क्या किसी को कोई शक था
पार्टी के भीतर दुविधा का तो कभी सवाल ही नहीं रहा. उनकी मौजूदा हैसियत अपनी पार्टी के अध्यक्ष से कभी कम नहीं रही. इसका सबूत यह कि पिछले दशक में जितने भी चुनावों में कांग्रेस की हार-जीत हुई, उसकी जीत का श्रेय भी उन्हीं को मिलता रहा और हार का ठीकरा उन्ही के सर फोड़ा जाता रहा. उन्हें कांग्रेस का सर्वेसर्वा बताने में खुद भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी. सो, अब भाजपा के पास फिलहाल राहुल गांधी की हैसियत के खिलाफ कोई तर्क नहीं बचा. इस बार तो प्रियंका को लेकर भी कहीं से आवाज़ उठाए जाने में भी कामयाबी भी नहीं मिल पा रहीं है.
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मौके की तलाश में इतना इंतज़ार
मौका पिछले से पिछले लोकसभा चुनाव यानी 2009 के आम चुनाव के समय भी था. कांग्रेस दोबारा सत्ता में आ गई थी. लेकिन पार्टी में यथास्थिति बनाए रखी गई. अभी तक उस स्थिति का विश्लेषण हुआ नहीं है कि उस समय राहुल के अध्यक्ष बनने में अड़चन क्या थी? क्या यह नहीं कहा जा सकता कि तब कांग्रेस को राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने की जरूरत ही कहां थी. मौजूदा अध्यक्ष सोनिया गांधी की सेहत भी तब ठीकठाक थी. कुछ और याद करें तो राहुल गांधी को उम्र के लिहाज़ से कुछ छोटा बताकर जनता के बीच प्रोपेगंडा करवाए जाने का जोखिम भी था. यह अंदेशा बाद में 2014 के चुनाव में सही निकला. उनकी छवि पर 'अप्पू-पप्पू टाइप' हमले हुए. यानी वह समय भी उनकी छवि के और बेहतर होने के इंतजार का समय था.
मौजूदा राजनीति दृश्यता का खेल है. तब विपक्ष यानी भाजपा ने राहुल गांधी के लगातार दिखते रहने में बड़ी भूमिका निभाई. भीमकाय कांग्रेस को निपटाने के लिए कमज़ोर कड़ी राहुल को समझा गया होगा. लेकिन राहुल गांधी को इसका चमत्कारिक फायदा यह हुआ कि उन्हें चौबीसों घंटे, सातों दिन भाजपा के हमलों का जवाब देने के मौके मिलते रहे. राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के लिए 40 से 50 की उम्र प्रशिक्षण की मानी जाती है. बहुत कम नेता हुए हैं जिन्हें हमले झेलकर दिन पर दिन मज़बूत होने और पटु होने के मौके मिले हों.
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मोदी सरकार के आने के फौरन बाद कांग्रेस पर आरोप लगाए जाने लगे थे कि वह विपक्ष की भूमिका ढंग से नहीं निभा रहा है. इसकी जिम्मेदारी भी राहुल गांधी पर डाली जा रही थी. लेकिन वे 'ठंडेपन' के साथ मोदी सरकार के वादों की याद जनता को दिलाते रहे. दो साल पहले ज्य़ादा हमलावर न होना उनकी कमज़ोरी माना जाता था. लेकिन सरकार पर हमले से जो स्थिति बनाई जाती है वह स्थिति बग़ैर हमले के बन गई. सरकार अपने वादे भुलाने की जितनी कोशिश करती गई, जनता उतनी ही बेचैन होती गई. अब तक की दो ध्रुवीय राजनीति में माहौल कांग्रेस के पक्ष में न बनता तो और क्या सूरत बनती? आखिर में राहुल गांधी की तरफ देखने के अलावा विकल्प ही क्या था.
वीडियो: राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर जाने के बाद विवाद
कांग्रेस में लोकतांत्रिक चुनाव का पहलू
राहुल के पिता राजीव गांधी से लेकर खुद राहुल गांधी तक पार्टी लोकतांत्रिक ढांचे की पक्षधर रही है. भले ही यह आरोप लगते हों कि यह दिखावा भर है, लेकिन कांग्रेस में अंदरूनी लोकतंत्र की दृश्यता को कोई नकार नहीं सकता. उसका तो इतिहास ऐसा है कि इंदिरा गांधी को पार्टी की टूट से जूझकर कांग्रेस को फिर खड़ा करना पड़ा था. इतना ही नहीं, मामला यहां तक है कि कांग्रेस के सत्ता में होने के दौरान विपक्ष की तरफ से मीडिया के ज़रिये हमेशा ही कांग्रेस में अंदरूनी मतभेदों की चर्चा करवाए जाती रही. इतने ज़्यादा हमले करवाए जाते रहे कि यह अकेली पार्टी ही दिखती रही जिसमें कोई अध्यक्ष निर्विवाद रूप से अध्यक्ष नहीं बना. आज भी राहुल के लिए जिस तरह शहजाद पूनावाला बोल रहे हैं, इससे साफ दिख रहा है कि पार्टी में राहुल गांधी की होने वाली ताजपोशी भी निर्विवाद रूप से नहीं हो पा रहा है. राजनीति अपनी प्रकृति से क्रिकेट या फुटबॉल की तरह सिर्फ उसी दिन की घटना नहीं होती. आज भले ही कुछ लोग इसे पार्टी में अंतर्द्वंद्व कहकर उसकी कमज़ोरी का प्रचार कर लें लेकिन क्या आगे चलकर यह बात भी राहुल गांधी के पक्ष में नहीं जाएगी?
सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्त्री हैं...
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