क्या एक गाने की सिर्फ एक लाइन लिखने में पूरा एक साल लग सकता है. सुनने में अजीब लगता है, लेकिन प्रसून जोशी के साथ बिल्कुल ऐसा ही हुआ था. दिल्ली 6 के सुपरहिट गाने अर्ज़ियां की सबसे यादगार लाइन लिखते-लिखते वो कई बार रुक गए, कई बार शब्द बदले, लेकिन बात बन ही नहीं रही थी. फिर एक दिन बचपन की ऐसी तस्वीर उनके सामने उभरी, जिसने पलभर में सब बदल दिया. बाद में अमिताभ बच्चन के सामने कौन बनेगा करोड़पति में उन्होंने ये कहानी सुनाई, तो पता चला कि इस गाने का सबसे खूबसूरत हिस्सा दरअसल एक बुजुर्ग महिला की याद से पैदा हुआ था.
सबसे मुश्किल गाना क्यों था अर्जिया
अमिताभ बच्चन ने जब प्रसून जोशी से पूछा कि सबसे कठिन गाना कौन सा था, तो उन्होंने बिना सोचे अर्ज़ियां का नाम लिया. उन्होंने बताया कि 'अर्ज़ियां सारी' वाली लाइन आखिर में लिखी गई थी, क्योंकि करीब एक साल तक उन्हें समझ ही नहीं आया कि दुआ और भक्ति को ऐसे कैसे लिखा जाए, जो पहले कभी न लिखा गया हो. वो बार-बार लिखते, मिटाते और फिर नई शुरुआत करते रहे, लेकिन मन जैसा एहसास नहीं मिल रहा था.
बचपन की एक याद ने बदल दी पूरी कहानी
प्रसून जोशी ने बताया कि बचपन में वो रामपुर में रहते थे. स्कूल जाते समय रास्ते में एक दरगाह पड़ती थी, जहां उन्हें हर रोज एक बहुत बुजुर्ग महिला दिखाई देती थीं. उनके माथे की गहरी लकीरें उनके मन में हमेशा के लिए बस गई थीं. एक दिन अचानक उन्हें लगा जैसे वो लकीरें दरारें हों और वो कह रही हों, "इनकी मरम्मत कर दो." बस उसी पल उनके मन में "मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला" जैसी लाइन आई और गाने की सबसे बड़ी पहचान बन गई.
रहमान के साथ बना यादगार जादू
जब सही शब्द मिल गए तो प्रसून जोशी ने ए. आर. रहमान से कहा, 'अर्ज़ियां सारी मैं चेहरे पे लिख के लाया हूं. तुमसे क्या मांगूं, तुम खुद ही समझ लो मौला.' रहमान के संगीत और प्रसून जोशी के शब्दों ने मिलकर ऐसा जादू रचा कि साल 2009 में रिलीज हुआ दिल्ली 6 का ये गाना आज भी लोगों के सबसे पसंदीदा सूफी गीतों में गिना जाता है. शायद यही वजह है कि इतने साल बाद भी अर्ज़ियां सिर्फ कानों से नहीं, सीधे दिल से सुना जाता है.
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