
दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान 8 फरवरी को संपन्न हो चुका है. चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मुफ्त दी जा रही सुविधाएं और सरकारी स्कूलों में किए गए काम से आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी दिखा. लेकिन बीजेपी की ओर से तगड़े प्रचार अभियान के दम पर चुनाव को एक तरफा करने से रोकने की पूरी कोशिश की गई. बीजेपी ने इस चुनाव में शाहीन बाग को भी मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है जिसके दम पर ध्रुवीकरण की कोशिश है.
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इन सब के बीच अगर हम साल 2015 के चुनाव के आंकड़ों को देखें तो माना जा सकता है कि आम आदमी पार्टी को ज्यादा अति आत्मविश्वास में नहीं रहना चाहिए. दिल्ली में करीब 9 सीटे हैं जिसमें जीत हार का अंतर 10 हजार से कम है और एक सीट ऐसी है जहां 10 हजार से ज्यादा है. इसमें 8 सीटें आम आदमी पार्टी के पास हैं तो 2 सीटें बीजेपी के पास हैं.
2015 में हुए विधानसभा चुनाव की वो सीटें जहां जीत हार का अंतर कम था

बात करें साल 2015 में मिले वोट प्रतिशत की है तो 54.34 फीसदी वोट, बीजेपी को 32.19 फीसदी और कांग्रेस को 9.65 फीसदी वोट मिले थे. इस वोट प्रतिशत से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर बीजेपी के खिलाफ पड़ने वाला वोट अगर बंटता है और इसमें कांग्रेस का वोट फीसदी बढ़ता है तो पिछले चुनाव के मुकाबले बीजेपी को जबरदस्त फायदा भी हो सकता है. क्योंकि कांग्रेस का कभी दिल्ली में इतना खराब प्रदर्शन नहीं रहा है. दूसरा इस चुनाव में शाहीन बाग भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा साबित हो सकता है. अगर बीजेपी ध्रुवीकरण के बूते थोड़ा सा भी वोटों को स्विंग कराने में कामयाब हो जाती है तो यह आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है. दूसरा बीजेपी के खिलाफ पड़ने वाला मुसलमानों के वोटों का बंटना भी उसके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है.
क्या है बीजेपी की रणनीति
बीजेपी से जुड़े सूत्रों का कहना है पार्टी उन वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है जो अभी तक यह तय नहीं कर पाएं हैं कि वह किसे वोट देना चाहते हैं. पार्टी के आंतरिक सर्वे के मुताबिक ऐसे वोटरों की संख्या 12 फीसदी है. आंतरिक सर्वे में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन पर भी बीजेपी का गणित टिका हुआ है.
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