Writer Dies
- सब
- ख़बरें
-
कृष्णा सोबती बहुत याद आएगा आपका जादुई व्यक्तित्व और बेबाकपन
- Friday January 25, 2019
- Written by: नरेंद्र सैनी
हिंदी साहित्य (Hindi Literature) में कृष्णा सोबती (Krishna Sobti) एक अलग ही मुकाम रखती थीं और उनका व्यक्तित्व उनकी किताबों जितना ही अनोखा था. 1980 में कृष्णा सोबती को उनकी किताब 'जिंदगीनामा' के लिए साहित्य अकादेमी (Sahitya Akademi Award) से नवाजा गया था तो 2017 में हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें ज्ञानपीठ (Jnanpith) पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
-
ndtv.in
-
बुकर पुरस्कार विजेता जॉन बर्जर का निधन
- Tuesday January 3, 2017
- Reported by: इंडो-एशियन न्यूज़ सर्विस
बुकर पुरस्कार विजेता, उपन्यास लेखक और एवं कला समीक्षक जॉन बर्जर का निधन हो गया है. वह 90 वर्ष के थे. टेलीग्राफ की खबर के मुताबिक मार्क्सवादी बुद्धिजीवी का निधन पेरिस के एंटोनी उपनगर में हुआ.
-
ndtv.in
-
प्रियदर्शन की बात पते की : महायोद्धा महाश्वेता देवी
- Thursday July 28, 2016
- प्रियदर्शन
दरअसल महाश्वेता अपने-आप में प्रतिरोध की आवाज़ थीं - प्रतिरोध की आस्था थीं। उनको देखकर लेखन और संघर्ष में एक भरोसा जागता था। बेशक, वे पिछले कई दिनों से बीमार थीं - अस्पताल में भर्ती थीं। लेकिन तब भी वे ऐसे समय गईं, जब इस प्रतिरोध, संघर्ष और भरोसे की ख़ासी ज़रूरत थी।
-
ndtv.in
-
कृष्णा सोबती बहुत याद आएगा आपका जादुई व्यक्तित्व और बेबाकपन
- Friday January 25, 2019
- Written by: नरेंद्र सैनी
हिंदी साहित्य (Hindi Literature) में कृष्णा सोबती (Krishna Sobti) एक अलग ही मुकाम रखती थीं और उनका व्यक्तित्व उनकी किताबों जितना ही अनोखा था. 1980 में कृष्णा सोबती को उनकी किताब 'जिंदगीनामा' के लिए साहित्य अकादेमी (Sahitya Akademi Award) से नवाजा गया था तो 2017 में हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें ज्ञानपीठ (Jnanpith) पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
-
ndtv.in
-
बुकर पुरस्कार विजेता जॉन बर्जर का निधन
- Tuesday January 3, 2017
- Reported by: इंडो-एशियन न्यूज़ सर्विस
बुकर पुरस्कार विजेता, उपन्यास लेखक और एवं कला समीक्षक जॉन बर्जर का निधन हो गया है. वह 90 वर्ष के थे. टेलीग्राफ की खबर के मुताबिक मार्क्सवादी बुद्धिजीवी का निधन पेरिस के एंटोनी उपनगर में हुआ.
-
ndtv.in
-
प्रियदर्शन की बात पते की : महायोद्धा महाश्वेता देवी
- Thursday July 28, 2016
- प्रियदर्शन
दरअसल महाश्वेता अपने-आप में प्रतिरोध की आवाज़ थीं - प्रतिरोध की आस्था थीं। उनको देखकर लेखन और संघर्ष में एक भरोसा जागता था। बेशक, वे पिछले कई दिनों से बीमार थीं - अस्पताल में भर्ती थीं। लेकिन तब भी वे ऐसे समय गईं, जब इस प्रतिरोध, संघर्ष और भरोसे की ख़ासी ज़रूरत थी।
-
ndtv.in