VIRAL VIDEO: पहाड़ों की दुर्गम वादियों में बसे हाटी समुदाय की कहानी दिलचस्प है. इस समाज में सदियों से चली आ रही 'जोड़ीदार प्रथा' (बहुपति प्रथा) आज भी जीवित है, जहां एक महिला घर के सभी सगे भाइयों की सांझी पत्नी होती है. आम बोलचाल में कई लोग 'द्रौपदी प्रथा' भी कह देते हैं. 21वीं सदी के आधुनिक समाज के लिए यह भले ही हैरान करने वाला हो, लेकिन हाटी समुदाय के लिए यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि सीमित कृषि भूमि के बंटवारे को रोकने और विपरीत परिस्थितियों में महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा देने का एक व्यावहारिक जरिया रहा है. इस प्रथा से जुड़ा एक वीडियो यूट्यूबर चैनल 'मैं भी भारत' पर शेयर किया है, जिसमें समुदाय की अनोखी प्रथा के बारे में विस्तार से बताया है.
क्या है जोड़ीदार प्रथा?
पहाड़ों की ऊंचाइयों पर जब शाम ढलती है, तो पारम्परिक संगीत की धुनें इस रहस्यमयी प्रथा से पर्दा उठाती हैं. इस प्रथा के तहत घर की बहू, एक से अधिक सगे भाइयों की सांझी पत्नी होती है. आज के दौर में यह बात हैरान कर सकती है, लेकिन हाटी समुदाय के लिए यह सदियों से जीवन जीने का एक व्यावहारिक तरीका रहा है.
यहां बात केवल शादी की नहीं, बल्कि परिवार को बिखरने से बचाने की है. ज्योति की कहानी इसका सटीक उदाहरण है. ज्योति की शादी विक्रम के बड़े भाई से हुई है. जब बड़े भाई काम के सिलसिले में बाहर जाते हैं, तो विक्रम ज्योति और घर की पूरी जिम्मेदारी संभालता है. दोनों भाइयों और ज्योति के बीच का यह तालमेल बिना किसी मनमुटाव के, आपसी सम्मान और परिपक्वता से चलता है.
अलग-अलग भाई से शादी तो क्या होगा?
बाहरी दुनिया भले ही इसे अजीब माने, लेकिन हाटी समाज के लिए इसके पीछे दो बेहद मजबूत तर्क रहे हैं. सबसे पहले है जमीन का बंटवारा रोकना. पहाड़ों में खेती योग्य जमीन बहुत कम है. अगर सभी भाई अलग-अलग शादी करेंगे, तो एक-दो बीघा की छोटी जोतें और बंटकर खत्म हो जाएंगी. पूरा परिवार एक ही पत्नी से बंधा रहता है, तो जमीन और परिवार दोनों संयुक्त रहते हैं.

दुर्गम रास्तों और कठिन जीवन के कारण यहां पुरुषों की असमय मौत का खतरा हमेशा रहता है. ऐसे में अगर एक पति को कुछ हो जाए, तो दूसरा भाई पत्नी को बेसहारा नहीं होने देता. महिला को कभी विधवा का जीवन नहीं जीना पड़ता. कानूनी तौर पर यह शादी भले ही हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में न आती हो. लेकिन समाज ने इसका भी रास्ता निकाला है. सरकारी कागजों में पत्नी और बच्चे किसी एक भाई के नाम पर दर्ज होते हैं, जबकि व्यावहारिक तौर पर पूरा परिवार एक ही छत के नीचे रहता है.
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बदलने लगी है सोच
समय के साथ अब हवा का रुख बदल रहा है. नई पीढ़ी पढ़-लिखकर नौकरियों के लिए शहरों का रुख कर रही है. अब यह प्रथा केवल उन परिवारों तक सिमट रही है जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है. इस समाज के युवा जहां अपनी इस अनूठी संस्कृति को लेकर किसी हीन भावना का शिकार नहीं हैं, वहीं लड़कियां अब धीरे-धीरे अपनी पसंद और आजादी की बात करने लगी हैं. वे इस प्रथा का विरोध तो नहीं करतीं, लेकिन खुद के लिए 'विकल्प' जरूर चाहती हैं. हाटी समाज भी अपनी युवा पीढ़ी पर कोई बंदिश लगाने के बजाय समय के साथ इस प्रथा को धीरे-धीरे खुद-ब-खुद विदा होने की राह दे रहा है.
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