New Delhi:
भ्रष्टाचार पर चारों तरफ से घिरी सरकार को अब इससे निपटने की गंभीरता का अहसास हो रहा है। एक के बाद एक भ्रष्टाचार और घोटालों के पर्दाफाश के बाद सरकार बैकफुट पर है। भ्रष्टाचार की बीमारी पर लगाम लगाने के लिए भ्रष्टाचार पर बने मंत्रिसमूह की देर रात बैठक हुई जिसमें बाकी सुझावों के अलावा मंत्रालयों के डिस्क्रीशनरी पॉवर को खत्म करने की सिफारिश का फ़ैसला लिया गया। एक अहम सिफारिश में भ्रष्ट नौकरशाही पर नकेल कसने के लिए मामलों को तय समय में फास्ट ट्रैक करने पर ज़ोर दिया गया। मंत्रालयों के डिस्क्रीशनरी पॉवर यानी विवेकाधीन अधिकारों को कतरने पर भी विचार हो रहा है। सरकार के 54 मंत्रालयों में से 38 के पास डिस्क्रीशनरी पॉवर हैं जिनका इस्तेमाल अक्सर अपने करीबी लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जाता रहा है। 8 सदस्यों वाले मंत्रिसमूह की बैठक में जो फ़ैसले लिए गए उनमें सरकारी अफसरों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की तेज़ी से सुनवाई हो। सभी आरोपी अफसरों के खिलाफ़ मुकदमा चलाने की मंज़ूरी तीन महीने के अंदर मिले, भ्रष्टाचार के मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई एक साल में पूरी हो, मंत्रियों के विवेकाधीन अधिकार खत्म किए जाएं लेकिन मंत्रियों के संवैधानिक अधिकारों को बनाए रखा जाए। अपने विवेकाधीन अधिकारों के तहत मंत्री अपने मंत्रालय के नौकरशाहों की नियुक्ति और तबादले करते हैं। साथ ही अपने मंत्रालय के अधीन आने वाली सावर्जनिक क्षेत्र की इकाइयों के अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का भी उन्हें अधिकार होता है। इसके अलावा वे ये भी तय करते हैं कि उनके मंत्रालय के अधीन आने वाली ज़मीनों का किस तरह इस्तेमाल किया जाएगा। उन्हें ये भी तय करने का अधिकार है कि विकास के कामों के लिए मंत्रालय को मिले फंड का कैसे इस्तेमाल होगा।
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