
तुर्की में तख्तापलट के बीच सड़कों पर सेना के जवान
नई दिल्ली:
तुर्की में सैन्य तख्तापलट की खबरें आ रही हैं। जहां सेना ने साफ कहा है कि सत्ता पर सेना का कब्जा है, वहीं, सरकार का कहना है कि सैन्य तख्तातलट की कोशिश नाकाम कर दी गई है। राष्ट्रपति एर्दोग़ान ने नागरिकों से सरकार के समर्थन में सड़कों पर उतरने को कहा है। प्रधानमंत्री बिनअली यिलदरिम का कहना है कि सैन्य तख्तातलट की कोशिश नाकाम कर दी गई है।
20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में इस कोशिश के पहले भी ऐसी कोशिशें हो चुकी थीं। तुर्की की सेना जिसने एर्दोगान के नेतृत्व में अपनी प्रमुखता गंवा दी थी वह अब तक खुद को देश के लोकतंत्र की रक्षक समझती रही है और देश में सेक्युलरिज्म को बनाए रखने के लिए सेना अपनी मुख्य भूमिका निभाने की बात कहती रही है।
2002 में एर्दोगान जब देश के प्रधानमंत्री थे तब भी सेना के कई अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था। इन अधिकारियों पर एक गुप्त संस्था एर्जेनकॉन (Ergenekon) का हिस्सा थे जो एर्दोगान की सरकार को हटाना चाह रहे थे।
इससे पहले भी सेना ने आधुनिक तुर्की में सत्ता पर अपना कब्जा किया था। इसके पीछे अकसर यही तर्क दिया गया कि वह देश में सेक्युलेरिटी बचाने के लिए यह कर रही है ताकि तुर्की गणराज्य के संस्थापक और सेना के पूर्व अधिकारी मुस्तफा कमाल अतातुर्क की इस्छाओं का सम्मान हो सके।
27 मई 1960
यह तख्तापलट तब हुआ था जब सत्ताधारी दल ने अतातुर्क द्वारा बनाए गए सख्त कानूनों से इतर धार्मिक गतिविधियों को खुली इजाजत दी जिसमें, सैकड़ों की तादाद में मस्जिदों को खोला गया और अरबी में प्रार्थना को इजाजत दी गई।
जब सेना ने सत्ता की बागडोर संभाली तब इसके प्रमुख कमाल गुर्शेल ने कहा कि इसका मकसद देश में लोकतंत्र और उसके मूल्यों को मजबूती से स्थापित करना है। साथ ही सेना का मकसद लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को सत्ता सौंपना है। गुर्शेल ने 1966 तक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की शक्तियों का प्रयोग किया।
12 मार्च 1971
तुर्की के राजनैतिक हल्कों में तनाव के मद्देनजर और आर्थिक स्थिति पर मंडरा रहे खतरों के बादल के बीच मिलिटरी जनरल ममदुल तगमाक ने सीधे सत्ता अपने हाथ में भले ही न ली हो, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री को सीधे निर्देश देना आरंभ कर दिया। इसे मैमोरेंडम ऑप कू करार दिया गया। प्रधानमंत्री सुलेमान दिमेरल को सेना ने अल्टीमेटम दे दिया था। सेना ने कहा था कि लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत मजबूत और विश्वसनीय सरकार काम करे ताकि वर्तमान अराजकता की स्थिति से बाहर आया जा सके।
इस मैमोरेंडम के बार दिमेरल को इस्तीफा देना पड़ा है। इस बार सेना ने सत्ता सीधे हाथ में नहीं ली थी और 1973 तक बदलती सरकारों के कामकाज पर नजर बनाए रखी थी।
12 सितंबर, 1980
तुर्की में 1973 के बाद भी सामाजिक और राजनीतिक स्थिति सामान्य नहीं हुई। एक बार फिर सेना ने सारा काम अपने हाथ में ले लिया। 1979 के अंत तक कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने सैन्य तख्तापलट का निर्णय लिया। यह निर्णय मार्च में लागू होना था लेकिन, कुछ समय के लिए टाल दिया गया। बाद में 12 सितंबर को इस संबंध में सेना ने राष्ट्रीय चैनल में एक घोषणा कर देश में मार्शल लॉ लगा दिया।
इस समय सेना ने संविधान को समाप्त कर दिया और नया लागू किया जिसे 1982 में रेफरेंडम के लिए लोगों के बीच भी भेजा और इस संविधान को 92 प्रतिशत लोगों को समर्थन भी मिला। नए संविधान के लागू होने के बाद चुनाव हुआ और सैन्य तख्तापलट करने वाले जनरल केनन एवरेन सत्ता में बरकरार रहे। अगले सात सालों तक केनन पद पर रहे।
27 फरवरी 1997
इस साल भी सेना ने सत्ता अपने हाथ में ले ली। इसे पोस्टमॉर्टम कू के नाम से जाना गया। इस समय सुलेमान दिमिरल खुद राष्ट्रपति थे जिन्हें 1971 के तख्तापलट के दौरान हटाया गया था।
इस समय सेना ने तर्क दिया कि देश में राजनीतिक स्तर पर इस्लाम के ज्यादा प्रयोग होने लगा है। सेना के जनरल इस्माइल हक्कल करादेल ने सरकार के प्रमुख नेकमेट्टिन एर्बाकन को कुछ निर्देश दिए। इसमें कई धार्मिक स्कूलों को बंद करने, यूनिवर्सिटी में सिर पर टोपी पहनने पर रोक लगाने के लिए कहा। इसके बाद सेना के दबाव में प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। एक अंतरिम सरकार बनाई और सेना ने 1998 में वेल्फेयर पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया।
इसी साल एर्दोगान जो उस समय इस्तांबुल के मेयर थे, को जेल में भेज दिया गया था, साथ ही पांच सालों के लिए उनके राजनीति करने पर भी रोक लगा दी गई थी। यह सजा उन्हें पब्लिक के बीच में एक इस्लामिक कविता पढ़ने के लिए दी गई थी। 1999 में फिर चुनाव हुए। 2014 में एर्दोगान देश के राष्ट्रपति चुने गए थे।
20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में इस कोशिश के पहले भी ऐसी कोशिशें हो चुकी थीं। तुर्की की सेना जिसने एर्दोगान के नेतृत्व में अपनी प्रमुखता गंवा दी थी वह अब तक खुद को देश के लोकतंत्र की रक्षक समझती रही है और देश में सेक्युलरिज्म को बनाए रखने के लिए सेना अपनी मुख्य भूमिका निभाने की बात कहती रही है।
2002 में एर्दोगान जब देश के प्रधानमंत्री थे तब भी सेना के कई अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था। इन अधिकारियों पर एक गुप्त संस्था एर्जेनकॉन (Ergenekon) का हिस्सा थे जो एर्दोगान की सरकार को हटाना चाह रहे थे।
इससे पहले भी सेना ने आधुनिक तुर्की में सत्ता पर अपना कब्जा किया था। इसके पीछे अकसर यही तर्क दिया गया कि वह देश में सेक्युलेरिटी बचाने के लिए यह कर रही है ताकि तुर्की गणराज्य के संस्थापक और सेना के पूर्व अधिकारी मुस्तफा कमाल अतातुर्क की इस्छाओं का सम्मान हो सके।
27 मई 1960
यह तख्तापलट तब हुआ था जब सत्ताधारी दल ने अतातुर्क द्वारा बनाए गए सख्त कानूनों से इतर धार्मिक गतिविधियों को खुली इजाजत दी जिसमें, सैकड़ों की तादाद में मस्जिदों को खोला गया और अरबी में प्रार्थना को इजाजत दी गई।
जब सेना ने सत्ता की बागडोर संभाली तब इसके प्रमुख कमाल गुर्शेल ने कहा कि इसका मकसद देश में लोकतंत्र और उसके मूल्यों को मजबूती से स्थापित करना है। साथ ही सेना का मकसद लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को सत्ता सौंपना है। गुर्शेल ने 1966 तक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की शक्तियों का प्रयोग किया।
12 मार्च 1971
तुर्की के राजनैतिक हल्कों में तनाव के मद्देनजर और आर्थिक स्थिति पर मंडरा रहे खतरों के बादल के बीच मिलिटरी जनरल ममदुल तगमाक ने सीधे सत्ता अपने हाथ में भले ही न ली हो, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री को सीधे निर्देश देना आरंभ कर दिया। इसे मैमोरेंडम ऑप कू करार दिया गया। प्रधानमंत्री सुलेमान दिमेरल को सेना ने अल्टीमेटम दे दिया था। सेना ने कहा था कि लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत मजबूत और विश्वसनीय सरकार काम करे ताकि वर्तमान अराजकता की स्थिति से बाहर आया जा सके।
इस मैमोरेंडम के बार दिमेरल को इस्तीफा देना पड़ा है। इस बार सेना ने सत्ता सीधे हाथ में नहीं ली थी और 1973 तक बदलती सरकारों के कामकाज पर नजर बनाए रखी थी।
12 सितंबर, 1980
तुर्की में 1973 के बाद भी सामाजिक और राजनीतिक स्थिति सामान्य नहीं हुई। एक बार फिर सेना ने सारा काम अपने हाथ में ले लिया। 1979 के अंत तक कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने सैन्य तख्तापलट का निर्णय लिया। यह निर्णय मार्च में लागू होना था लेकिन, कुछ समय के लिए टाल दिया गया। बाद में 12 सितंबर को इस संबंध में सेना ने राष्ट्रीय चैनल में एक घोषणा कर देश में मार्शल लॉ लगा दिया।
इस समय सेना ने संविधान को समाप्त कर दिया और नया लागू किया जिसे 1982 में रेफरेंडम के लिए लोगों के बीच भी भेजा और इस संविधान को 92 प्रतिशत लोगों को समर्थन भी मिला। नए संविधान के लागू होने के बाद चुनाव हुआ और सैन्य तख्तापलट करने वाले जनरल केनन एवरेन सत्ता में बरकरार रहे। अगले सात सालों तक केनन पद पर रहे।
27 फरवरी 1997
इस साल भी सेना ने सत्ता अपने हाथ में ले ली। इसे पोस्टमॉर्टम कू के नाम से जाना गया। इस समय सुलेमान दिमिरल खुद राष्ट्रपति थे जिन्हें 1971 के तख्तापलट के दौरान हटाया गया था।
इस समय सेना ने तर्क दिया कि देश में राजनीतिक स्तर पर इस्लाम के ज्यादा प्रयोग होने लगा है। सेना के जनरल इस्माइल हक्कल करादेल ने सरकार के प्रमुख नेकमेट्टिन एर्बाकन को कुछ निर्देश दिए। इसमें कई धार्मिक स्कूलों को बंद करने, यूनिवर्सिटी में सिर पर टोपी पहनने पर रोक लगाने के लिए कहा। इसके बाद सेना के दबाव में प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। एक अंतरिम सरकार बनाई और सेना ने 1998 में वेल्फेयर पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया।
इसी साल एर्दोगान जो उस समय इस्तांबुल के मेयर थे, को जेल में भेज दिया गया था, साथ ही पांच सालों के लिए उनके राजनीति करने पर भी रोक लगा दी गई थी। यह सजा उन्हें पब्लिक के बीच में एक इस्लामिक कविता पढ़ने के लिए दी गई थी। 1999 में फिर चुनाव हुए। 2014 में एर्दोगान देश के राष्ट्रपति चुने गए थे।