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ट्रेन भी अपनी और पटरी भी अपनी! मिलिए भारत के इकलौते शख्स से जिनके पास था खुद का 113 करोड़ का रेलवे स्टेशन

आजकल के रईस लोग प्राइवेट जेट और फरारी का टशन दिखाते हैं, लेकिन पुराने जमाने के राजाओं का जलवा ही कुछ और था. क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा नवाब भी था, जिसके घर के दरवाजे पर सीधे ट्रेन आकर रुकती थी? पढ़ें पूरी खबर.

ट्रेन भी अपनी और पटरी भी अपनी! मिलिए भारत के इकलौते शख्स से जिनके पास था खुद का 113 करोड़ का रेलवे स्टेशन
रईसी की हद! घर के आंगन तक आती थी अपनी प्राइवेट ट्रेन, 113 करोड़ के स्टेशन पर उतरते ही बिछ जाते थे कालीन
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113 Crore Railway Station: आज के दौर में अगर किसी के पास लग्जरी कार हो तो लोग मुड़-मुड़कर देखते हैं, लेकिन यूपी के रामपुर रियासत के नौवें नवाब हामिद अली खान की कहानी सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे. नवाब 'साहब' का रुतबा ऐसा था कि उन्हें स्टेशन तक जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती थी, बल्कि खुद रेलवे की पटरियां उनके महल के अंदर तक बिछी हुई थीं. 1925 में उन्होंने एक ऐसी शाही ट्रेन तैयार करवाई थी, जिसे 'चलता-फिरता महल' कहना गलत नहीं होगा. जी हां, रामपुर के नवाब साहब का अपना निजी रेलवे स्टेशन था, जिसकी कीमत आज के हिसाब से 113 करोड़ रुपये बताई जाती है.

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Photo Credit: social media

इस ट्रेन का नाम था 'द सैलून'. इसे बड़ौदा स्टेट रेल बिल्डर्स ने खास नवाब 'साहब' की पसंद पर बनाया था. चार डिब्बों वाली इस रेलगाड़ी में कीमती फारसी कालीन, सागवान की लकड़ी का नक्काशीदार फर्नीचर और झूमर लगे हुए थे. इसमें नवाब के लिए शानदार बेडरूम, डाइनिंग हॉल और किचन तो था ही, साथ ही नौकरों और रसोइयों के लिए अलग से पूरा तामझाम रहता था.

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महल के अंदर बना अपना निजी स्टेशन (Private Railway Station Inside The Palace)

नवाब 'साहब' की सबसे अनोखी शान...उनका प्राइवेट रेलवे स्टेशन था. उन्होंने महल के भीतर ही इसे बनवाया था और मिलक से रामपुर तक करीब 40 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछवाई थी. बताया जाता है कि रामपुर पैलेस के भीतर बने इस स्टेशन की भव्यता ऐसी थी कि, इसकी वैल्यू करीब 113 करोड़ रुपये आंकी गई है.

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जब नवाब साहब अपनी प्राइवेट ट्रेन से उतरते थे, तो सीधा अपने महल के आंगन में कदम रखते थे. यह नजारा किसी फिल्मी सीन जैसा लगता होगा. आज भी जब लोग इस इतिहास को सुनते हैं, तो दातों तले उंगली दबा लेते हैं कि उस दौर में भी क्या गजब की रईसी हुआ करती थी.

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टवारे में दिखाई इंसानियत की मिसाल (Humanity Shown During Partition Of India)

नवाब 'साहब' सिर्फ ठाठ-बाट के लिए ही नहीं, बल्कि अपने बड़े दिल के लिए भी जाने जाते थे. 1947 के बंटवारे के वक्त जब चारों तरफ अफरा-तफरी मची थी, तब उन्होंने अपनी इसी शाही ट्रेन का इस्तेमाल शरणार्थियों की मदद के लिए किया. कई परिवारों को उन्होंने अपनी निजी ट्रेन से सुरक्षित सरहद पार पहुंचाने में मदद की थी. हालांकि, वक्त की मार से कोई नहीं बचा. 1960 के दशक के बाद नवाब साहब के चले जाने से इस स्टेशन की चमक फीकी पड़ने लगी. धीरे-धीरे पटरियों पर जंग लग गई और वो शाही ट्रेन इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई. आज वहां सन्नाटा है, पर हवाओं में नवाबों की उस शानो-शौकत की कहानियां आज भी गूंजती हैं.

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रामपुर के नवाब हामिद अली खान की यह कहानी याद दिलाती है कि, हिंदुस्तान का इतिहास कितना 'जादुई' रहा है. 113 करोड़ का रेलवे स्टेशन और महल तक आती ट्रेन, ये सब आज भले ही किस्सा लगे, पर ये भारत की उस बेपनाह अमीरी का गवाह है जिसे दुनिया सलाम करती थी.

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(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल खबरों के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)

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