अहमदाबाद को 2030 में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों के राष्ट्रमंडल का झंडा और बैटन मिल चुका है. रविवार देर रात ग्लासगो में एक जबरदस्त क्लोजिंग सेरेमनी के बाद कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का समापन हुआ. वहीं एक डेटा ऐसा है जो अधिकारियों को सोचने पर मजबूर कर देगा कि क्या यह और बेहतर हो सकता था? बात यह सिर्फ परफॉर्मेंस के बारे में नहीं है. यह मौके के बारे में है. गेम्स के बहुत छोटे प्रोग्राम का मतलब था कि भारत ने चार साल पहले की तुलना में बहुत कम मेडल इवेंट्स में हिस्सा लिया. और इससे शायद देश ने टॉप तीन में जगह बनाने का असली मौका भी गंवा दिया.
बॉक्सिंग में जबरदस्त प्रदर्शन के चलते भारत ने ग्लासगो में 39 मेडल अपने नाम किए. यह बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में जीते गए 61 मेडल्स से काफी कम है. हालांकि, इसका कारण परफॉर्मेंस में गिरावट नहीं है, यह बहुत कम किया गया स्पोर्टिंग प्रोग्राम है. बर्मिंघम में, भारत ने 12 अलग-अलग स्पोर्ट्स में मेडल जीते थे. ग्लासगो में, यह संख्या घटाकर सिर्फ पांच रह गई. पैरा इवेंट्स को जोड़े तो यह छह हो जाती है.
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ऐसे छह स्पोर्ट्स जिनमें भारतीय एथलीट्स का दबदबा रहता है, उन्हें इस बार हटा दिया गया था. इससे पिछले एडिशन में भारत के जीते हुए करीब 30 मेडल के दरवाज़े लगभग बंद हो गए. अगर वे इवेंट्स प्रोग्राम में बने रहते और भारत ने वैसे ही नतीजे दिए होते तो मेडल टैली बहुत अलग होती. कनाडा, जो मेडल टेबल में तीसरे नंबर पर रहा, भारत उससे आगे निकल सकता था.
बर्मिंघम में 12 इवेंट्स में भारत ने 61 मेडल जीते. ग्लासगो में कई पारंपरिक मेडल इवेंट्स शेड्यूल से गायब थे. कुश्ती, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, स्क्वैश, हॉकी, क्रिकेट जैसे खेल भारत के लिए मुकाबला करने के लिए थे ही नहीं. यहीं पर मेडल का अंतर था. इन इवेंट्स में भारत ने 30 मेडल जीते थे.
| बर्मिंगघ 2022 - 61 मेडल | खेल | ग्लासगो 2026- 39 मेडल |
| 8 | एथलेटिक्स/ एथलेटिक्स-पैरा एथलेटिक्स | 16 |
| 7 | बॉक्सिंग | 10 |
| 10 | वेटलिफ्टिंग | 8 |
| 1 | पैरा पावरलिफ्टिंग | 1 |
| 6 | बैडमिंटन | शामिल नहीं |
| 2 | हॉकी | शामिल नहीं |
| 1 | क्रिकेट | शामिल नहीं |
| 3 | जूडो | 3 |
| 2 | लॉन बॉल्स | 0 |
| 2 | स्क्वैश | शामिल नहीं |
| 7 | टेबल टेनिस/ पैरा टेबल टेनिस | शामिल नहीं |
| 12 | कुश्ती | शामिल नहीं |
इन इवेंट्स के न होने से मेडल टेबल की स्थिति बदली बल्कि खेलों के शुरू होने से पहले ही तीसरे नंबर के लिए मुकाबला बहुत मुश्किल हो गया था. और इसीलिए दोनों कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल की कुल संख्या की तुलना करने से पूरी कहानी पता नहीं चलती. भारत का सबसे सफल कॉमनवेल्थ गेम्स दिल्ली 2010 रहा, जहाँ होस्ट देश ने रिकॉर्ड 101 मेडल जीते.
ग्लासगो 2026 ने नए चैंपियन, शानदार परफॉर्मेंस और यादगार पल दिए हैं. लेकिन इसने यह भी दिखाया है कि गेम्स प्रोग्राम का आकार फाइनल मेडल स्टैंडिंग पर कितना असर डाल सकता है. फाइनल मेडल टेबल चाहे जो भी बताए, यह विदेशी धरती पर भारत का अब तक का सबसे अच्छा कॉमनवेल्थ गेम्स कैंपेन है. नंबर पूरी कहानी नहीं बताते.
मीराबाई चानू के कोच की भी यही सोचते हैं. NDTV से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा,"विदेश में कॉमनवेल्थ गेम्स में मेरे ख्याल से यह भारत का बेस्ट प्रदर्शन है. वेटलिफ्टर्स ने एक गोल्ड समेत 8 मेडल जीते हैं. कुछ वेट लिफ्टर मेडल नहीं जीत पाए मगर उनका प्रदर्शन अच्छा रहा है. भारतीय बॉक्सर्स ने तो इतिहास कायम कर दिया.जूडो के खिलाड़ियों ने भी कमल का प्रदर्शन किया है. पैरा एथलीटों ने शानदार प्रदर्शन किया. नीरज चोपड़ा और यशवीर जैसे कई भारतीय खिलाड़ियों ने एक गेम्स में दो-दो पोडियम पर जगह बनाई. भारत के लिए इस बार ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स कमल के साबित हुए हैं. "
भारत ने ग्लासगो में सिर्फ 8 मेडल इवेंट्स में हिस्सा लिया. यह उन मौकों की बात थी जो कभी दिए ही नहीं गए. भारत ने फिर भी हर तरफ शानदार परफॉर्मेंस दी. यही वजह है कि फैंस के मन में एक ही सवाल ज़रूर आएगा: क्या होता अगर यह छोटा कॉमनवेल्थ गेम्स नहीं होता? क्योंकि पूरे प्रोग्राम के साथ, भारत शायद टॉप तीन में जगह बनाने का जश्न मना रहा होता और मीराबाई चानू के कोच का भी यही मानना है.
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