दर्द भरे हिंदी सिनेमा का बेहद खास हिस्सा रहे हैं. कुछ फिल्मों को तो सिर्फ गानों ने हिट बना दिया. मोहम्मद रफी हिंदी संगीत जगत के ऐसे सिंगर थे, जिन्होंने जो भी गाना आया उसको ही सदाबहार बना डाला. उनका एक दर्दभरा गाना जो कभी पुराना नहीं हो पाया. यह गाना हर पीढ़ी से जुड़ा हुआ है, जो टूटे दिल के दर्द को बयां करता है. हम बात कर रहे हैं 60 साल पुराने गाने 'मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे'. इस गाने को दिग्गज एक्टर धर्मेंद्र पर फिल्माया गया है .
मोहम्मद रफी की आवाज ने किया अमर
यह गाना फिल्म 'आए दिन बहार के' का है. 'मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे' गाने में मोहम्मद रफी की आवाज का दर्द और गुस्सा इतना घुलमिल गया है कि सुनने वाला खुद को धोखा खाए हुए प्रेमी की जगह महसूस करने लगता है. आनंद बख्शी के बोल में छिपा दर्द और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत मिलकर 'मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे' को अमर बनाता है. धर्मेंद्र के चेहरे पर उतरा दर्द इस गाने को सिर्फ सुनने लायक नहीं, महसूस करने लायक बना देता है.
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फिल्म की कहानी
'आए दिन बहार के' में धर्मेंद्र रवि का किरदार निभाते हैं, जो आशा पारेख की कंचन से प्यार करते हैं. रिश्ते में अचानक आए मोड़ और परिवार के रहस्यों के बीच यह गाना धोखे और पीड़ा का प्रतीक बनकर उभरता है. गीत के बोल-'तू फूल बने पतझड़ का, तुझपे बहार न आए कभी'. एक टूटे दिल की सबसे कड़वी बद्दुआ लगते हैं.
फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन
मोहम्मद रफी ने 'मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे' गाने को ऐसी गहराई दी कि हर लाइन दिल में उतर जाती है. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत और आनंद बख्शी के बोल मिलकर इसे सदाबहार बना देते हैं. फिल्म में धर्मेंद्र, आशा पारेख, बलराज साहनी, नाजिमा और सुलोचना लटकर जैसे कलाकारों ने कहानी को जीवंत किया. फिल्म 4 नवंबर 1966 को रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई. यह 1966 की सातवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हिंदी फिल्म रही, जिसका नेट कलेक्शन लगभग 1.25 करोड़ रुपये बताया जाता है.
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