कभी पश्चिमी घाट के कुछ हिस्सों में मालाबार सिवेट (Viverra civettina) को बहुत आम माना जाता था. 19वीं सदी के मध्य और 20वीं सदी की शुरुआत में लिखे गए ब्रिटिश प्राकृतिक इतिहास के अभिलेखों में इसके नियमित दिखाई देने का ज़िक्र मिलता है. खासकर चाय बागानों, जंगलों के किनारों और ग्रामीण इलाक़ों में. उस समय यह प्रजाति न तो दुर्लभ मानी जाती थी और न ही रहस्यमय. लेकिन आज, वही मालाबार सिवेट भारत के सबसे कम देखे जाने वाले और सबसे ज़्यादा अनिश्चित भविष्य वाली स्तनधारी प्रजातियों में से एक बन चुकी है.
स्मॉल इंडियन सिवेट बनाम मालाबार सिवेट
मालाबार सिवेट पश्चिमी घाट का एक स्थानिक (एन्डेमिक) मांसाहारी स्तनधारी है, यानी यह दुनिया में केवल इसी क्षेत्र में पाई जाती थी. दिखने में यह स्मॉल इंडियन सिवेट से काफ़ी मिलती-जुलती है, लेकिन इसके शरीर के पैटर्न,खोपड़ी की बनावट और कुछ व्यवहारिक विशेषताएं इसे अलग पहचान देती हैं. दुर्भाग्यवश, यही समानता इसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी समस्या बन गई. कई बार स्थानीय लोग और यहां तक कि शोधकर्ता भी इसे स्मॉल इंडियन सिवेट समझकर दर्ज कर लेते हैं, जिससे इसकी वास्तविक स्थिति और भी धुंधली हो जाती है.
1990 के बाद से मालाबार सिवेट का कोई भी पुष्टि-शुदा जंगली अवलोकन दर्ज नहीं किया गया है. इसका अर्थ यह नहीं कि इसके बाद किसी ने इसे देखा ही नहीं, बल्कि यह कि जो भी दावे किए गए, वे ठोस प्रमाणों—जैसे स्पष्ट तस्वीरें, शव या वैज्ञानिक रूप से सत्यापित नमूनों पर खरे नहीं उतर सके. इस बीच, यह प्रजाति इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में 'गंभीर रूप से संकटग्रस्त' (Critically Endangered) के रूप में दर्ज है. कुछ वैज्ञानिक इसे 'संभवतः विलुप्त' भी मानने लगे हैं.
कैसे गायब हो गए मालाबार सिवेट
मालाबार सिवेट के लुप्त होने के पीछे कई कारण माने जाते हैं. सबसे प्रमुख कारण है इसके प्राकृतिक आवास का तेजी से नष्ट होना. पश्चिमी घाट में वनों की कटाई, चाय और कॉफी के बागानों का विस्तार, सड़क निर्माण और शहरीकरण ने इसके रहने की जगहों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया. इसके अलावा, कभी सिवेट की ग्रंथियों से निकलने वाले 'सिवेट मस्क' के लिए इन जानवरों का शिकार भी किया जाता था, जिसका उपयोग इत्र उद्योग में होता था. हालांकि यह व्यापार अब लगभग समाप्त हो चुका है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव इस प्रजाति पर पड़ चुके थे.
दिलचस्प बात यह है कि मालाबार सिवेट का अस्तित्व आज भी संग्रहालयों में सुरक्षित कुछ खालों और खोपड़ियों, पुराने साहित्य और स्थानीय स्मृतियों में दर्ज है. केरल और आसपास के क्षेत्रों में इसके लिए प्रयुक्त कुछ स्थानीय नाम आज भी लोगों की ज़ुबान पर मिल जाते हैं, भले ही उन्होंने इस जानवर को स्वयं कभी न देखा हो. यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि किसी प्रजाति का 'होना' वास्तव में किस पर निर्भर करता है. उसके जीवित रहने पर या हमारे द्वारा उसे पहचानने और दर्ज करने की क्षमता पर?
मालाबार सिवेट की कहानी केवल एक जानवर की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे संरक्षण प्रयासों की सीमाओं को भी उजागर करती है. जब कोई प्रजाति धीरे-धीरे हमारी नज़रों से ओझल होती जाती है, तो वह अचानक नहीं, बल्कि चुपचाप लुप्त होती है. न कोई आख़िरी अलार्म बजता है और न कोई स्पष्ट विदाई मिलती है.आज मालाबार सिवेट शायद जंगलों में कहीं छिपी हुई हो या शायद वह केवल इतिहास के पन्नों में ही शेष रह गई.
डिस्क्लेमर: लेखिका गोवा में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाती हैं. उनकी प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण में गहरी रुचि है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, इससे एनडीटीवी का सहमत होना या न होना जरूरी नहीं है.