झारखंड में सरकारी नौकरी की परीक्षाओं को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार तेज हो रहा है. शुरुआत में छात्रों की मांग सिर्फ परीक्षा रद्द करने की थी, लेकिन CID की जांच आगे बढ़ने के साथ मामला अब बड़ा होता जा रहा है. जांच में आयोग के अधिकारियों, परीक्षा कराने वाली निजी कंपनी, उसके कर्मचारियों, बिचौलियों और कुछ अभ्यर्थियों की भूमिका सामने आई है.
10 अगस्त को JPSC के पूर्व चेयरमैन एल. खियांग्ते की गिरफ्तारी के बाद इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या 20 हो गई है. इससे पहले 7 अगस्त तक CID 19 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी थी.
सबसे बड़ी कड़ी- अभय कुमार तिवारी
इस मामले में अभय कुमार तिवारी उर्फ मनोज कुमार तिवारी का नाम लगातार सामने आ रहा है. तिवारी गोड्डा में प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी के पद पर सरकारी नौकरी कर रहा था. इसके साथ ही उसका संबंध परीक्षा कराने वाली निजी कंपनी TSR Data Processing Private Limited यानी TDPL से भी बताया गया है. वह कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर के तौर पर काम करता था.
एक ही व्यक्ति का सरकारी नौकरी में होने के साथ परीक्षा कराने वाली कंपनी से जुड़ा होना CID की जांच का अहम हिस्सा है. जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि तिवारी के संपर्क में कौन-कौन लोग थे और परीक्षा की प्रक्रिया में उसकी क्या भूमिका थी.
जांच से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार अभय तिवारी ने JSSC-CGL परीक्षा में 48वीं रैंक हासिल की थी. उसके भाई अक्षय तिवारी और भाई की पत्नी सुष्मा कुमारी के भी इसी परीक्षा में चयनित होने की बात सामने आई है. इसके बाद छात्रों ने CGL परीक्षा की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसकी जांच की मांग की है.
पैसों का कितना लेन-देन?
मामले में पेपर लीक और पैसे के लेन-देन के आरोप भी सामने आए हैं. CID की पूछताछ से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार बोकारो में करीब 15 अभ्यर्थियों से परीक्षा से पहले प्रश्न और उत्तर देने के नाम पर लगभग 12-12 लाख रुपये लिए गए. इस हिसाब से करीब 1.80 करोड़ रुपये के लेन-देन की बात सामने आई है.
यह भी आरोप है कि परीक्षा से पहले करीब 65 सवाल और उनके जवाब कुछ अभ्यर्थियों को दिए गए और उन्हें याद कराया गया. अगर जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं तो मामला सिर्फ परीक्षा में गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे एक बड़े नेटवर्क के तौर पर देखा जा सकता है. हालांकि, इन आरोपों की अभी अदालत में पुष्टि नहीं हुई है.
परीक्षा कराने वाली कंपनी सवालों में
परीक्षा कराने वाली कंपनी TDPL की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. रिपोर्टों के अनुसार झारखंड कर्मचारी चयन आयोग ने 20 मई 2025 को TDPL को ब्लैकलिस्ट और डी-लिस्ट किया था. इसके बावजूद बाद में JPSC में कंपनी को काम मिलने की प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई.
आरोप है कि खुली निविदा के बजाय नामांकन के आधार पर कंपनी को काम दिया गया. उस समय JPSC की परीक्षा नियंत्रक की ओर से इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताए जाने की बात भी सामने आई है.
इसी मामले में JPSC की तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता को गिरफ्तार किया गया है. TDPL के निदेशक रामवीर सिंह भी गिरफ्तार आरोपियों में शामिल हैं. CID ने TDPL के रांची और लखनऊ स्थित कार्यालयों को सील कर वहां मौजूद दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच शुरू की है.
अब तक कौन-कौन गिरफ्तार?
मामले में CID ने लगातार गिरफ्तारियां की हैं. शुरुआती दौर में श्वेता गुप्ता, रामवीर सिंह, मोहम्मद उस्मान, मोहम्मद एबाद और अभय तिवारी को गिरफ्तार किया गया. इसके बाद अरविंद मंडल समेत कई अन्य लोग भी जांच के घेरे में आए.
4 अगस्त को उमेश कुमार, बुद्धेश्वर भगत और रमेश कुमार को गिरफ्तार किया गया. इसके अगले दिन 5 अगस्त को पांच और लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें JPSC के पूर्व चेयरमैन एल. खियांग्ते के कंप्यूटर ऑपरेटर, तीन छात्र और एक अन्य आरोपी शामिल बताए गए.
इसके बाद 10 अगस्त को CID ने JPSC के पूर्व चेयरमैन एल. खियांग्ते को गिरफ्तार कर लिया. इससे पहले उनसे कई बार पूछताछ हो चुकी थी. उनके सरकारी आवास और JPSC कार्यालय समेत कई जगहों पर छापेमारी भी की गई थी.
कमीशन का खेल
पूछताछ से जुड़ी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अभय तिवारी ने एल. खियांग्ते पर TDPL को काम दिलाने के बदले करीब दो करोड़ रुपये लेने और 20 प्रतिशत कमीशन लेने का आरोप लगाया है. हालांकि, यह फिलहाल एक आरोपी की ओर से लगाया गया आरोप है. इसकी सच्चाई जांच पूरी होने के बाद ही साफ होगी. खियांग्ते पहले यह कह चुके हैं कि TDPL को ब्लैकलिस्ट किए जाने की जानकारी उन्हें कंपनी के चयन के समय नहीं थी.
अभय तिवारी और TDPL की भूमिका सामने आने के बाद अब JSSC-CGL परीक्षा भी सवालों के घेरे में है. छात्रों का कहना है कि परीक्षा की पूरी प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए. छात्र परीक्षा रद्द कर दोबारा कराने और पूरे मामले की CBI जांच की मांग कर रहे हैं.
हालांकि सरकार फिलहाल JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने के पक्ष में नहीं है. सरकार का कहना है कि परीक्षा की प्रक्रिया अदालतों की निगरानी में हुई थी और कई चयनित अभ्यर्थी अभी नौकरी कर रहे हैं. ऐसे में पूरी परीक्षा को रद्द करना कानूनी रूप से आसान नहीं होगा.
मामले में अब आर्थिक जांच भी जुड़ गई है. सरकार ने JPSC परीक्षाओं से जुड़े कथित वित्तीय लेन-देन की जांच ED से कराने पर सहमति जताई है. CID पेपर लीक और कथित आपराधिक साजिश की जांच कर रही है, जबकि ED पैसों के लेन-देन और संभावित मनी ट्रेल की जांच कर सकती है.
इसी बीच JPSC के तीन मौजूदा सदस्यों डॉ. अजिता भट्टाचार्य, डॉ. अनीमा हांसदा और डॉ. जमाल अहमद के इस्तीफे ने भी मामले को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.
फिलहाल JPSC-JSSC विवाद सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं रह गया है. यह झारखंड की सरकारी भर्ती व्यवस्था और उस पर छात्रों के भरोसे का भी सवाल बन गया है. छात्र चाहते हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और यह साफ हो कि सरकारी नौकरी की परीक्षा में गड़बड़ी कहां हुई और इसके पीछे कौन लोग थे.
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