Hamidia Hospital Bhopal: हमीदिया अस्पताल के बर्न वार्ड में जैसे ही मैं और मेरा कैमरापर्सन दाखिल हुए, कुछ ही मिनटों में पसीना शरीर से बहने लगा. हवा भारी, चिपचिपी और दम घोंटने वाली थी. उमस ऐसी कि दस मिनट खड़ा रहना मुश्किल हो जाए. ऐसे में एक सवाल लगातार मन में उठ रहा था कि 70 से 90 प्रतिशत तक झुलसे मरीज आखिर इस वार्ड में दिनों और हफ्तों तक कैसे रह रहे होंगे? यह कोई संसाधनों की कमी से जूझ रहा छोटा जिला अस्पताल नहीं है. यह मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल हमीदिया अस्पताल है, जहां प्रदेश भर से सबसे गंभीर रूप से झुलसे मरीज इलाज के लिए लाए जाते हैं. लेकिन भीषण गर्मी के बीच यहां का बर्न वार्ड किसी भट्ठी से कम नहीं दिखता.
गत्ते के पंखे और बर्फ की सिल्लियां
अस्पताल के आईसीयू, ऑपरेशन थिएटर और वार्डों में लगे एयर कंडीशनर महीनों से बंद पड़े हैं. जिस वार्ड में तापमान नियंत्रित रखना संक्रमण और जीवन-मृत्यु के बीच का अंतर तय कर सकता है, वहां मरीज एयर कूलर, बर्फ की सिल्ली और गत्ते के पंखों के सहारे जिंदगी से जंग लड़ रहे हैं. वार्ड के भीतर मरीजों की कराहें गलियारों तक सुनाई दे रही थीं. कोई दर्द से तड़प रहा था, कोई पट्टियों में लिपटा निढाल पड़ा था. उनके परिजन हाथों से हवा कर रहे थे, मानो यही उनका इलाज हो.
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Hamidia Hospital Bhopal: मरीजों के परिजन खुद ही कूलर का इंतजाम कर अपने मरीजों की देखभाल कर रहे हैं. फोटो- अनुराग द्वारी
अपनों को तड़पता देख फूटा परिजनों का गुस्सा
बर्न मरीजों के लिए गर्मी सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर चिकित्सीय खतरा है. वार्ड में भर्ती मोहम्मद इशाक के भाई एक हादसे में बुरी तरह झुलस गए थे. इशाक ने कहा, "न पंखे हैं, न कूलिंग का इंतजाम और एसी भी बंद है. सारे मरीज परेशान हैं. पहले हम गत्ते से हवा करते थे, फिर घर से दो कूलर और बर्फ लेकर आए. सब कुछ हमें खुद खरीदना पड़ा." उनकी आवाज में गुस्सा भी था और बेबसी भी. "मेरा भाई काम करते समय जल गया था... यह कमरा भट्ठी जैसा लगता है," उन्होंने कहा.कई अन्य मरीजों के परिजनों ने भी एनडीटीवी को बताया कि मरीज गर्मी सहन नहीं कर पा रहे, इसलिए वे खुद कूलर, बर्फ और यहां तक कि बिजली के एक्सटेंशन बोर्ड तक की व्यवस्था कर रहे हैं.
कूलर की हवा में सर्जरी: भगवान भरोसे आईसीयू
लेकिन सबसे चिंताजनक तस्वीर ऑपरेशन थिएटर की है. बर्न ओटी का एयर कंडीशनिंग सिस्टम भी बंद पड़ा है. नतीजा यह है कि झुलसे मरीजों की सर्जरी साधारण एयर कूलरों के सहारे की जा रही है. वहीं आईसीयू में 70 से 90 प्रतिशत तक जले मरीजों को केवल कूलरों की हवा के भरोसे रखा गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह व्यवस्था बेहद जोखिम भरी है.

Hamidia Hospital Bhopal: गंभीर रुप से झुलसे मरीजों का एसी के बिना बुरा हाल है. अस्पताल प्रशासन ने कई बार चिट्ठियां लेकिन अफसरों ने अभी तक मंजूरी नहीं दी है. फोटो- अनुराग द्वारी
कूलर बढ़ा रहे मौत का खतरा: क्या हैं मेडिकल मानक?
बर्न मरीज अस्पताल के सबसे संवेदनशील मरीजों में गिने जाते हैं. जब त्वचा जल जाती है तो शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा परत खत्म हो जाती है. ऐसे में बैक्टीरिया, फंगस और वायरस सीधे शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. यही वजह है कि बर्न आईसीयू और बर्न ओटी को हाई-स्टेरिलिटी जोन माना जाता है. राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) और NABH के मानकों के अनुसार ऐसे वार्डों में नियंत्रित तापमान, नियंत्रित आर्द्रता, फ़िल्टर्ड एयर सिस्टम और Positive Pressure Ventilation होना अनिवार्य है.लेकिन कूलर इन सभी मानकों के ठीक विपरीत काम करते हैं. वे बिना फिल्टर की हवा को तेजी से फैलाते हैं, नमी बढ़ाते हैं और संक्रमण फैलने का खतरा कई गुना बढ़ा देते हैं. गंभीर रूप से झुलसे मरीज के लिए ऐसा संक्रमण जानलेवा साबित हो सकता है.
12 महीनों से भेज रहे चिट्ठियां पर नहीं जागा प्रशासन
सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि डॉक्टर महीनों से इस स्थिति को लेकर अधिकारियों को चेतावनी दे रहे थे. एनडीटीवी को मिले आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि जून 2025 से बर्न एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग लगातार पत्र और रिमाइंडर भेज रहा है. नए बर्न वार्ड में एसी लगाने और खराब एसी की मरम्मत के लिए कई बार अनुरोध किया गया, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही.16 अक्टूबर 2025 को भेजे गए एक "अंतिम रिमाइंडर" में विभागाध्यक्ष ने बताया था कि पांच एसी करीब पांच महीने से बंद पड़े हैं, जिससे बर्न ओटी और गंभीर मरीजों के इलाज पर सीधा असर पड़ रहा है. इसके बाद भी चेतावनियों का सिलसिला जारी रहा.
इन दस्तावेजों में बार-बार लिखे गए पत्र, रिमाइंडर, फॉलो-अप और वर्क ऑर्डर दिखाई देते हैं. जो दिखाई नहीं देता, वह है कोई ठोस कार्रवाई.
'सिस्टम' की फाइलों में अटकी मरीजों की सांसें
बर्न एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. अरुण भटनागर का कहना है कि बिजली के काम के लिये राशि स्वीकृत हो चुकी है. लेकिन मामला विभिन्न विभागों के बीच अटका हुआ है. लोक निर्माण विभाग (PWD) का कहना है कि आउटडोर यूनिट लगाने से पहले बिजली के कुछ काम पूरे होने चाहिए, जबकि अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी लंबित हैं. इस बीच फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग तक घूमती रहीं और मरीज गर्मी में तड़पते रहे. सरकारी भाषा में इसे "समन्वय की समस्या" कहा जा सकता है. लेकिन 41 डिग्री तापमान में झुलसे मरीज के सिरहाने बैठे परिजनों के लिए यह सिर्फ समन्वय की समस्या नहीं, बल्कि एक ऐसा संवेदनहीन तंत्र है जिसने उन्हें उनके सबसे कठिन समय में बिल्कुल अकेला छोड़ दिया है.
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