- इजरायल में मंगलवार को चुनाव होने हैं, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू को समर्थन दिया है
- इजरायल की संसद नेसेट में 120 सीटें होती हैं और सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का बहुमत जरूरी होता है
- चुनाव में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली होती है जिससे गठबंधन सरकार बनने में कई सप्ताह या महीने लग सकते हैं
इजरायल में मंगलवार को चुनाव है. हर तरह की तैयारी की जा चुकी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू को समर्थन दिया है. माना जा रहा है कि अमेरिका के मध्यावधी चुनाव और इजरायल चुनाव समाप्त होते ही एक बार फिर ईरान के खिलाफ दोनों देश कोई बड़ा ऑपरेशन शुरू कर सकते हैं. ऐसे में इजरायल के चुनावों पर पूरी दुनिया की नजर है.
इजरायल में कैसे बनती है सरकार?
- इजरायल की संसद को 'नेसेट' कहा जाता है. संसद में 120 सीटें हैं.
- बहुमत साबित करने के लिए किसी भी सरकार के पास 61 सीटें होनी चाहिए.
- इजरायल में 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व' वाली मतदान प्रणाली का इस्तेमाल होता है.
- इसका अर्थ है कि यहां सरकारें हमेशा कई पार्टियों के गठबंधन से बनती हैं.
- इसका मतलब यह है कि चुनाव के बाद, अगली सरकार बनने में हफ्तों या महीनों का समय भी लग सकता है.
- कारण ये है कि अलग-अलग पार्टियां गठबंधन के लिए मोलभाव करती हैं और समझौते किए जाते हैं.
- अगर कोई भी गुट बहुमत हासिल नहीं कर पाता है, तो मुमकिन है कि एक 'अल्पमत सरकार' सत्ता में आ जाए.
- शुरुआती नतीजे अगले दिन आने की उम्मीद है, जबकि आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को जारी किए जाएंगे.
- जिस पार्टी को ज्यादा सीटें मिलेंगी राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग उस पार्टी के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे.
- अगर वो नेता संसद नाकाम रहती है, तो राष्ट्रपति किसी दूसरे नेता को मौका दे सकते हैं.
- अगर वह भी असफल रहते हैं, तो नेसेट के सदस्य राष्ट्रपति से किसी तीसरे नेता को मौका देने के लिए कह सकते हैं.
- और अगर वह भी नाकाम रहते हैं, तो नए चुनाव कराए जाएंगे.
- 2019 से 2022 के बीच, इजरायल में पांच बार चुनाव हुए, क्योंकि राजनीतिक दल बार-बार आपस में मिलकर सरकार बनाने में नाकाम रहे.
वोटिंग के दिन खराब होगा मौसम
इजरायल में चुनाव के दिन दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में मौसम ठंडा रहने और बारिश होने की संभावना है. दोपहर के समय बारिश तेज होने की उम्मीद है, खासकर दक्षिणी और पूर्वी इलाकों में, जहां आंधी-तूफान, तेज हवाएं और ओले भी गिर सकते हैं. नेगेव और अरावा की सूखी नदी घाटियों, और डेड सी (मृत सागर) के आसपास के इलाकों में अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) आने की भी काफी संभावना है. ऐसे में सवाल उठता है: क्या खराब मौसम इजरायली नागरिकों को मतदान केंद्रों तक जाने से रोकेगा?
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माना जाता है कि बारिश लोगों को घर पर रजाई में दुबके रहने पर मजबूर कर देती है, जबकि सुहावनी धूप उन्हें समुद्र तटों, पार्कों और मॉल की ओर खींच ले जाती है—जो कि मतदान के लिए एक तरह से 'दुश्मन' माने जाते हैं. लेकिन असल में, मतदान केंद्र पूरे 15 घंटे खुले रहते हैं; इजरायल में बारिश अक्सर कुछ देर के लिए ही होती है, और बाहर घूमने-फिरने का कार्यक्रम भी पूरे दिन नहीं चलता.
38 साल बाद समय से चुनाव
इजरायल के नीति-निर्माताओं ने पहले ही मौसम पर विचार कर लिया था. 'बेसिक लॉ: द नेसेट' (इजरायली संसद) में 1959 में किए गए एक संशोधन के तहत, हिब्रू महीने 'हेशवान' को चुनाव की निश्चित तारीख के रूप में तय किया गया था. नेसेट की संविधान समिति के 2006 के दस्तावेजों के अनुसार, यह एक सुविधाजनक महीना है—जो 'तिशरेई' की छुट्टियों के ठीक बाद और कड़ाके की सर्दियों के शुरू होने से पहले आता है. इसके पीछे यह सोच थी कि सुहावना मौसम लोगों के लिए मतदान केंद्रों तक पहुंचना आसान बना देगा.
इजरायल में क्या है चुनावी मूड
लिकुड पार्टी से नगर परिषद की सदस्य चुनी गईं और अब डिमोना में आइसेनकोट के अभियान का नेतृत्व कर रहीं मिशाल एल्मालेम अबू ने कहा कि, हालांकि नेतन्याहू के पास समर्थकों का एक ऐसा कट्टर गुट है, जिसे बदला नहीं जा सकता, लेकिन असली मुकाबला उन मतदाताओं को लेकर है जिन्होंने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है. ये मतदाता "समझते हैं कि हम संकट की स्थिति में हैं" और उन्हें अपनी बात से सहमत किया जा सकता है.
इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के 'विटरबी फैमिली सेंटर फॉर पब्लिक ओपिनियन एंड पॉलिसी रिसर्च' द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, इजरायल के लगभग 13% मतदाताओं ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वे किसे वोट देंगे. 2022 में लिकुड को वोट देने वालों में से, अब केवल 55% लोगों का कहना है कि वे मंगलवार को फिर से इसी पार्टी को वोट देंगे. 15% लोग नेतन्याहू के खिलाफ खड़े दलों का समर्थन करेंगे, जिनमें 8% लोग 'यशार' पार्टी को वोट देंगे. इसके अलावा, 14% लोग दक्षिणपंथी विचारधारा वाले अन्य विकल्पों को चुनेंगे, और 9% मतदाताओं ने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है. खुद नेतन्याहू ने भी आज कहा कि वो चुनाव परिणाम को लेकर चिंतित हैं, मगर हार जाने के बाद भी वो रिटायर नहीं होंगे.
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