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इलाज अभी, पैसे बाद में! Medical EMI राहत है या नया कर्ज? साइन करने से पहले जानें ये 5 बातें

Medical EMI के जरिए अस्पताल के बड़े बिल को एक साथ चुकाने के बजाय किस्तों में बांटा जा सकता है. लेकिन इसे लेने से पहले ब्याज, प्रोसेसिंग फीस, लेट पेमेंट चार्ज और कुल भुगतान समझना जरूरी है. एक्सपर्ट से जानिए किन बातों का ध्यान रखें.

इलाज अभी, पैसे बाद में! Medical EMI राहत है या नया कर्ज? साइन करने से पहले जानें ये 5 बातें
Medical EMI: अस्पताल का बिल EMI पर कैसे भरें? लोन लेने से पहले जान लें ब्याज और ये 5 जरूरी बातें

घर में जब अचानक कोई मेडिकल इमरजेंसी आती है, तो पूरा परिवार अंदर तक हिल जाता है. खासकर उन परिवारों के लिए मुसीबत कई गुना बढ़ जाती है जिनके पास कोई हेल्थ इंश्योरेंस नहीं होता. अस्पताल का लाखों का बिल देखकर कई बार बरसों की जमा पूंजी एक झटके में खत्म हो जाती है, रिश्तेदारों के आगे हाथ फैलाने पड़ते हैं या फिर मजबूरी में इलाज को टालना पड़ता है.

इन्हीं मुश्किल हालातों से निपटने के लिए अब अस्पतालों में मेडिकल फाइनेंसिंग यानी किस्तों (EMI) पर इलाज का चलन तेजी से बढ़ रहा है. इसका मतलब यह है कि मरीज को पूरे अस्पताल का बिल एक बार में नहीं भरना पड़ता, बल्कि वह इस भारी खर्च को हर महीने की आसान किस्तों में चुका सकता है. ऊपर से देखने में यह तरीका काफी राहत भरा लगता है, लेकिन इसमें हामी भरने से पहले ब्याज और बाकी छुपे हुए खर्चों को समझना बहुत जरूरी है.

आखिर क्यों बढ़ रही है मेडिकल ईएमआई की मांग

भारत जैसे देश में जहां आज भी ज्यादातर लोग अपनी जेब से इलाज का खर्चा उठाते हैं, वहां इस तरह के विकल्पों की जरूरत सबसे ज्यादा महसूस होती है.

केयरपे (CarePay) के को-फाउंडर और सीईओ गौरव गुप्ता ने बताया कि सिर्फ हाथ में तुरंत पैसा न होने की वजह से किसी को अपना जरूरी इलाज नहीं टालना चाहिए. आंकड़ों के मुताबिक, 10 में से 6 मरीज किसी न किसी वजह से अपना इलाज आगे खिसका देते हैं. इनमें से लगभग 93 परसेंट मामलों में देरी की असली वजह तुरंत पैसों का इंतजाम न हो पाना होती है.

गौरव गुप्ता के अनुसार, समस्या हमेशा यह नहीं होती कि मरीज इलाज का खर्च कभी नहीं उठा सकता. असली दिक्कत यह होती है कि ऐन वक्त पर अस्पताल की टेबल पर एक साथ बड़ी रकम कैसे रखी जाए.

मेडिकल ईएमआई इसी कमी को पूरा करती है. मरीज को अस्पताल में भर्ती होते समय पूरी रकम जोड़ने की चिंता नहीं करनी पड़ती, बल्कि वह इलाज के दौरान ही फाइनेंस की सुविधा ले सकता है. इससे उन मामलों में भी कमी आ रही है जहां लोग पैसों की तंगी के चलते बीच में ही इलाज छोड़ देते थे.

हालांकि, गुप्ता इस बात पर भी जोर देते हैं कि मेडिकल फाइनेंस कभी भी हेल्थ इंश्योरेंस का विकल्प नहीं बन सकता. इंश्योरेंस आपको अचानक होने वाले भारी खर्च से सुरक्षा देता है, जबकि ईएमआई सिर्फ उस खर्च को किश्तों में बांटने का एक जरिया है.

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जेब पर कितना भारी पड़ सकती है मेडिकल किस्त

अस्पताल का 5 लाख का बिल एक बार में देखने पर बहुत बड़ा लगता है, जबकि 20-25 हजार की मासिक किस्त पहली नजर में काफी आसान लगती है. लेकिन फैसला लेने से पहले यह देखना जरूरी है कि जेब से कुल कितना पैसा बाहर जाएगा.

फाइनेंशियल एक्सपर्ट और लॉन्ग टेल वेंचर्स के फाउंडर परमदीप सिंह का कहना है कि किस्तों में चुकाने की सहूलियत को कभी भी अपनी असली आर्थिक क्षमता नहीं समझना चाहिए.

साल 2021-22 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में इलाज पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 39 परसेंट हिस्सा लोग अपनी जेब से भरते हैं. जब कोई बड़ी बीमारी घेरती है, तो बिना बीमा वाले परिवारों को अपनी जमीन-जायदाद बेचनी पड़ती है या भारी कर्ज में डूबना पड़ता है. ऐसे वक्त में मेडिकल ईएमआई एक तात्कालिक सहारा जरूर बनती है.

मान लीजिए किसी मरीज का अस्पताल का बिल 5 लाख रुपये आया है और उसने इसे 15 परसेंट के सालाना ब्याज पर 24 महीनों के लिए फाइनेंस कराया.

  • हर महीने लगभग 24,200 रुपये की किस्त भरनी होगी.
  • 2 साल में ब्याज के रूप में करीब 82,000 रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़ेंगे.
  • यानी 5 लाख के इलाज के बदले मरीज को कुल 5.82 लाख रुपये लौटाने होंगे.

यह किस्त किसी एक परिवार के बजट में आसानी से बैठ सकती है, लेकिन किसी दूसरे परिवार के पूरे महीने का खर्च बिगाड़ सकती है. इसलिए अपनी आमदनी और पहले से चल रहे कर्जों को देखकर ही यह कदम उठाना चाहिए.

साइन करने से पहले इन 5 बातों की पड़ताल जरूर करें

परमदीप सिंह आगाह करते हैं कि जब घर का कोई अपना आईसीयू में होता है, तो तीमारदारों के पास नियम और शर्तें पढ़ने का होश नहीं रहता. इसी बात का फायदा कई बार फाइनेंस कंपनियां उठा लेती हैं.

ब्याज की सही दर: सबसे पहले यह साफ करें कि क्या लोन पर ब्याज लग रहा है और उसकी सालाना वास्तविक दर (APR) क्या है.
प्रोसेसिंग फीस: फाइल चार्ज या प्रोसेसिंग फीस के नाम पर शुरू में ही कोई बड़ा अमाउंट तो नहीं काटा जा रहा.
लेट पेमेंट पेनल्टी: अगर किसी महीने किस्त देने में दो-चार दिन की देरी हो गई, तो कंपनी कितना जुर्माना वसूलेगी.
जीरो-कॉस्ट ईएमआई का सच: यह जरूर जांचें कि क्या 'नो कॉस्ट' के नाम पर कोई छुपा हुआ चार्ज जोड़ा गया है, या फिर एकमुश्त पेमेंट करने पर अस्पताल से मिलने वाला डिस्काउंट तो नहीं छीना जा रहा.
कुल भुगतान की तुलना: सिर्फ महीने की छोटी किस्त मत देखिए, यह जोड़िए कि आखिर में कुल रकम मूल बिल से कितनी ज्यादा जा रही है.

मरीजों को यह भी पता होना चाहिए कि ईएमआई लेना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है. अगर मुमकिन हो तो दो-तीन अलग विकल्पों की तुलना करें और कागज पर दस्तखत करने से पहले सभी शर्तें ध्यान से पढ़ें.

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बिना इंश्योरेंस वाले परिवारों के लिए मेडिकल फाइनेंसिंग एक तात्कालिक राहत जरूर है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि यह आखिरकार एक कर्ज ही है. मरीज के अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आने के बाद भी इस कर्ज की देनदारी महीनों तक बनी रहती है. इसलिए अपनी हैसियत के हिसाब से ही उधार लें और इसे कभी भी एक अच्छे हेल्थ इंश्योरेंस का पक्का विकल्प न समझें.

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