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This Article is From May 03, 2015

नेपाल में भारतीय मीडिया को लेकर इतना हंगामा है क्यों बरपा?

नेपाल में भारतीय मीडिया को लेकर इतना हंगामा है क्यों बरपा?
काठमांडू: 'गो होम इंडियन मीडिया' ट्विटर पर रविवार को सबसे ज्यादा ट्रेंड यही हैशटैग कर रहा है...

लेकिन सवाल है कि इसकी शुरुआत कैसे हुई और क्यों? दरअसल पिछले शनिवार को नेपाल और खासकर काठमांडू सबसे पहले इंडियन मीडिया का दल पहुंचा और शुरू के 48 घंटे वो चाहे खबर हो या विजुअल्स इंडियन मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां तक कि नेपाल सरकार के अधिकारी या राहत टीम के लोग जहां भी पहुंचे, चाहे सिन्धुपाल्चोक हो या गोरखा या पोखरा, भारतीय खबरिया चैनल के पत्रकार वहां से लाइव रिपोर्टिंग कर रहे थे। लेकिन हमारे देश में जिसे विदेशी मीडिया या पश्चिमी देशों की मीडिया कहते हैं वो न केवल काठमांडू देर से पहुंची, बल्कि अधिकांश लोगों का फोकस एवेरेस्ट बेस कैंप था। जहां पहुंचने के लिए वो सबको मुह मांगा मूल्य देने के लिए तैयार थे, लेकिन यहां पर भी एक भारतीय चैनल ने बाजी मार ली।

दरअसल इंडियन आर्मी के एक दल के साथ इस वेबसाइट के न्यूज़ चैनल का संयुक्त अभियान था और इस दल के प्रोड्यूसर आमिर और कैमरा मैन राकेश सोलंकी व संजय अग्रवाल ने पूरे भूकंप और हिमस्खलन को अपने कैमरे में न केवल कैद किया, बल्कि सोमवार शाम वो काठमांडू भी आ गए। जहां से उनकी फुटेज का पूरे विश्व में लाइव टेलीकास्ट हुआ, जो निश्चित रूप से विदेशों के कई मीडिया हाउस के लिए बड़ा झटका था। लेकिन ये तो प्रतिस्पर्धा की बात हुई...

नेपाल के अधिकारी इस बात को लेकर नाराज थे कि भारत ने अपने लोगों को निकालने के चक्कर में 48 घंटे तक त्रिभुवन एयरपोर्ट को व्यस्त रखा, जिससे दूसरे देशों से सहायता या कहिये राहत सामग्री नहीं पहुंचा पाई। इंडियन मीडिया ने भी भारतीय सेना और एनडीआरएफ के बचाब कार्य पर पूरा ध्यान केंद्रित रखा, लेकिन ये भी सच है कि शुरू के दिनों में काठमांडू में या बाहरी इलाकों में दूसरे देशों के राहत कार्य तेजी नहीं पकड़ पाए थे और इंडियन मीडिया का नेपाली सेना के बचाब कार्य का कवरेज उस स्तर का नहीं था, जितना भारतीय सेना का।

दूसरी बात नेपाली मीडिया के लोग कह रहे हैं कि भारतीय मीडिया ने पाकिस्तान द्वारा बीफ मसाला को इतना ज्यादा तूल क्यों दिया, जबकि दो दिन पहले काठमांडू से सटे पाटन अस्पताल में जब बाइबिल की कॉपी बांटी जा रही थी, तब लोगों ने मना भी किया, लेकिन भारतीय मीडिया ने इसे कभी मुद्दा नहीं बनाया।

नेपाल में जब भी कुछ हुआ जैसे 1999 में इंडियन एयरलाइन 814 के अपहरण के बाद के दिनों में इंडियन मीडिया के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश दिखा। उस समय की सरकार का हमेशा रोना होता था कि भारतीय चैनल के लोग उनसे मदद लेकर उनके खिलाफ ही दिखाते हैं, जिससे देश की काफी बदनामी होती हैं। इसके बाद जब 2001 में नारायण हिती पैलेस में राजा वीरेंद्र की उनके पूरे परिवार सहित गोली मारकर हत्या कर दी गई, तब इंडियन मीडिया ने ये रिपोर्टिंग की कि गोली मारने वाला शख्स उनका बेटा दीपेन्द्र था। उस समय काफी हाय-तौबा मची थी।

बाद में नेपाल सरकार की जांच में भी यही पाया गया कि हत्यारा दीपेन्द्र ही था, लेकिन इन दोनों घटनाओं के बाद इंडियन मीडिया को काठमांडू में जिस तरीके से निशाना बनाया जाता रहा, उसके बाद इंडियन मीडिया ने नेपाल में रुचि दिखानी खत्म कर दी और टीआरपी के खेल में नेपाल उनके लिए महत्वूर्ण नहीं रहा। यही कारण हैं कि माओवादी गतिविधि जब चरम पर थी, तब भारतीय मीडिया ने नेपाल का अघोषित रूप से बहिस्कार किया।

नेपाल के लोगों और मीडिया में इस बात को लेकर भी रोष है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भूकंप की त्रासदी के बीच भारत द्वारा की गई मदद के लिए सोशल मीडिया और खासकर ट्विटर पर वाहवाही बटोर रहे हैं।

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