हवा में उड़ते हुए प्लेन को आपने कई बार देखा होगा और सोचा होगा कि जब ये लैंड होता है तो इसके छोटे टायर कैसे हजारों टन का वजन संभाल लेते हैं. लैंडिंग के बाद पूरा वजन विमान के टायरों पर ही आता है और यही उसे सही जगह तक पहुंचाने का काम करते हैं. जब भी प्लेन लैंड होता है तो इन टायरों पर तगड़ा झटका लगता है और इसके बावजूद इनका कुछ भी नहीं बिगड़ता. ऐसे में सवाल है कि प्लेन के टायरों में कौन सी गैस डाली जाती है, जो इतने प्रेशर को भी आराम से झेल सकती है.
प्लेन के टायरों में भरी जाती है ये गैस
प्लेन के टायरों में कार या फिर बाइक में डाली जाने वाली साधारण हवा नहीं डाली जाती है. इसके लिए नाइट्रोजन गैस का इस्तेमाल होता है. यही वजह है कि प्लेन लैंडिंग के दौरान आराम से रनवे पर चलने लगता है और टायर सुरक्षित रहते हैं. दरअसल इस गैस से टायर फटने या फिर आग लगने का खतरा काफी कम होता है. लैंडिंग के दौरान प्लेन के टायरों में तेज घर्षण होता है, जिससे काफी ज्यादा गर्मी पैदा होती है. ऑक्सीजन वाली हवा से टायर में आसानी से आग लग सकती है, वहीं नाइट्रोजन के साथ ऐसा नहीं हो सकता है.
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टायर इतना वजन कैसे संभाल लेते हैं?
एक प्लेन का वजन सैकड़ों टन तक हो सकता है. ऐसे में टायर इतना वजन कैसे संभाल लेते हैं? प्लेन के टायरों में कार के मुकाबले करीब 5 गुना ज्यादा तक का प्रेशर भरा जाता है. ये 200 से लेकर 300 तक हो सकता है. प्लेन में लगे टायर सिर्फ रबर के बने नहीं होते हैं, इनमें सिंथेटिक रबर के अलावा नायलॉन, केवलार और स्टील की परतें डाली जाती हैं. यही वजह है कि ये काफी मजबूत होते हैं.
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