कैश क्रॉप को चुना. अगर सरकार से थोड़ी मदद और तकनीकी सहयोग मिले, तो हम इसे और बड़े स्तर पर कर सकते हैं."

अन्य किसानों के लिए बने 'आइकन'

अररिया और आसपास के इलाकों में घोलटू की सफलता की चर्चा जोरों पर है. सीमांचल के किसानों के जीवन स्तर और रहन-सहन में इस तरह के बदलाव एक सुखद संकेत हैं. लोग अब यह समझने लगे हैं कि आधुनिक तकनीक और सही फसल का चुनाव करके खेती को भी एक मुनाफे का सौदा बनाया जा सकता है.

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