तीन दशकों से ज्यादा समय तक, C-60 कमांडो फोर्स का नाम महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में काम करने वाले नक्सली विद्रोहियों के मन में डर पैदा करता रहा है. इस फोर्स को नक्सलियों की ही रणनीति अपनाकर उनके आंदोलन की कमर तोड़ने का श्रेय दिया जाता है. हालांकि, इस साल की शुरुआत में महाराष्ट्र के नक्सल-मुक्त होने के बाद, इस खास कमांडो फोर्स के अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे हैं. जहां बदले हुए हालात में C-60 की जरूरत पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं इस फोर्स को बनाने वाले IPS अधिकारी ऋषिपाल रघुवंशी का मानना है कि इसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए. हाल ही में, महाराष्ट्र पुलिस के डायरेक्टर जनरल सदानंद दाते ने रघुवंशी और उन दूसरे पुलिसकर्मियों को सम्मानित करने के लिए एक प्रोग्राम किया, जिन्होंने राज्य में नक्सलवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई में योगदान दिया था.
यह सम्मान इस साल की शुरुआत में पब्लिश हुई किताब 'ट्रबलशूटर – द अनटोल्ड एनकाउंटर्स ऑफ IPS ऑफिसर KP रघुवंशी' के बाद दिया गया. इस किताब में बताया गया है कि कैसे रघुवंशी ने दिसंबर 1990 में गढ़चिरौली में एसपी के तौर पर काम करते हुए C-60 कमांडो फोर्स बनाई थी.
रघुवंशी ने दुश्मन की ही रणनीति अपनाकर और स्थानीय आदिवासी परिवारों के युवाओं को शामिल करके एक कमांडो फोर्स बनाकर बाजी पलट दी. उन्हें आंध्र प्रदेश के 'ग्रे हाउंड्स' ने ट्रेनिंग दी थी, जो जंगल में लड़ाई (जंगल वॉरफेयर) के माहिर माने जाते थे.
सरेंडर को मजबूर हुए सैकड़ों नक्सली...
शुरुआत में 60 कमांडो वाली इस फोर्स का दायरा वक्त के साथ बढ़ा और इसमें 961 जवानों वाली 29 टीमें शामिल हो गईं. अपनी आक्रामक और सख्त रणनीति के दम पर, C-60 ने 363 माओवादी विद्रोहियों को मार गिराया और 558 को गिरफ्तार किया. इस फोर्स ने 861 नक्सलियों को सरेंडर करने पर भी मजबूर किया. सरेंडर करने वालों में कई कुख्यात नक्सल कमांडर और ऐसे लड़ाके शामिल थे जिन पर कई हत्याओं के आरोप थे.
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इस साल की शुरुआत में मल्लोजुला राव उर्फ भूपति, यमुनक्का, तारक्का और मधु वेल्डा जैसे प्रमुख नक्सलियों के सरेंडर ने महाराष्ट्र में माओवादी आंदोलन को करीब खत्म कर दिया है. नक्सलवाद के खिलाफ इस लड़ाई में 244 पुलिसकर्मी और 609 आम नागरिक भी मारे गए.
अब, जब महाराष्ट्र को नक्सल-मुक्त बनाने का टार्गेट काफी हद तक हासिल हो चुका है, तो C-60 कमांडो फोर्स का भविष्य तय नहीं है. जहां कुछ लोग नए हालात में इसकी जरूरत पर सवाल उठाते हैं, वहीं रघुवंशी का नजरिया बिल्कुल साफ है. उनका मानना है कि C-60 फोर्स को बनाए रखा जाना चाहिए क्योंकि बंदूकों वाला नक्सलवाद तो खत्म हो गया है, लेकिन नक्सली विचारधारा अभी भी जिंदा है. ऐसी विचारधाराओं में हिंसा को फिर से भड़काने की क्षमता है और इसलिए C-60 की अहमियत बनी हुई है. हालांकि, वे महाराष्ट्र पुलिस से डायरेक्टर जनरल के पद से रिटायर हो चुके हैं, फिर भी वे C-60 के जवानों के संपर्क में रहते हैं और अक्सर गढ़चिरौली जाते रहते हैं.
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