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सर्दियों में बाजरा खाएं या रागी? दोनों में है बड़ा फर्क, जान लें आपके लिए कौन बेहतर

सर्दियों में बाजरा खाएं या रागी? जानें बाजरा और रागी में क्या अंतर है, किसमें कौन से पोषक तत्व होते हैं और अपनी डाइट के लिए सही आटा कैसे चुनें.

सर्दियों में बाजरा खाएं या रागी? दोनों में है बड़ा फर्क, जान लें आपके लिए कौन बेहतर
बाजरा और रागी में क्या अंतर है, बाजरा कब नहीं खाना चाहिए और गेहूं या बाजरा में कौन सा बेहतर है?
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ठंड का मौसम दरवाजे पर है और अपने साथ एक सवाल लाया है, जो ज्‍यादातर लोगों के द‍िमाग में है कि इस मौसम में किस आटे की रोटी खानी चाह‍िए. असल में आपका आहार मुंह के स्‍वाद के नहीं, बल्‍कि मौसम और शरीर की जरूरत के ह‍िसाब से होना चाह‍िए. इस मौसम में गर्म तासीर के आटे खाने की सलाह दी जाती है. 

दूसरी तरफ यह ट्रेंड हो रहा है कि गेहूं कम करो और मोटा अनाज ज्‍यादा खाओ. जबक‍ि हमारी थाली में सबसे ज्‍यादा जगह गेहूं को ही म‍िलती है. लेक‍िन क्‍या आप जानते हैं कि हमारे बुजुर्ग यही सब खाकर लंबे समय तक तंदुरुस्त रहते थे. यही सब यानी मोटे अनाज. जब बात मोटे अनाज की आती है, तो बाजार जाकर कतार में लगे बाजरा और रागी देखकर सिर चकरा जाता है. दोनों ही बढ़िया हैं, दोनों के अपने गुण हैं, पर हर किसी के शरीर का मिजाज एक जैसा नहीं होता. 

किसी को गर्मी जल्दी लगती है तो किसी की हड्डियां कमजोर हैं. ऐसे में बिना सोचे-समझे कोई भी आटा घर उठा लाना फायदे की जगह नुकसान भी दे सकता है. तो चलिए, बिना किसी बनावटी बात के सीधे पते की बात करते हैं कि किस थाली में बाजरा जाना चाहिए और किसमें रागी.

बाजरा और रागी में असली फर्क क्या है?

रंग: बाजरा धूसर, स्लेटी या हल्के हरेपन वाला छोटा दाना होता है. रागी एकदम बारीक, गहरे भूरे या कत्थई रंग की सरसों जैसी दिखती है. इसे महाराष्ट्र में नाचनी और बिहार-झारखंड में मडुआ भी बोलते हैं.

तासीर: बाजरे की तासीर गर्म होती है. जैसे ही पारा गिरता है, लोग बाजरे की रोटी पर मक्खन रखकर खाने लगते हैं क्योंकि यह बदन को अंदर से सेक देती है. पारंपरिक खानपान में बाजरे को गर्म तासीर वाला माना जाता है. हालांकि ‘तासीर' की अवधारणा पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है. रागी की तासीर ठंडी होती है, इसलिए इसे गर्मी में भी आराम से खाया जा सकता है. दक्षिण भारत में रागी का दलिया और डोसा रोजमर्रा का खाना इसीलिए है.

पोषण: बाजरा में आयरन और फोलिक एसिड खूब होता है. वहीं, रागी में दूध से भी तीन-चार गुना ज्यादा कैल्शियम भरा होता है.

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डॉक्टर और डाइटिशियन की क्या सलाह है?

फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (FMRI), गुरुग्राम की हेड क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट दीप्ति खटूजा (Deepti Khatuja) से जब हमने इस बारे में पूछा, तो उन्होंने बहुत पते की बात बताई.

दीप्ति खटूजा का कहना है- 

"लोग अक्सर जोश में आकर रागी और बाजरा दोनों को मिलाकर एक साथ पीस लेते हैं, जो सही तरीका नहीं है. हर अनाज का अपना पाचन समय होता है. बाजरा उन लोगों के लिए कमाल है जिनका ब्लड शुगर ऊपर-नीचे होता रहता है या जिनका बीपी अनकंट्रोल रहता है, क्योंकि इसमें मैग्नीशियम और फाइबर अच्छा है. वहीं बढ़ती उम्र की महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए रागी हड्डियों के घनत्व को बनाए रखने का सबसे सस्ता और असरदार जरिया है.''

गेहूं या बाजरा: आम आदमी के लिए कौन बेहतर?

दीप्ति खटूजा के मुताबिक, बाजरा और रागी दोनों को एक साथ डाइट में बहुत ज्यादा शामिल करने के बजाय जरूरत, मौसम और पाचन क्षमता के हिसाब से इनका चुनाव किया जा सकता है." हम बरसों से गेहूं खाते आए हैं, क्योंकि उसकी रोटी बनाना आसान है और वह मुलायम बनती है. लेकिन पोषण के लिहाज से बाजरा गेहूं का अच्छा विकल्प हो सकता है.

पेट का फूलना और गैस: गेहूं में ग्लूटेन होता है. बहुत से लोगों को रोटी खाते ही पेट में भारीपन, गैस या सुस्ती महसूस होती है. बाजरे में ग्लूटेन नाम की कोई चीज नहीं होती, इसलिए यह पेट में भारीपन नहीं होने देता.

शुगर का बढ़ना: गेहूं की रोटी खून में ग्लूकोज एकदम से बढ़ा देती है. बाजरे का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है. इसका मतलब यह है कि यह शरीर में धीरे-धीरे पचता है और शुगर को अचानक उछलने नहीं देता.

भूख पर काबू: दोपहर में बाजरे की दो रोटी खा लीजिए, शाम की चाय तक कुछ भी चटपटा खाने की तलब नहीं लगेगी. जो लोग वजन कम करने के चक्कर में बार-बार भूखे रहकर परेशान होते हैं, उनके लिए बाजरा एक बढ़िया विकल्प बन जाता है.

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बाजरा किसे और कब नहीं खाना चाहिए?

हर देसी चीज हर किसी को सूट नहीं करती. बाजरे के साथ भी कुछ बंदिशें हैं जिन्हें जानना बेहद जरूरी है.

थायरॉइड की दवा खाने वाले: बाजरे में गोइट्रोजेन होता है.  ये आयोडीन को सोखने में रुकावट डालते हैं. अगर आपको हाइपोथायरायडिज्म है, तो रोज-रोज बाजरा खाने से आपकी दवा का असर कम हो सकता है और थायरॉइड बिगड़ सकता है.

भयंकर गर्मी में: जब बाहर 40-42 डिग्री तापमान हो, तब बाजरे की रोटी खाने की गलती मत कीजिए. इसकी गर्म तासीर पेट में छाले, सीने में जलन या बवासीर की तकलीफ को भड़का सकती है.

जिनकी पथरी की हिस्ट्री रही हो: बाजरे में ऑक्सालेट की मात्रा पाई जाती है. जिन्हें पहले गुर्दे में पथरी की शिकायत रही है, उन्हें इसे ज्यादा मात्रा में खाने से बचना चाहिए या डॉक्टर से पूछकर ही लेना चाहिए.

अगर पानी कम पीते हैं: बाजरा में फाइबर होता है. इसे पचाने के लिए आंतों को खूब पानी चाहिए होता है. अगर आप पानी कम पीते हैं और बाजरा ज्यादा खाते हैं, तो यह पेट साफ करने की जगह उल्टे कब्ज का कारण बन सकता है.

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बाजार में 1 किलो बाजरा कितने का मिलता है?

मिलेट्स की सबसे अच्छी बात यह है कि यह फैंसी विदेशी सुपरफूड्स की तरह जेब खाली नहीं कराता. गली-मोहल्ले की पंसारी दुकान पर अगर आप साबुत बाजरे का दाना लेंगे, तो यह 30 से 45 रुपये प्रति किलो में आराम से मिल जाता है. वहीं अगर आप चक्की से पिसा हुआ ताजा बाजरे का आटा लेते हैं, तो यह 40 से लेकर 60 रुपये प्रति किलो के भाव बिकता है.

हां, अगर आप किसी बड़े मॉल या सुपरमार्केट से पैकेट वाला ब्रांडेड या ऑर्गेनिक बाजरा खरीदते हैं, तो वही आटा आपको 80 से 120 रुपये प्रति किलो तक का पड़ता है.

शुरुआत कैसे करें?

अगर आपके पेट को मोटे अनाज की आदत नहीं है, तो पहले दिन ही तीन-चार रोटियां मत पेलिए. शुरुआत में बाजरे की पतली खिचड़ी बनाइए, उसमें थोड़ी मूंग दाल, घी और सब्जियां डालिए. जब रोटी बनाएं, तो गरम पानी से आटा गूंधें और खाते वक्त थोड़ा सा गुड़ या घर का सफेद मक्खन साथ रखें. इससे सूखापन नहीं लगेगा और पेट भी खुश रहेगा.

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