कहते हैं कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं और जब इंसाफ की चक्की चलती है, तो बड़े-बड़े रसूखदारों के भी पसीने छूट जाते हैं. कानपुर के महाराजपुर थाने में दर्ज हुई एक एफआईआर (FIR) इस बात का जीता-जागता सबूत है.
पूरे 36 साल के लंबे संघर्ष के बाद, खाकी वर्दी की आड़ में रची गई एक साजिश बेनकाब हुई है. मुफ्त में जमीन का एक टुकड़ा न मिलने पर 1991 में तत्कालीन थानाध्यक्ष ने जो फर्जी एनकाउंटर की कहानी रची थी, वह अब उन्हीं के महकमे के गले की फांस बन गई है. सीबीसीआईडी (CB-CID) की लंबी जांच के बाद 12 पुलिसकर्मियों पर 8 गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है.
क्या था पूरा मामला? एक मुफ्त प्लॉट से शुरू हुई रंजिश
कहानी शुरू होती है साल 1991 से. याचिकाकर्ता देव प्रसाद पाठक कानपुर के श्यामनगर स्थित पीएसी के समीप में प्लाटिंग का काम कर रहे थे. उस वक्त महाराजपुर थाने के थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी थे.
आरोप है कि त्रिपाठी ने देव प्रसाद से 400 वर्ग गज का एक प्लॉट मुफ्त में मांगा. देव प्रसाद पाठक ने कहा कि वह 100 रुपये प्रति वर्ग गज के हिसाब से प्लॉट बेच रहे हैं,
पुलिसवाले होने के नाते वह उन्हें 10-20 रुपये कम में दे देंगे. लेकिन थानाध्यक्ष को यह बात नागवार गुजरी. उन्होंने धमकी दी कि अगर प्लॉट मुफ्त में नहीं दिया, तो मैं तुमको देख लूंगा.
खाकी का खौफ और फर्जी एनकाउंटर की पटकथा
थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी ने अपनी धमकी को सच साबित करने के लिए वर्दी का इस्तेमाल किया. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 23 अगस्त 1991 की रात 12:30 बजे पुलिस ने नरवल मोड़ जीटी रोड पर एक मुठभेड़ दिखाई.
पुलिस ने कहानी गढ़ी कि कुछ बदमाश सड़क पर बबूल के पेड़ डालकर एक डीसीएम ट्रक (UMO-8648) को लूटने का प्रयास कर रहे थे. इसी फर्जी मुठभेड़ में देव प्रसाद पाठक के भाई राकेश पाठक, मामा और अन्य 10 लोगों कुल 12 लोगों को गिरफ्तार दिखा दिया गया. उन पर डकैती की योजना बनाने, आर्म्स एक्ट और विस्फोटक अधिनियम जैसी गंभीर धाराएं लगाकर जेल भेज दिया गया.
हद तो तब हो गई जब पुलिस देव प्रसाद पाठक के घर से उनके पिता की लाइसेंसी दोनाली बंदूक और भाई की लाइसेंसी राइफल उठा ले गई और उसे ही बदमाशों से बरामद अवैध असलहा बताकर मुकदमे में जोड़ दिया.
कैसे खुला पुलिस का झूठ?
पुलिस ने जिस डीसीएम ट्रक की लूट की कहानी रची थी, उसी के चालक उमाशंकर पासी और क्लीनर बृजेन्द्र सिंह ने पुलिस के झूठ की पोल खोल दी. उन्होंने धारा 164 के तहत कोर्ट में बयान दिया कि घटना वाले दिन कोई लूट का प्रयास नहीं हुआ था.
असलियत में, पुलिसवालों ने रामादेवी चौराहे से जबरन उनकी गाड़ी रोकी थी. वह लोग डीसीएम को थाने ले गए और वहां पहले से पकड़ कर लाए गए निर्दोष लोगों के साथ मारपीट की. इसके बाद सादे कागजों पर जबरन हस्ताक्षर करा लिए गए. गवाहों के इस बयान ने केस की दिशा ही बदल दी.
जांच में निर्दोष मिले पीड़ित, 36 साल बाद हुआ एक्शन
मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश शासन ने फरवरी 1991 में ही मामले की जांच CB-CID को सौंप दी थी. CB-CID के तत्कालीन निरीक्षक आरपी सिंह की जांच में दूध का दूध और पानी का पानी हो गया. जांच में सामने आया कि थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी और उनकी पूरी टीम ने अपने फायदे और निर्दोषों की छवि खराब करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए और झूठी चार्जशीट कोर्ट में पेश की.
6 की हो चुकी है मौत, 12 पर अब कसेगा शिकंजा
इस फर्जीवाड़े में शामिल तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी सहित 6 पुलिसकर्मियों दुर्वीन सिंह, रमाकान्त, राजन सिंह, उदयशंकर पाण्डेय, महेन्द्र सिंह की मौत हो चुकी है. इसलिए उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया गया है.
लेकिन बाकी बचे 12 पुलिसकर्मियों जिनमें से अधिकांश अब रिटायर हो चुके हैं, जिनमें तत्कालीन विवेचक रमेश चन्द्र भटोले और अन्य सिपाही शामिल हैं, उनके खिलाफ महाराजपुर थाने में आईपीसी की धारा 194, 195, 182, 211, 218, 220, 323 और 342 के तहत गंभीर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है.
36 साल बाद दर्ज हुई इस एफआईआर ने पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है और यह साबित कर दिया है कि सत्ता और वर्दी का दुरुपयोग करने वालों को एक न एक दिन कानून के कठघरे में खड़ा होना ही पड़ता है.
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