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आखिर क्या होता है चौदहवीं का चांद? 66 साल पुराने गाने में रफी की आवाज में गुरुदत्त ने वहीदा रहमान के लिए इस्तेमाल की थी ये लाइन

आखिर क्या होता है चौदहवीं का चांद? 66 साल पहले मोहम्मद रफी की आवाज में ऐसा गाना आया, जिसने महबूबा की खूबसूरती को चांद से कंपेयर करते हुए मोहब्बत की नई भाषा लिख दी. आज भी इस गाने को सुनते ही पुराना रोमांस महसूस होता है.

आखिर क्या होता है चौदहवीं का चांद? 66 साल पुराने गाने में रफी की आवाज में गुरुदत्त ने वहीदा रहमान के लिए इस्तेमाल की थी ये लाइन
66 साल पुराना गाना जिसमें महबूबा की तारीफ में उसको बता दिया चौदहवीं का चांद, जानते हैं इसके मतलब
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नई दिल्ली:

जब कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की तारीफ करता है तो उसकी खूबसूरती में वो चांद का नाम लेता है. चांद की खूबसूरती की तुलना अपनी महबूबा से करने को यादगार बनाया 66 साल पुराने एक गाने ने. जब किसी ने अपनी महबूबा को देखकर चांद जैसा नहीं, बल्कि 'चौंदहवीं का चांद (Chaudhvin Ka Chand)' कह दिया था. क्या आप जानते हैं कि चौंदहवीं का चांद का क्या मतलब होता है? आज हम आपको बताएंगे वो गाना जिसे मोहम्मद रफी (Mohammad Rafi) ने अपनी आवाज की जादू से ऐसा सजाया कि छह दशक बीतने के बाद भी इस गाने की खूबसूरती उसी तरह से बरकरार है.

खूबसूरती के लिए चांद भी कम पड़ गया

हम बात कर रहे हैं साल 1960 में आई फिल्म चौदहवीं का चाँद की, जिसके टाइटल सॉन्ग ने महबूबा की खूबसूरती को चौंदहवी के चांद से जोड़ दिया. गाने के बोल थे 'चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो' इस गाने की शुरुआत महबूबा की खूबसूरती को आसमान की सबसे चमकदार चीज चांद से कर दी गई है.  गाने के बोल शकील बदायूनी ने लिखे थे, जिसमें जुल्फों को कंधों पर झुके बादलों, आंखों को मय का प्याला और चेहरे की झील में खिला कमल कहा गया है. गाने की संगीत रवि ने तैयार किया था और इसमें राग पहाड़ी में तैयार किया गया. मोहम्मद रफी की आवाज ने गाने में रोमांस के साथ एक ऐसी नर्मी को जोड़ा जो इस गाने को फिल्म की सबसे यादगार पहचान बनाता है.

गुरु दत्त और वहीदा रहमान की जोड़ी 

चौंदहवी का चांद फिल्म साल 1960 में आई थी, इसका निर्देशन एम. सादिक ने किया था और इसके प्रोड्यूसर गुरु दत्त साहब थे. फिल्म में गुरु दत्त, वहीदा रहमान, रहमान, मीनू मुमताज और जॉनी वॉकर जैसे कलाकार नजर आए थे. फिल्म की कहानी असलम ( गुरु दत्त), जमीला ( वहीदा रहमान) और नवाब प्यारे मियां के बीच रिश्तों और मोहब्बत के इर्द-गिर्द घूमती है. ये फिल्म गुरु दत्त के करियर की एक सक्सेसफुल फिल्म बनी. इस गाने के लिए मोहम्मद रफी को फिल्मफेयर मिला था. गाने के बोल इस तरह हैं-

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चौदवीं का चाँद हो, या आफताब हो

जो भी हो तुम खुदा की कसम, लाजवाब हो

चौदवीं का चाँद हो...

जुल्फें हैं जैसे काँधों पे बादल झुके हुए

आँखें हैं जैसे मय के प्याले भरे हुए

मस्ती है जिसमें प्यार की तुम, वो शराब हो

चौदवीं का चाँद हो...

चेहरा है जैसे झील में हँसता हुआ कँवल

या ज़िन्दगी के साज़ पे छेड़ी हुई ग़ज़ल

जाने बहार तुम किसी शायर का ख्वाब हो

चौदवीं का चाँद हो...

गाने को वहीदा रहमान और गुरु दत्त पर फिल्माया गया था. वहीदा रहमान की सादगी भरी अदाएं और गुरु दत्त का इजहार और उनकी तारीफ करने के अंदाज ने इस गाने को यादगार बना दिया.
 

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