
प्रतीकात्मक फोटो.
नई दिल्ली:
SC/ST एक्ट में बदलाव करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ विरोध बढ़ता जा रहा है. अब दलित संगठनों ने मांग की है कि भारत सरकार इस कानून की पुरानी हैसियत बहाल करने के लिए तत्काल अध्यादेश लेकर आए.
SC/ST कानून में बदलाव के खिलाफ भारत सरकार को अध्यादेश लाना चाहिए...दिल्ली में देश के कई बड़े दलित संगठनों के नेता मिले और उन्होंने भारत सरकार से ये मांग की. इनकी ये भी मांग है कि सरकार 2 अप्रेैल को भारत बंद के दौरान दलित कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज़ मामले वापस ले.
नेशनल कानफेडरेशन ऑफ दलित एंड आदिवासी आर्गेनाइज़ेशन के एडवाइजर अशोक भारती ने एनडीटीवी से कहा, "हम मांग करते हैं कि SC/ST एक्ट में बदलाव के खिलाफ सरकार जल्दी से जल्दी अध्यादेश लेकर आए."
नेशनल दलित राइट फोरम के अध्यक्ष आनंद राव ने एनडीटीवी से कहा, "दलित असुरक्षित महसूस कर रहे हैं... कानून में बदलाव से उनके खिलाफ अपराध फिर बढ़ेगा".
दलित समुदाय के ये नेता ये भी चाहते हैं कि इस कानून को संविधान के नवें शेड्यूल में शामिल किया जाए ताकि इससे भविष्य में छेड़छाड़ संभव ना हो सके. उधर इस मामले में गुरुवार को भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि कानून में बदलाव से देश में communal harmony कमज़ोर हुई है. हालांकि सरकार इस संवेदनशील मसले पर संभल-संभल कर बात कर रही है.
क़ानून राज्यमंत्री पीपी चौधरी ने NDTV से कहा, "मुझे पूरा भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट संसद से पास हुए अत्याचार निरोधक कानून की भावना, नीयत और मकसद को ध्यान में रखते हुए फैसला देगा".
भारत सरकार फिलहाल इस संवेदनशील मामले में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती है जिससे इस मामले पर कोई असर पड़े. सरकार को इस मामले में पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतज़ार है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही सरकार इस बारे में अपनी आगे की रणनीति तय करेगी.
SC/ST कानून में बदलाव के खिलाफ भारत सरकार को अध्यादेश लाना चाहिए...दिल्ली में देश के कई बड़े दलित संगठनों के नेता मिले और उन्होंने भारत सरकार से ये मांग की. इनकी ये भी मांग है कि सरकार 2 अप्रेैल को भारत बंद के दौरान दलित कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज़ मामले वापस ले.
नेशनल कानफेडरेशन ऑफ दलित एंड आदिवासी आर्गेनाइज़ेशन के एडवाइजर अशोक भारती ने एनडीटीवी से कहा, "हम मांग करते हैं कि SC/ST एक्ट में बदलाव के खिलाफ सरकार जल्दी से जल्दी अध्यादेश लेकर आए."
नेशनल दलित राइट फोरम के अध्यक्ष आनंद राव ने एनडीटीवी से कहा, "दलित असुरक्षित महसूस कर रहे हैं... कानून में बदलाव से उनके खिलाफ अपराध फिर बढ़ेगा".
दलित समुदाय के ये नेता ये भी चाहते हैं कि इस कानून को संविधान के नवें शेड्यूल में शामिल किया जाए ताकि इससे भविष्य में छेड़छाड़ संभव ना हो सके. उधर इस मामले में गुरुवार को भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि कानून में बदलाव से देश में communal harmony कमज़ोर हुई है. हालांकि सरकार इस संवेदनशील मसले पर संभल-संभल कर बात कर रही है.
क़ानून राज्यमंत्री पीपी चौधरी ने NDTV से कहा, "मुझे पूरा भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट संसद से पास हुए अत्याचार निरोधक कानून की भावना, नीयत और मकसद को ध्यान में रखते हुए फैसला देगा".
भारत सरकार फिलहाल इस संवेदनशील मामले में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती है जिससे इस मामले पर कोई असर पड़े. सरकार को इस मामले में पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतज़ार है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही सरकार इस बारे में अपनी आगे की रणनीति तय करेगी.