
हाफिज सईद को पाकिस्तान में नजरबंद किया गया है... (फाइल फोटो)
इस्लामाबाद:
अपनी नजरबंदी से ठीक पहले हाफिज सईद ने सोशल मीडिया के जरिए एक बयान जारी किया. इसमें वह अपनी गिरफ्तारी के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच के दोस्ताना संबंध को बता रहा है. कश्मीर का रोना रोते हुए वह यह बताने की कोशिश कर रहा है कि किस तरह भारत के कहे पर अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव डाला. उसने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को भी कोसना शुरू कर दिया.
हाफ़िज़ सईद बेशक अपनी तरह से चीज़ों को बयां करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन यह खुली हुई सच्चाई है कि भारत हाफ़िज़ सईद समेत तमाम आतंकियों के खिलाफ़ कड़ा रुख अपनाने की मांग हमेशा से करता रहा है. भारत की कोशिशों का ही नतीज़ा है कि पहले लश्कर-ए-तइबा फिर जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध लगा. इस बार नया है कि अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद सख्ती का यह नया संदेश है.
मिल रही जानकारी के मुताबिक, 20 जनवरी को ट्रंप के औपचारिक तौर पर सत्ता संभालने के पहले से पाकिस्तान पर अमेरिका ने दबाव बनाना शुरू कर दिया. जनवरी के दूसरे हफ्ते में अमेरिका के असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने पाकिस्तानी राजदूत जलील अब्बास जिलानी से मुलाक़ात कर आतंकवाद के खिलाफ कठोर क़दम उठाने को कहा. हाफ़िज़ सईद की तंजीमों चाहे वे जमात-उद-दावा हो या फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन को लेकर अमेरिका ने पाकिस्तान के सामने मनी लॉन्ड्रिंग पर एशिया पैसिफिक ग्रुप की रिपोर्ट को रखा. एपीजी की ताज़ा रिपोर्ट में जमाद-उद-दावा के वित्तीय लेन देन और गतिविधियों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. पाकिस्तानी मीडिया भी इस बात की तस्दीक करता है कि इस रिपोर्ट को दिखा कर अमेरिका ने पाकिस्तान से दो टूक लहज़े में कहा कि अगर उचित कार्रवाई न की गई तो पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है. इसके बाद पाकिस्तान को हर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन देन के लिए संबंधित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मंज़ूरी लेने की नौबत आ जाएगी.
पाकिस्तान ने क्या किया ये बताने को 31 जनवरी तक की तारीख दी गई. जिलानी ने तुरंत इसकी जानकारी पाकिस्तान सरकार को भेजी. अमेरिका के इस कड़े रुख के बाद पाकिस्तान की सरकार और सेना ने आपस में सलाह मशविरा किया. गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच कई दौर की बैठक हुई. इसके बाद सरकारी आदेश के ज़रिए हाफ़िज़ सईद को चार और साथियों के साथ नज़रबंद करने का फैसला लिया गया.
हाफ़िज़ सईद की गिरफ्तारी और नज़रबंदी पहले भी कई बार हुई है, लेकिन पाकिस्तान की सरकार अदालत में उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाए. वह भी तब जब मुंबई हमले मामले में भारत ने डोज़ियर भर-भरकर पाकिस्तान को सबूत दिए हैं. सरकारी आदेश के ज़रिए ज़कीउर्ररहमान लखवी को भी पाकिस्तान लंबे समय तक अंदर नहीं रख पाया इसलिए एक बार फिर दारोमदार पाकिस्तान की सरकार पर है कि सईद के गुनाहों के सबूतों को किस पुख़्ता तरीक़े से अदालत में रख कर उसे सज़ा तक पहुंचाता है या एक बार फिर महज़ नज़रबंदी के ज़रिए भारत और अमेरिका समेत पूरी दुनिया की निगाह में धूल झोंकने की कोशिश करता है.
हाफ़िज़ सईद बेशक अपनी तरह से चीज़ों को बयां करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन यह खुली हुई सच्चाई है कि भारत हाफ़िज़ सईद समेत तमाम आतंकियों के खिलाफ़ कड़ा रुख अपनाने की मांग हमेशा से करता रहा है. भारत की कोशिशों का ही नतीज़ा है कि पहले लश्कर-ए-तइबा फिर जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध लगा. इस बार नया है कि अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद सख्ती का यह नया संदेश है.
मिल रही जानकारी के मुताबिक, 20 जनवरी को ट्रंप के औपचारिक तौर पर सत्ता संभालने के पहले से पाकिस्तान पर अमेरिका ने दबाव बनाना शुरू कर दिया. जनवरी के दूसरे हफ्ते में अमेरिका के असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने पाकिस्तानी राजदूत जलील अब्बास जिलानी से मुलाक़ात कर आतंकवाद के खिलाफ कठोर क़दम उठाने को कहा. हाफ़िज़ सईद की तंजीमों चाहे वे जमात-उद-दावा हो या फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन को लेकर अमेरिका ने पाकिस्तान के सामने मनी लॉन्ड्रिंग पर एशिया पैसिफिक ग्रुप की रिपोर्ट को रखा. एपीजी की ताज़ा रिपोर्ट में जमाद-उद-दावा के वित्तीय लेन देन और गतिविधियों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. पाकिस्तानी मीडिया भी इस बात की तस्दीक करता है कि इस रिपोर्ट को दिखा कर अमेरिका ने पाकिस्तान से दो टूक लहज़े में कहा कि अगर उचित कार्रवाई न की गई तो पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है. इसके बाद पाकिस्तान को हर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन देन के लिए संबंधित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मंज़ूरी लेने की नौबत आ जाएगी.
पाकिस्तान ने क्या किया ये बताने को 31 जनवरी तक की तारीख दी गई. जिलानी ने तुरंत इसकी जानकारी पाकिस्तान सरकार को भेजी. अमेरिका के इस कड़े रुख के बाद पाकिस्तान की सरकार और सेना ने आपस में सलाह मशविरा किया. गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच कई दौर की बैठक हुई. इसके बाद सरकारी आदेश के ज़रिए हाफ़िज़ सईद को चार और साथियों के साथ नज़रबंद करने का फैसला लिया गया.
हाफ़िज़ सईद की गिरफ्तारी और नज़रबंदी पहले भी कई बार हुई है, लेकिन पाकिस्तान की सरकार अदालत में उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाए. वह भी तब जब मुंबई हमले मामले में भारत ने डोज़ियर भर-भरकर पाकिस्तान को सबूत दिए हैं. सरकारी आदेश के ज़रिए ज़कीउर्ररहमान लखवी को भी पाकिस्तान लंबे समय तक अंदर नहीं रख पाया इसलिए एक बार फिर दारोमदार पाकिस्तान की सरकार पर है कि सईद के गुनाहों के सबूतों को किस पुख़्ता तरीक़े से अदालत में रख कर उसे सज़ा तक पहुंचाता है या एक बार फिर महज़ नज़रबंदी के ज़रिए भारत और अमेरिका समेत पूरी दुनिया की निगाह में धूल झोंकने की कोशिश करता है.
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