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आखिरकार, पश्चिम बंगाल की जनता ने सही फैसला किया

Shantanu Gupta
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 06, 2026 09:27 am IST
    • Published On मई 06, 2026 09:16 am IST
    • Last Updated On मई 06, 2026 09:27 am IST
आखिरकार, पश्चिम बंगाल की जनता ने सही फैसला किया

पश्चिम बंगाल ने आखिरकार एक ऐसा बदलाव देखा है, जिसका इंतजार दशकों से था. भारत में चुनाव आमतौर पर सरकार के कामकाज पर फैसला होते हैं, लेकिन कभी-कभी ये किसी सोच पर भी फैसला बन जाते हैं. 2026 का बंगाल चुनाव ऐसा ही लगता है. यह सिर्फ सरकार बदलने का मामला नहीं है, बल्कि अगर यह बदलाव टिकता है, तो यह एक नई सोच की शुरुआत है. यह उस राजनीति से अलग है, जिसने करीब 70–75 साल तक राज्य को प्रभावित किया.

इस बदलाव को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. लंबे समय तक बंगाल में वामपंथी सोच का असर रहा. यह सिर्फ एक पार्टी नहीं, बल्कि शासन का तरीका बन गया था. इसमें विकास सीमित रखा गया, बड़े उद्योगों को बढ़ावा नहीं दिया गया, और एक ऐसा सिस्टम बना जिसमें सब कुछ राजनीतिक संपर्कों पर निर्भर था. ठेके से लेकर रोजगार तक, सब कुछ पार्टी से जुड़ा था. लोगों के लिए राजनीतिक निष्ठा जरूरी हो गई थी.

अगर कोई विरोध करता था, तो उसे दबाने के लिए राजनीतिक हिंसा का इस्तेमाल होता था. यह कभी-कभार नहीं, बल्कि सिस्टम का हिस्सा था. इससे चुनाव, स्थानीय नियंत्रण और आर्थिक ताकत पर पकड़ बनी रहती थी. धीरे-धीरे इस मॉडल ने बंगाल की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया. जो राज्य कभी उद्योगों का केंद्र था, वहां से निवेश कम होने लगा और युवा बाहर जाने लगे.

2011 में लोगों ने इस व्यवस्था को बदलने का फैसला किया. ममता बनर्जी का उभार एक नई उम्मीद के रूप में देखा गया. उन्होंने कांग्रेस छोड़कर 1998 में अपनी पार्टी बनाई और लंबे संघर्ष के बाद वामपंथ को सत्ता से हटाया. उनका वादा था: बदलाव.

लेकिन यहां एक विडंबना हुई.

वामपंथ सत्ता से तो हट गया, लेकिन उसकी सोच नहीं हटी.

सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने उसी सिस्टम को खत्म नहीं किया, बल्कि कई मामलों में उसे और मजबूत किया. इसका सबसे बड़ा उदाहरण टाटा नैनो प्रोजेक्ट का विरोध था. यह प्रोजेक्ट बंगाल के औद्योगिक विकास के लिए बड़ा मौका हो सकता था, लेकिन इसके हटने से निवेशकों को संदेश गया कि बंगाल अब भी उद्योग के लिए अनुकूल नहीं है. प्रोजेक्ट गुजरात चला गया.

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इसके बाद वही पुराना सिस्टम जारी रहा. राजनीतिक संरक्षण, ठेकों का नेटवर्क और स्थानीय नियंत्रण. राजनीतिक हिंसा भी खत्म नहीं हुई, बस उसका निशाना बदल गया. पहले वामपंथ के खिलाफ और बाद में भाजपा के खिलाफ, जैसे-जैसे वह मजबूत होती गई.

इस कहानी का एक और पहलू भी है.

सत्ता में आने से पहले ममता बनर्जी निष्पक्ष चुनाव, अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई और ज्यादा केंद्रीय बलों की मांग करती थीं. उनका कहना था कि अगर चुनाव बिना डर के हों, तो वामपंथ को हराया जा सकता है. उन्होंने केंद्र में नेताओं के साथ मिलकर यह मुद्दा उठाया था.

लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका रुख बदल गया. जिन चीजों की मांग वे पहले करती थीं, वही बाद में अलग तरीके से दिखने लगीं.

यही वजह है कि 2026 का चुनाव अहम है.

अगर यह सच में बड़ा बदलाव है, तो इसका मतलब है कि बंगाल ने सिर्फ सरकार नहीं बदली, बल्कि एक पुरानी राजनीतिक सोच को भी खारिज किया है. कांग्रेस, वामपंथ और तृणमूल... तीनों अलग होने के बावजूद एक जैसे सिस्टम में काम करते रहे: ज्यादा सरकारी नियंत्रण, राजनीतिक संरक्षण, उद्योगों को लेकर संदेह और हिंसा को सहन करना.

अब पहली बार यह सिलसिला टूटता दिख रहा है.

इसका एक ऐतिहासिक पहलू भी है.

बंगाल हमेशा से अलग-अलग विचारों की जमीन रहा है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेता, जो जनसंघ के संस्थापक थे और आज की भाजपा के वैचारिक आधार माने जाते हैं, यहीं से थे.

1951-52 के पहले आम चुनाव में जनसंघ को सिर्फ तीन सीटें मिली थीं, जिनमें से दो कोलकाता से थीं. इससे साफ था कि बंगाल की राजनीति कभी एक ही सोच तक सीमित नहीं रही. इस बदलाव तक पहुंचने में कई दशक लग गए.

अगर 2026 सच में टर्निंग पॉइंट है, तो यह उस लंबे संघर्ष का नतीजा भी है. यह दिखाता है कि विचार दबाए जा सकते हैं, लेकिन खत्म नहीं होते. लेकिन एक जरूरी बात भी है.

सोच बदलने से अपने आप बेहतर शासन नहीं मिलता. यह सिर्फ एक मौका है.

अब भाजपा के सामने असली चुनौती है. भारतीय राजनीति में अक्सर नई सरकारें पुराने सिस्टम को ही अपना लेती हैं. खतरा यही है कि कहीं वही पुराना ढांचा नए नाम से न चलने लगे. अगर ऐसा हुआ, तो यह इस मौके के साथ गलत होगा.

अगर बंगाल सच में आगे बढ़ना चाहता है, तो बदलाव जमीन पर दिखना चाहिए. उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, राजनीतिक संरक्षण खत्म करना होगा, हिंसा को रोकना होगा और सिस्टम पर भरोसा वापस लाना होगा. बंगाल हमेशा राजनीतिक प्रयोगों की जमीन रहा है. लंबे समय तक यह एक ऐसे ढांचे में फंसा रहा, जहां विकास से ज्यादा नियंत्रण को महत्व दिया गया.

अब जनता ने संकेत दिया है कि वह इससे आगे बढ़ना चाहती है.

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि आखिरकार, बंगाल की जनता ने सही फैसला किया. फैसला तो हो चुका है. लेकिन अब असली परीक्षा शुरू होती है.

(डिस्क्लेमर: लेखक राजनैतिक और चुनाव विश्लेषक हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं. उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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