- भारतीय कंपनियों से साझेदारी कर भविष्य के टैंकों के लिए कामिकाजे ड्रोन विकसित करने का प्रस्ताव मांगा है.
- कामिकाजे ड्रोन दुश्मन के टैंक को नष्ट करने के लिए 500 से 600 मिमी मोटी स्टील सुरक्षा भेद सकेंगे.
- ये ड्रोन कम से कम पंद्रह किलोमीटर की मारक दूरी और करीब पैंतालीस मिनट तक हवा में रहने की क्षमता रखेंगे.
भारत के भविष्य के टैंक अब 'कामिकाजे ड्रोन' से लैस हो सकते हैं. इसके लिए आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड यानी AVNL ने भारतीय कंपनियों से साझेदारी का प्रस्ताव मांगा है. सरकारी रक्षा कंपनी AVNL भविष्य के युद्ध टैंकों के लिए नए ड्रोन सिस्टम तैयार करना चाहती है. यह परियोजना चेन्नई के अवाडी स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री के जरिए चलाई जा रही है. इसका मकसद भारतीय सेना के भविष्य के टैंकों में आधुनिक ड्रोन तकनीक जोड़ना है.
AVNL तीन तरह के ड्रोन विकसित करना चाहती है. इनमें कामिकाज़े ड्रोन, निगरानी ड्रोन और टेथर्ड ड्रोन शामिल हैं. कामिकाज़े ड्रोन को ‘लोइटरिंग म्यूनिशन' भी कहा जाता है. ये ड्रोन लक्ष्य के ऊपर मंडराते रहते हैं और सही समय पर हमला करते हैं. इन्हें आत्मघाती ड्रोन भी कहा जाता है. इन ड्रोन का इस्तेमाल दुश्मन के टैंक और बख्तरबंद वाहनों को नष्ट करने के लिए होगा. AVNL चाहती है कि ये ड्रोन कम से कम 500 मिमी मोटी स्टील जैसी सुरक्षा को भेद सकें. कंपनी की कोशिश है कि यह क्षमता 600 मिमी तक पहुंचे.
ड्रोन की मारक दूरी कम से कम 15 किलोमीटर
इन ड्रोन में ‘टॉप अटैक' क्षमता भी होगी. यानी ये दुश्मन के टैंक पर ऊपर से हमला करेंगे. टैंक का ऊपरी हिस्सा अपेक्षाकृत कमजोर माना जाता है. इन ड्रोन की मारक दूरी कम से कम 15 किलोमीटर होगी. ये करीब 45 मिनट तक हवा में रह सकेंगे. लक्ष्य पर हमला करने में इनकी गलती की आशंका एक मीटर से भी कम रखने की योजना है. ये ड्रोन रेगिस्तान, जंगल, पहाड़ और शहर जैसे हर इलाके में काम कर सकेंगे. इन्हें 18 हजार फुट की ऊंचाई तक इस्तेमाल करने की योजना है.
ऑटोमैटिक नेविगेशन और टारगेट ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं
AVNL निगरानी के लिए बिना तार वाले ड्रोन भी चाहती है. ये ड्रोन 20 किलोमीटर दूर तक 2K वीडियो भेज सकेंगे. इन ड्रोन को इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के माहौल में भी काम करना होगा. यानी अगर दुश्मन सिग्नल जाम करने की कोशिश करे, तब भी ये ड्रोन सक्रिय रहें. इनमें एन्क्रिप्टेड संचार प्रणाली होगी. साथ ही ऑटोमैटिक नेविगेशन और टारगेट ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं भी होंगी. अगर संपर्क टूट जाए तो ड्रोन खुद वापस लौट सकेंगे.
तीसरी श्रेणी में टेथर्ड ड्रोन शामिल हैं. ये तार के जरिए टैंक से जुड़े रहेंगे. इन्हें बिजली सीधे टैंक से मिलेगी. इससे ये लंबे समय तक हवा में रहकर निगरानी कर सकेंगे. ये ड्रोन सेना को युद्ध के दौरान दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करेंगे. साथ ही संचार व्यवस्था मजबूत करने में भी उपयोगी होंगे. यह पूरी परियोजना ‘बाय इंडियन-IDDM' श्रेणी के तहत चलाई जा रही है. इसका मतलब है कि इसमें स्वदेशी तकनीक और भारत में निर्माण पर सबसे ज्यादा जोर होगा.
AVNL ने कहा है कि शुरुआत में कम से कम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री जरूरी होगी. बाद में इसे बढ़ाकर 80 प्रतिशत तक ले जाया जाएगा. कंपनी पहले तीन प्रोटोटाइप सिस्टम खरीदेगी. अगर AVNL का टैंक प्लेटफॉर्म रक्षा मंत्रालय के FRCV कार्यक्रम के लिए चुना जाता है, तो बाद में 590 सिस्टम तक बनाए जा सकते हैं. यह परियोजना भारतीय सेना के भविष्य के टैंक कार्यक्रम ‘फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल' यानी FRCV से जुड़ी है. इसका मकसद सेना के लिए आधुनिक और तकनीक से लैस टैंक तैयार करना है. विशेषज्ञ मानते हैं कि हाल के युद्धों में ड्रोन की भूमिका तेजी से बढ़ी है. यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया की कई सेनाएं टैंकों के साथ ड्रोन तकनीक को जोड़ने पर ध्यान दे रही हैं. भारत भी अब इसी दिशा में बड़ा कदम बढ़ा रहा है.
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