
लाटू देवता का मंदिर (फोटो साभार: amarujala.com)
देश के शनि शिंगनापुर, सबरीमाला, त्र्यंबकेश्वर, बांकेबिहारी, कोल्हापुर महालक्ष्मी मन्दिर आदि जैसे मंदिरों में जहां स्त्री-पुरूष के बीच किए जा रहे भेदभाव को लेकर माहौल गर्म है, वहीं देश में ऐसा भी एक मंदिर हैं, जहां महिला और पुरुष किसी भी श्रद्धालु को मंदिर के अन्दर जाने की इजाजत नहीं है।
इस मंदिर में किसी वीआइपी की भी नहीं चलती है। वीआइपी की छोड़िए, यहां इस मंदिर के पुजारी की भी नहीं चलती है। पुजारी को भी आंख, नाक और मुंह पर पट्टी बांध कर देवता की पूजा करनी पड़ती है। श्रद्धालु इस मंदिर परिसर से लगभग 75 फीट की दूरी पर रहकर पूजा कर मन्नतें मांगते हैं।
यहां होती है लाटू देवता की पूजा
यह मन्दिर उत्तराखंड के चमोली जिले में देवाल नामक ब्लॉक में वांण नामक स्थान पर स्थापित है। राज्य में यह देवस्थल लाटू मंदिर नाम से विख्यात है, क्योंकि यहां लाटू देवता की पूजा होती है।
उत्तराखंड की अनुश्रुतियों के अनुसार, लाटू देवता उत्तराखंड की आराध्या नंदा देवी के धर्म भाई हैं। दरअसल वांण गांव प्रत्येक 12 वर्षों पर होने वाली उत्तराखंड की सबसे लंबी पैदल यात्रा श्रीनंदा देवी की राज जात यात्रा का बारहवां पड़ाव है। यहां लाटू देवता वांण से लेकर हेमकुंड तक अपनी बहन नंदा देवी की अगवानी करते हैं।
साल में केवल एक दिन खुलते हैं कपाट
इस मंदिर के कपाट साल में एक ही दिन वैशाख माह की पूर्णिमा को खुलते हैं और पुजारी आंख-मुंह पर पट्टी बांधकर कपाट खोलते हैं। श्रद्धालु और भक्त दिन भर दूर से ही लाटू देवता का दर्शन कर पुण्यभागी बनते हैं।
लाटू देवता के कपाट खुलने के शुभ अवसर पर यहां विष्णु सहस्रनाम और भगवती चंडिका पाठ का आयोजन किया जाता है। इस दिन यहां एक विशाल मेला लगता है।
...और क्या कहती है अनुश्रुति
लोगों का मानना है कि इस मंदिर के अंदर साक्षात रूप में नागराज अपने अद्भुत मणि के साथ वास करते हैं, जिसे देखना आम लोगों के वश की बात नहीं है। पुजारी भी साक्षात विकराल नागराज को देखकर न डर जाएं इसलिए वे अपने आंख पर पट्टी बांधते हैं।
लोगों का यह भी मानना है कि मणि की तेज रौशनी की चुंधियाहट इन्सान को अंधा बना देती है। लोग यह भी कहते हैं कि न तो पुजारी के मुंह की गंध तक देवता तक और न ही नागराज की विषैली गंध पुजारी के नाक तक पहुंचनी चाहिए। इसलिए वे नाक-मुंह पर पट्टी लगाते हैं।
इस मंदिर में किसी वीआइपी की भी नहीं चलती है। वीआइपी की छोड़िए, यहां इस मंदिर के पुजारी की भी नहीं चलती है। पुजारी को भी आंख, नाक और मुंह पर पट्टी बांध कर देवता की पूजा करनी पड़ती है। श्रद्धालु इस मंदिर परिसर से लगभग 75 फीट की दूरी पर रहकर पूजा कर मन्नतें मांगते हैं।
यहां होती है लाटू देवता की पूजा
यह मन्दिर उत्तराखंड के चमोली जिले में देवाल नामक ब्लॉक में वांण नामक स्थान पर स्थापित है। राज्य में यह देवस्थल लाटू मंदिर नाम से विख्यात है, क्योंकि यहां लाटू देवता की पूजा होती है।
उत्तराखंड की अनुश्रुतियों के अनुसार, लाटू देवता उत्तराखंड की आराध्या नंदा देवी के धर्म भाई हैं। दरअसल वांण गांव प्रत्येक 12 वर्षों पर होने वाली उत्तराखंड की सबसे लंबी पैदल यात्रा श्रीनंदा देवी की राज जात यात्रा का बारहवां पड़ाव है। यहां लाटू देवता वांण से लेकर हेमकुंड तक अपनी बहन नंदा देवी की अगवानी करते हैं।
साल में केवल एक दिन खुलते हैं कपाट
इस मंदिर के कपाट साल में एक ही दिन वैशाख माह की पूर्णिमा को खुलते हैं और पुजारी आंख-मुंह पर पट्टी बांधकर कपाट खोलते हैं। श्रद्धालु और भक्त दिन भर दूर से ही लाटू देवता का दर्शन कर पुण्यभागी बनते हैं।
लाटू देवता के कपाट खुलने के शुभ अवसर पर यहां विष्णु सहस्रनाम और भगवती चंडिका पाठ का आयोजन किया जाता है। इस दिन यहां एक विशाल मेला लगता है।
...और क्या कहती है अनुश्रुति
लोगों का मानना है कि इस मंदिर के अंदर साक्षात रूप में नागराज अपने अद्भुत मणि के साथ वास करते हैं, जिसे देखना आम लोगों के वश की बात नहीं है। पुजारी भी साक्षात विकराल नागराज को देखकर न डर जाएं इसलिए वे अपने आंख पर पट्टी बांधते हैं।
लोगों का यह भी मानना है कि मणि की तेज रौशनी की चुंधियाहट इन्सान को अंधा बना देती है। लोग यह भी कहते हैं कि न तो पुजारी के मुंह की गंध तक देवता तक और न ही नागराज की विषैली गंध पुजारी के नाक तक पहुंचनी चाहिए। इसलिए वे नाक-मुंह पर पट्टी लगाते हैं।