
देश में अब लोकसभा चुनाव की तैयारियां हो रही हैं. हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद अब ऐसा लग रहा है कि 'मोदी लहर' अब थमती नजर आ रही है. कांग्रेस के रणनीतिकारों को भी लगता है कि बीजेपी को लोकसभा चुनाव में हराया जा सकता है. हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में जीत की खुशी में जब कांग्रेस नेता झूम रहे थे तो डीएमके नेता स्टालिन ने बड़ा बयान दिया कि 2019 के चुनाव में राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं. इस बयान के आते ही राजनीति ने फिर करवट ली और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने संकेत दिए कि वह ऐसे बयानों से खुश नहीं है. सूत्रों से जानकारी के मुताबिक विपक्ष के कई नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री कौन होगा इसका फैसला चुनाव के बाद किया जाएगा. इतना ही नहीं कांग्रेस तीन राज्यों में शपथग्रहण के बहाने विपक्षी एकता का बड़ा मंच तैयार करने की कोशिश कर रही थी लेकिन अखिलेश यादव और मायावती ने न शामिल होने का फैसला कर कांग्रेस को बड़ा झटका दे दिया है. मतलब साफ है इन तीन राज्यों की 65 सीटों के लिए कांग्रेस का दावा भले ही और मजबूत हो गया है लेकिन बीजेपी के लिए भी एक तरह से मौका है.
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1- बीजेपी को मिले समय रहते संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों और बीजेपी नेताओं का मानना था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी के मुकाबले कांग्रेस खड़ी नहीं हो पाएगी. लेकिन नतीजों से साफ है कि जनता का मूड क्या है और अब बीजेपी की जीत की कोई गारंटी नहीं ले सकता है. इन चार महीनों में बीजेपी को अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा. गांवों में उसके प्रदर्शन का ग्राफ गिर गया है. किसानों सरकार की नीतियों से परेशान हैं. वहीं आरएसएस का भी कहना है कि एससी/एसटी एक्ट में संशोधन से अगड़ी जातियों की नाराजगी भी बीजेपी को भारी पड़ी है. दूसरा बीजेपी नेताओं की कार्यकर्ताओं से दूरी भी पार्टी को भारी पड़ रही है. इन बातों की जानकारी पीएम मोदी और अध्यक्ष अमित शाह को इन नतीजों से पता चल चुका है. अब देखने वाली बात यह होगी की क्या बजट सत्र में मोदी सरकार किसानों को बड़ी राहत का ऐलान कर सकती है.
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2- 'कांग्रेस लहर' जैसी बात नहीं
विधानसभा चुनाव के नतीजे भले ही कांग्रेस के पक्ष में आए हों लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी उस तरह से नहीं हारी जैसा एग्जिट पोल बता रहे थे. कांग्रेस ने इन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के भी वादे किए थे. राजस्थान में हर साल जनता सत्ता में बैठी पार्टी को हरा देती है. यहां भी बीजेपी हारी लेकिन कांग्रेस मुश्किल से बहुमत के पास पहुंची और उसके कुल वोट शेयर में 0.5फीसदी का ही इजाफा हुआ. मतलब साफ है कि कांग्रेस के पक्ष में वैसी हवा नहीं है उसकी जीत सत्ता विरोधी लहर का ही परिणाम है. वैसे नतीजे मध्य प्रदेश में भी हैं जहां पर 15 सालों से सत्ता में होने के बाद भी बीजेपी कांग्रेस से मात्र 5 सीटें ही पीछे है.
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3-क्या ये नतीजे पीएम मोदी के खिलाफ हैं?
माना जा रहा है कि यह नतीजे पीएम मोदी के खिलाफ हैं तो यह एक बड़ा सवाल है. लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि राजस्थान में जहां शुरू में बीजेपी बड़ी हार की ओर से बढ़ रही थी वहीं पीएम मोदी की सभाओं के बाद हवा जरूर बदली है. दरअसल में राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ नाराजगी बहुत ज्यादा थी. पद्मवती प्रकरण को वसुंधरा राजे ठीक से संभाल नहीं पाई और राजपूत जो कि बीजेपी के कोर वोटर हैं, राज्य सरकार से नाराज थे. दूसरी ओर आनंदपाल गैंगेस्टर के एन्काउंटर से भी राजपूतों में अच्छा संदेश नहीं गया. वहीं संगठन में भी वुसंधरा का हस्तक्षेप ज्यादा था जिसे प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में देखा जा चुका है. बात करें मध्य प्रदेश की तो शिवराज सबसे लोकप्रिय नेता बने हुए लेकिन बीजेपी के आंतरिक सर्वे में कहा गया था कि उसके 50 से ज्यादा विधायक चुनाव हार रहे हैं. मतलब साफ था कि जनता मंत्रियों और विधायकों के कामकाज से खुश नहीं थी.
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4-क्या बदलेगा 'सत्ता विरोधी लहर' का रुख
जिस समय लोकसभा चुनाव हो रहे होंगे इन तीन राज्यों में नई सरकारों के आए 4 महीने बीत चुके होंगे. राजनीति में हवा बदलते देर नहीं लगती है. जब पीएम मोदी ने इन राज्यों में प्रचार करने जाएंगे तो वहां पर राज्य सरकारों की की सत्ता विरोधी लहर का सामना नहीं करना पड़ेगा.
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5-इन 3 राज्यों में 'ब्रांड मोदी' को बचा ले गई बीजेपी?
तीन राज्यों में चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी ने यह मैसेज फैलाने में कामयाबी पाई है कि यह चुनाव स्थानीय सरकारों के कामकाज को लेकर था. लेकिन अगर साल 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में नजर डालें तो बीजेपी ने इसे बड़ी आसानी से पीएम पद के उम्मीदवार मोदी के आसापास मोड़ दिया था. उस समय पूरे देश का मूड कांग्रेस के खिलाफ था. वहीं इन चुनावों में जीतने के बाद भी ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस विपक्षी एकता की ओर ज्यादा जोर दे रही है. जबकि बीजेपी की रणनीति ब्रांड मोदी को बचाने की है और वह इन चुनावों को सेमीफाइनल मानने से इनकार कर रही है. लेकिन इस सच्चाई यह भी है कि पीएम मोदी ने भी चुनाव मैदान में प्रचार के लिए उतरे थे.
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6- इन तीन राज्यों के नतीजे, लोकसभा में जीत की गारंटी नहीं
साल 1998 में कांग्रेस ने राजस्थान और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव जीता था लेकिन 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार ने केंद्र में सरकार बनाई. वहीं साल 2004 में राजस्थान और मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा में मिली जीत से उत्साहित बीजेपी ने 6 महीने पहले ही चुनाव करा डाले लेकिन उसकी हार हो गई और वाजपेयी सरकार को जाना पड़ा.
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