उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद होंगे या पहले, इसको लेकर राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ती जा रही है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन महीने में पंचायत चुनाव कराने का आदेश दिया है. लेकिन सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी या नहीं, इसको लेकर सीएम योगी आदित्यनाथ की सरकार का रुख एक-दो दिन में साफ होने वाला है. इस बीच पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर का बड़ा बयान सामने आ गया है. राजभर ने शुक्रवार को कहा कि हम पंचायत चुनाव कराने को तैयार है, लेकिन अभी ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट ही नहीं आई है. रिपोर्ट आते ही हम चुनाव की तारीखों का ऐलान कर देंगे.
ओबीसी आरक्षण को लेकर फंसा पेंच
दरअसल, यूपी में ग्राम पंचायतों, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल मई में ही खत्म हो गया था.लेकिन पंचायत चुनाव की मतदाता सूची तैयार न होने और सीटों पर नए सिरे से ओबीसी आरक्षण न किए जाने को लेकर पेंच फंस गया था. इस पर सरकार ने ग्राम प्रधानों, जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुखों को ही प्रशासक बना दिया. हालांकि सरकार के इन फैसलों के खिलाफ कुछ लोग हाईकोर्ट पहुंच गए और समय पर चुनाव कराने की मांग कर दी.
यूपी पंचायत चुनाव में देरी क्यों
सितंबर में पंचायत चुनाव की वोटर लिस्ट भी बन गई, लेकिन ओबीसी कमीशन को सभी 75 जिलों में पिछड़ा वर्ग के सामाजिक आर्थिक प्रतिनिधित्व की समीक्षा कर रिपोर्ट देनी है, जो दिसंबर के पहले संभव नहीं है. बिना ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट के सीटों का आरक्षण तय नहीं हो पाएगा और चुनाव कराना मुमकिन नहीं होगा. राजभर ने कहा कि पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट आते ही चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी और सुप्रीम कोर्ट जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. उन्होंने कहा कि जिलों में मतपत्र भी पहुंच गए हैं और हम चुनाव से पीछे नहीं हट रहे हैं. राजभर ने दावा किया कि पंचायत चुनाव की तारीखों को लेकर सपा नेता हाईकोर्ट गए थे.
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यूपी पंचायत चुनाव में हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया था
हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर को दिए आदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने तक प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने को सहमति दी थी. लेकिन तीन महीने के भीतर ग्राम पंचायत चुनाव कराने की बात कही थी. कोर्ट ने कहा कि प्रधानों के प्रशासक के तौर पर काम करने से ग्राम पंचायतों की विकास योजनाओं पर असर नहीं पड़ेगा. अदालत ने कहा था कि ओबीसी आयोग अपना काम करता रहेगा. चुनाव मौजूद नियम-निर्देशों के मुताबिक कराए जाएं.
राजनीतिक दलों को गुटबाजी का डर
हालांकि अंदरखाने ऐसा कहा जाता है कि विधानसभा चुनाव के पहले कोई भी दल पंचायत चुनाव कराने के पक्ष में नहीं दिखता है. पंचायत चुनाव के दौरान दलीय सीमाएं लांघते हुए प्रत्याशी खुले तौर पर व्यक्तिगत तौर पर समर्थन जुटाते हैं. बड़े पैमाने पर गुटबाजी और वर्चस्व की जंग भी देखने को मिलती है. इससे राजनीतिक दलों को संगठन कमजोर होने का डर रहता है. भाजपा, सपा, कांग्रेस, बसपा या कोई भी दल अभी सांगठनिक मजबूती में जुटा है और ऐसे में वो पार्टी में निचले स्तर पर गुटबाजी को हवा नहीं देना चाहता.
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