इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को 'राइट टू एजुकेशन' (RTE) एक्ट के तहत एडमिशन पाने वाले स्टूडेंट्स का डेटा देने का आदेश दिया है. हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार को पिछले पांच साल का स्कूल-वार डेटा देना होगा. इस डेटा में उन बच्चों की जानकारी शामिल होनी चाहिए जिनका एडमिशन स्कूलों ने मना कर दिया था. साथ ही जिन पर कोई कार्रवाई नहीं की. जस्टिस विनोद दिवाकर ने हाल ही में सेंट जॉन्स स्कूल, बभनौटी, पचवल की ओर से दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई की और इस दौरान ये आदेश दिया है. बेंच ने 15 सितंबर तक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है.
कोर्ट ने क्या कहा
आदेश देते हुए कोर्ट ने कहा कि उसके ध्यान में यह बात आई है कि राज्य से मान्यता प्राप्त कुछ प्राइवेट एजुकेशनल संस्थान बच्चों को एडमिशन देने और आमतौर पर ली जाने वाली फीस और अन्य चार्ज छोड़ने में हिचकिचा रहे हैं. कोर्ट ने कहा, "आरोप सही है या नहीं, इस पर अभी कोई राय नहीं दी जा रही है. आगे जो हलफनामा मांगा गया है, उससे स्थिति साफ हो जाएगी."
"RTE एक्ट, 2009 से छूट नहीं पा सकते"
CBSE, CISCE और अन्य बोर्ड से जुड़े स्कूलों को भी निर्देश दिया कि वे संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी और जिला स्कूल निरीक्षक (DIOS) का सहयोग करें और उन्हें हर जरूरी जानकारी दें. कोर्ट ने साफ कहा है कि यह डेटा सिर्फ पूरी स्थिति जानने के लिए मांगा जा रहा है. जस्टिस दिवाकर ने कहा, "नोटिस दिए बिना और कानून के अनुसार कार्रवाई किए बिना किसी भी संस्थान के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाएगा." हाई कोर्ट ने पहले ही साफ कर दिया था कि उत्तर प्रदेश में CBSE या ICSE से जुड़े प्राइवेट स्कूल RTE एक्ट, 2009 से छूट नहीं पा सकते.
बता दें संविधान के आर्टिकल 21A के तहत 6 से 14 साल के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है. हर किसी को इसका पालन करना होता है.
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