- उत्तराखंड के जंगलों में बर्फबारी और बारिश न होने से प्राकृतिक नमी खत्म होने से आग बांझ के जंगलों तक फैल गई है.
- गढ़वाल मंडल में 278 और कुमाऊं मंडल में लगभग 69 जंगलों में आग लगी है.
- आग की घटनाओं में पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग और चमोली जिले सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं.
उत्तराखंड में इस समय जंगलों में भीषण आग लगी हुई है. राज्य के कई जिलों में वन क्षेत्र जल रहे हैं. आम तौर पर उत्तराखंड में 1000 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले चीड़ के जंगलों में आग लगती है. लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा गंभीर हो गई है, क्योंकि आग अब बांझ के जंगलों तक पहुंच गई है. बांझ के जंगल लगभग 4000 से 8000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं और इस बार आग करीब 6000 फीट तक फैल चुकी है.
बारिश और बर्फबारी नहीं होने से जंगलों की प्राकृतिक नमी खत्म
उत्तराखंड के जंगल पर्यावरण के लिए बेहद संवेदनशील माने जाते हैं, क्योंकि यहां लगने वाली आग का असर हिमालय के ग्लेशियरों तक महसूस किया जा सकता है. बढ़ते तापमान, चाहे वह जमीन का हो या वायुमंडल का, आग को तेजी से ऊंचाई वाले इलाकों तक ले जा रहा है. लंबे समय तक बारिश और बर्फबारी नहीं होने से बांझ के जंगलों की प्राकृतिक नमी खत्म हो गई है, जिससे वे भी आग की चपेट में आ गए हैं.
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बांझ के जंगल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. ये मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, जमीन में नमी बनाए रखते हैं और भूमिगत जल तथा प्राकृतिक जल स्रोतों को रिचार्ज करने में अहम भूमिका निभाते हैं. बारिश और बर्फ का पानी इन पेड़ों की जड़ों के माध्यम से संरक्षित रहता है, जिससे पहाड़ों के जल स्रोत जीवित रहते हैं. लेकिन इस समय बांझ के जंगल गंभीर खतरे में हैं. अगर आग पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो प्राकृतिक जल स्रोतों को बनाए रखने वाला यह महत्वपूर्ण वन तंत्र प्रभावित हो सकता है.

गढ़वाल क्षेत्र में आग की घटनाएं सबसे ज्यादा
फिलहाल सबसे अधिक आग पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों में लगी हुई है, जहां बांझ के जंगल भी इसकी चपेट में आ गए हैं. उत्तराखंड में गढ़वाल क्षेत्र में आग की घटनाएं सबसे ज्यादा सामने आई हैं. 15 फरवरी 2026 से शुरू हुए फायर सीजन में 25 मई 2026 तक 381 आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 322.07 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ है और एक व्यक्ति की मौत हुई है, जो आग बुझाने के काम में लगा था.
उत्तराखंड वन विभाग के मुख्य वन संरक्षक और वनाग्नि-आपदा प्रबंधन के नोडल अधिकारी सुशांत पटनायक के अनुसार गढ़वाल मंडल में 278 और कुमाऊं मंडल में करीब 69 आग की घटनाएं हुई हैं, जबकि वन्यजीव संरक्षित क्षेत्रों में 34 घटनाएं दर्ज की गई हैं. उन्होंने बताया कि कम बारिश और बर्फबारी के कारण आग तेजी से ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक फैल रही है. उन्होंने यह भी कहा कि बांझ के जंगलों में आमतौर पर नमी रहती है, लेकिन इस बार सूखे के कारण आग वहां तक पहुंच गई है और इसकी वजहों का अध्ययन किया जाएगा.
- उत्तराखंड में पिछले 10 सालों की बात करें तो साल 2016 में 2074 आग लगने की घटनाएं हुई थी, जिसमें 4433.75 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुआ था. 2016 में 6 लोगों की मौत हुई थी और 31 लोग घायल हुए थे.
- 2017 में 805 जगह पर आग लगने की घटनाएं हुई थी. 1244.64 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुआ था और एक व्यक्ति घायल हुआ था.
- 2018 में 2150 जगह पर आग लगने की घटनाएं हुई थी. 4480.04 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुआ था और 6 लोग घायल हुए थे.
- 2019 में 2158 जगह पर आग लगने की घटनाएं हुई थी. 2981.55 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुए थे. एक व्यक्ति की मौत हुई थी और 15 लोग घायल हुए थे.
- 2020 में 135 जगह पर आग लगने की घटनाएं हुई थी. 172.69 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुआ था. दो लोगों की मौत हुई थी और एक घायल हुआ था.
- 2021 में 2813 जगह पर आग लगने की घटनाएं हुई थी. 3943.89 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुआ था. 8 लोगों की मौत हुई थी और तीन लोग घायल हुए थे.
- 2022 में 2186 जगह पर आग लगने की घटनाएं हुई थी. 3425.05 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुआ था. दो लोगों की मौत और साथ तो घायल हुए थे.
- 2023 में 773 जगह पर आग लगने की घटनाएं हुई थी. 918.55 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुआ था. तीन लोग घायल हुए थे और तीन लोगों की मौत हुई थी.
- 2024 में 1276 जगह पर आग लगने की घटनाएं रिकॉर्ड हुई थी. 1771.66 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुए थे. 13 लोगों की मौत हुई थी और साथ लोग घायल हुए थे.
- 2025 में 268 जगह पर आग लगने की घटनाएं रिकॉर्ड की गई. 310.95 हेक्टेयर जंगल जलकर प्रभावित हुआ दो लोग घायल हुए थे.
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