केंद्र सरकार ने कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30 फीसदी तक सीमित करने का फैसला किया है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी. सरकार का अनुमान है कि इस कदम से कैंसर की दवाओं के MRP में 20 से 70 फीसदी तक की कमी आ सकती है और मरीजों को सालाना करीब ₹2,500 करोड़ की बचत होगी. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच को बताया गया कि नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने 8 अक्टूबर को हुई मीटिंग में इस प्रस्ताव पर फैसला लिया. केंद्र सरकार कैंसर की उन दवाओं की लिस्ट जारी करेगी, जिन पर यह रेगुलेशन लागू होगा. बाजार की परिस्थितियों और पब्लिक हेल्थ की जरूरतों के मुताबिक लिस्ट में वक्त-वक्त पर नई दवाएं जोड़ी जाएंगी.
फार्मास्यूटिकल्स डिपार्टमेंट के हलफनामे के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक की अध्यक्षता में एक एक्सपर्ट कमेटी गठित की गई है. कमेटी को रेगुलेशन के दायरे में शामिल की जाने वाली कैंसर दवाओं की लिस्ट पर 10 से 15 दिनों में सिफारिशें देने को कहा गया है. प्रस्ताव के तहत कैंसर के इलाज के लिए स्वीकृत दवाओं को शामिल करने की योजना है, जबकि सस्ती दवाओं को अपवाद के रूप में रखा जाएगा.
कैंसर की दवाओं पर दस गुना तक कीमत का अंतर
सुप्रीम कोर्ट पहले की सुनवाई में इस बात पर चिंता जता चुका है कि कुछ कैंसर की दवाओं का अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP खुदरा विक्रेताओं को मिलने वाली कीमत (PTR) से दस गुना तक ज्यादा है.
केंद्र के हलफनामे में स्वीकार किया गया है कि कैंसर की दवाओं के मामले में अस्पतालों द्वारा ज्यादा ट्रेड मार्जिन देने वाली कंपनियों से दवाएं खरीदने और मरीजों को MRP पर बेचने की शिकायतें हैं. ऐसे मामलों में मार्जिन 170 से 700 फीसदी या उससे भी ज्यादा बताया गया है. अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले उपभोग्य चिकित्सा उत्पादों (कंज्यूमेबल्स) पर भी 100 से 1,000 फीसदी या ज्यादा मार्जिन की परेशानी का जिक्र किया गया है.
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सिर्फ कैंसर की दवाओं पर ही कंट्रोल क्यों?
बेंच ने सवाल उठाया कि जब ज्यादा ट्रेड मार्जिन की समस्या अन्य दवाओं और मेडिकल उपकरणों में भी है, तो रेगुलेशन केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित क्यों रखा जा रहा है. जस्टिस संदीप मेहता ने भारतीय निर्मित कार्डियक स्टेंट का उदाहरण देते हुए कहा कि उसकी खुदरा विक्रेता को कीमत करीब ₹5,000 है, जबकि MRP ₹25,000 है. उन्होंने कहा कि अगर मार्जिन को 16 फीसदी तक सीमित किया जाए, तो चिकित्सा प्रक्रियाओं की लागत में कमी आ सकती है. उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि दवाओं और चिकित्सा उपकरणों पर मिलने वाले मार्जिन डॉक्टरों के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं.
बेंच ने सलाइन ड्रिप लाइन का उदाहरण भी दिया, जिसका MRP ₹11 होने के बावजूद उसे ₹270 में बेचे जाने की बात कही गई. कोर्ट ने सवाल किया कि निर्माता खुदरा विक्रेताओं को जिस कीमत पर प्रोडक्ट देते हैं, उससे कई गुना ज्यादा MRP तय करने की अनुमति क्यों होनी चाहिए.
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि दवाओं की कीमत तय करना सरकार की पॉलिसी का सिर्फ एक पहलू है. मरीजों के लिए दवाओं की किफायत, उनकी उपलब्धता और बाजार की परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है.
पीठ ने पूछा कि सरकार सभी दवाओं पर नियमन क्यों नहीं कर सकती. इस पर भाटी ने कहा कि भारत में दवाओं की कीमतें पहले से अपेक्षाकृत कम हैं और अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप से बाजार और दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है.
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सभी दवाओं पर समान मार्जिन लागू करना व्यावहारिक नहीं: केंद्र
केंद्र ने हलफनामे में कहा है कि सभी दवाओं पर एक समान ट्रेड मार्जिन लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा. डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट, बिक्री की मात्रा, स्टोरेज की जरूरत और भौगोलिक परिस्थितियों के मुताबिक खर्च अलग-अलग होते हैं.
ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 के तहत अनुसूचित दवाओं की सीलिंग प्राइस तय करते वक्त उन ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं की औसत कीमत ली जाती है, जिनकी बाजार हिस्सेदारी कम से कम एक प्रतिशत है. इसमें 16 फीसदी खुदरा विक्रेता मार्जिन जोड़ा जाता है. इस निर्धारित अधिकतम कीमत के अंदर निर्माता थोक और खुदरा विक्रेताओं के बीच मार्जिन का वितरण तय कर सकते हैं.
हलफनामे के मुताबिक, 935 फॉर्मूलेशन की सीलिंग प्राइस और 3,881 नई दवाओं की खुदरा कीमतें तय की गई हैं. गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में निर्माता शुरुआती कीमत तय कर सकते हैं, जबकि NPPA बाद में होने वाली मूल्य वृद्धि पर निगरानी रखता है. सामान्य रूप से पिछले 12 महीनों के MRP के मुकाबले बढ़ोतरी 10 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती.
केंद्र के मुताबिक, अप्रैल 2025 को खत्म 12 महीने की अवधि में गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों में वास्तविक वृद्धि 5.6 प्रतिशत रही.
सरकार ने यह भी कहा कि कुछ सस्ती दवाओं, कम बिक्री वाले क्षेत्रों में बिकने वाली दवाओं और विशेष भंडारण या कोल्ड-चेन की जरूरत वाले उत्पादों के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा मार्जिन जरूरी हो सकता है. छोटे दवा निर्माताओं के संगठनों ने भी समान मार्जिन सीमा लागू होने से रोजगार और दूरदराज के क्षेत्रों में दवाओं की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका जताई है.
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अस्पतालों के कंज्यूमेबल्स की कीमतें भी जांच के दायरे में...
केंद्र सरकार ने अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले चिकित्सा उपभोग्य उत्पादों पर ज्यादा मार्जिन की समस्या को भी स्वीकार किया है. हलफनामे के मुताबिक, सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं और बीमा व्यवस्थाओं में कई बार इन उत्पादों की लागत पैकेज में शामिल रहती है. लेकिन सीधे भुगतान करने वाले मरीजों से इन्हें अलग से MRP पर वसूला जा सकता है.
सरकार का कहना है कि इन उत्पादों की कीमतें करीब ₹1 से ₹350 या उससे ज्यादा तक होती हैं. ऐसे में सभी उत्पादों पर एक समान प्रतिशत आधारित मार्जिन लागू करने से सस्ते उत्पादों की बिक्री और वितरण लागत की भरपाई करना कठिन हो सकता है. अस्पतालों के नर्सिंग और प्रशासनिक खर्च भी अलग-अलग होते हैं.
हलफनामे में यह भी कहा गया है कि कुछ क्षेत्रों में खुदरा विक्रेता ज्यादा मार्जिन वाले लोकल ब्रांड को बढ़ावा देते हैं. सरकार इस तरह की प्रथाओं की जांच कर रही है और संबंधित पक्षों से परामर्श के बाद आगे कदम उठाने पर विचार करेगी.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी सवाल किया था कि करीब ₹2,700 में खुदरा विक्रेता को मिलने वाली कैंसर की दवा का MRP ₹27,000 के आस-पास कैसे हो सकता है. कोर्ट ने केंद्र से दवाओं और मेडिकल उपकरणों पर व्यापक स्तर पर समान मार्जिन सीमा लागू करने की संभावना पर विचार करने को कहा था. मामले में अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी.
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