मोहम्मद रफी की आवाज में गाए कई गाने ऐसे हैं, जिन्हें सुनते ही पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं. उनके रोमांटिक गीतों की बात करें तो ‘तुम जो मिल गए हो, तो ये लगता है' आज भी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है. लेकिन इस गाने की कहानी इसकी लोकप्रियता से कहीं ज्यादा दिलचस्प है. इसे बनने के बाद तुरंत दर्शकों तक पहुंचने का मौका नहीं मिला था. यह गीत करीब 9 साल तक रिलीज का इंतजार करता रहा. इतना ही नहीं, इसे तीन अलग-अलग फिल्मों में शामिल करने पर विचार हुआ, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से बात नहीं बन पाई. आखिरकार 1973 में यह गाना फिल्म ‘हंसते जख्म' का हिस्सा बना और रफी की आवाज में अमर हो गया.
‘हकीकत' से शुरू हुई कहानी
इस गीत को संगीतकार मदन मोहन और गीतकार कैफी आजमी ने 1964 में फिल्म ‘हकीकत' के लिए तैयार किया था. गाने की धुन और बोल बेहद खूबसूरत थे, लेकिन आखिरकार इसे फिल्म में जगह नहीं मिल सकी. इस तरह तैयार होने के बाद भी यह गीत दर्शकों तक नहीं पहुंच पाया.
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‘आखिरी खत' में भी नहीं मिली जगह
इसके बाद साल 1966 में चेतन आनंद की फिल्म ‘आखिरी खत' के लिए इस गाने पर विचार किया गया. उस समय मदन मोहन विदेश में थे और फिल्म का काम तेजी से आगे बढ़ रहा था. समय की कमी के चलते एक बार फिर यह गीत फिल्म का हिस्सा नहीं बन सका.
‘हीर रांझा' ने भी किया इनकार
साल 1970 में चेतन आनंद की फिल्म ‘हीर रांझा' के दौरान भी इस गीत को इस्तेमाल करने की चर्चा हुई. हालांकि फिल्म की कहानी और उसके देहाती माहौल के साथ यह आधुनिक अंदाज का गीत सही नहीं बैठ रहा था. इसलिए तीसरी बार भी गाने को फिल्म से बाहर कर दिया गया.
‘हंसते जख्म' ने बदल दी किस्मत
तीन फिल्मों से बाहर होने के बावजूद मदन मोहन ने इस रचना को संभालकर रखा. आखिरकार 1973 में फिल्म ‘हंसते जख्म' में इसे अपनी जगह मिली. नवीन निश्छल पर फिल्माए गए इस गाने को मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी. फिल्म रिलीज होने के बाद यह गीत लोगों की जुबान पर चढ़ गया.
‘तुम जो मिल गए हो, तो ये लगता है' की खासियत सिर्फ इसकी खूबसूरत धुन नहीं, बल्कि कैफी आजमी के भावपूर्ण बोल और रफी की दिल छू लेने वाली आवाज भी है. यही वजह है कि पांच दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी यह गीत रोमांटिक गानों की पसंदीदा सूची में बना हुआ है. बारिश के मौसम से लेकर अकेले सफर तक, इस गाने का जादू आज भी बरकरार है.
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