
फाइल फोटो
नई दिल्ली:
एक तरफ दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग बयान जारी करके एसीबी पर अपना अधिकार जमा रहे हैं और कह रहे हैं कि उनके पास अभी तक ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया है, जिसमें बिहार के पुलिस अधिकारियों को दिल्ली एंटी करप्शन ब्रांच में नियुक्त करने की बात हो और आएगा तो अच्छे से जांचेंगे और फैसला करेंगे।
तो दूसरी तरफ दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया का कहना है की दिल्ली सरकार और एसीबी को अपने यहां अधिकारी नियुक्त करने का पूरा अधिकार है।
यह मामला कोर्ट में भी चल रहा है फिर भी हालात ऐसे क्यों बने हुए हैं कि एलजी और दिल्ली सरकार फिर से आमने-सामने आ गए हैं? जबकि शुक्रवार को ही सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में इस पर सुनवाई हुई थी।
असल में न तो शुक्रवार 29 मई को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एसीबी के अधिकार पर कोई टिपण्णी की या फिर दिल्ली हाईकोर्ट के 25 मई के आदेश पर कोई रोक लगाई, जिसमे एसीबी को दिल्ली में करप्शन मामलों में कार्रवाई का पूर्ण अधिकार बताया गया था।
और दिल्ली हाई कोर्ट में भी जब सुनवाई हुई तो कोर्ट ने नियुक्ति मामले में केवल इतना आदेश दिया था कि हाल के तबादले के दो आदेश प्रस्ताव के तौर पर दिल्ली सरकार एलजी को भेजे, जिस पर वह चर्चा करेंगे।
यानी क्योंकि कोर्ट ने दिल्ली सरकार या एसीबी पर कहीं किसी तरह की कार्रवाई पर न तो कोई रोक लगाईं न कोई नियुक्ति को लेकर आदेश दिया (दो आदेशों के अतिरिक्त) इसलिए दिल्ली सरकार मानती है कि वो जैसा कर रही है वही संवैधानिक है, सही है।
जबकि एलजी यह मान रहे हैं कि नोटिफिकेशन पर कोर्ट ने कोई रोक नहीं लगाई और न ही ये रद्द हुआ है इसलिए दिल्ली सरकार जो कर रही है वह गलत है और वह जो कह रहे हैं वही सही और संवैधानिक है।
देख लीजिये कानून और उसके प्रावधानों की व्याख्या अभी तक दोनों अपने हिसाब से कर रहे थे और भिड़े हुए थे, लेकिन अब कोर्ट के आदेश और सुनवाई की व्याख्या भी दोनों अपने हिसाब से कर रहे हैं, जिससे मामला आज भी वहीं पर फंसा हुआ है जहां पहले था।
तो दूसरी तरफ दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया का कहना है की दिल्ली सरकार और एसीबी को अपने यहां अधिकारी नियुक्त करने का पूरा अधिकार है।
यह मामला कोर्ट में भी चल रहा है फिर भी हालात ऐसे क्यों बने हुए हैं कि एलजी और दिल्ली सरकार फिर से आमने-सामने आ गए हैं? जबकि शुक्रवार को ही सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में इस पर सुनवाई हुई थी।
असल में न तो शुक्रवार 29 मई को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एसीबी के अधिकार पर कोई टिपण्णी की या फिर दिल्ली हाईकोर्ट के 25 मई के आदेश पर कोई रोक लगाई, जिसमे एसीबी को दिल्ली में करप्शन मामलों में कार्रवाई का पूर्ण अधिकार बताया गया था।
और दिल्ली हाई कोर्ट में भी जब सुनवाई हुई तो कोर्ट ने नियुक्ति मामले में केवल इतना आदेश दिया था कि हाल के तबादले के दो आदेश प्रस्ताव के तौर पर दिल्ली सरकार एलजी को भेजे, जिस पर वह चर्चा करेंगे।
यानी क्योंकि कोर्ट ने दिल्ली सरकार या एसीबी पर कहीं किसी तरह की कार्रवाई पर न तो कोई रोक लगाईं न कोई नियुक्ति को लेकर आदेश दिया (दो आदेशों के अतिरिक्त) इसलिए दिल्ली सरकार मानती है कि वो जैसा कर रही है वही संवैधानिक है, सही है।
जबकि एलजी यह मान रहे हैं कि नोटिफिकेशन पर कोर्ट ने कोई रोक नहीं लगाई और न ही ये रद्द हुआ है इसलिए दिल्ली सरकार जो कर रही है वह गलत है और वह जो कह रहे हैं वही सही और संवैधानिक है।
देख लीजिये कानून और उसके प्रावधानों की व्याख्या अभी तक दोनों अपने हिसाब से कर रहे थे और भिड़े हुए थे, लेकिन अब कोर्ट के आदेश और सुनवाई की व्याख्या भी दोनों अपने हिसाब से कर रहे हैं, जिससे मामला आज भी वहीं पर फंसा हुआ है जहां पहले था।
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