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This Article is From May 12, 2016

अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ेगी सूखे से निपटने की ये नाकामी

Sudhir Jain
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 12, 2016 17:39 pm IST
    • Published On मई 12, 2016 17:35 pm IST
    • Last Updated On मई 12, 2016 17:39 pm IST
देश के उद्योग और व्यापार मंडल यानी एसोचैम ने सूखे के कारण अर्थव्यवस्था के 'भट्ठा' बैठ जाने की चेतावनी दे दी है। एसोचैम के हिसाब से अर्थव्यवस्था पर साढ़े छह लाख करोड़ रुपयेू  का अतिरिक्त बोझ पड़ने का अंदेशा है। दस राज्यों के 33 करोड़ लोगों के लिए रोटी-पानी और इलाज के लिए राहत पर एक माह में एक लाख करोड़ रुपए का खर्च बताया गया है। यह रिपोर्ट संकट की भयावहता को बता रही है। साथ ही यह भी बता रही है कि आने वाले वर्षों में जीडीपी के सारे अनुमान खामाख्याली साबित हो सकते हैं।

सूखा राहत कोष के आकार का अनुमान आसान हो गया
अदालती निर्देश हैं कि केंद्र सरकार को सूखा राहत कोष बनाना चाहिए। अब तक इसका हिसाब ही नहीं लग पाया था कि केंद्र सरकार इस कोष के लिए कितनी रकम निकाले। एसोचैम की रिपोर्ट ने इस काम में  मदद की है। दस राज्यों के 256 जिलों में हाहाकार कर रहे 33 करोड लोगों को राहत के लिए हर महीने एक लाख करोड़ रुपए की राहत चाहिए।  

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महीने भर में संकट गुजर जाने का मुगालता
देश में पानी का संकट देखते-देखते तीन माह गुजर चुके हैं। कई राज्यों से गरीब किसानों और मजदूरों का पलायन बढ़ता ही जा रहा है। इससे शहरों पर एक अलग तरह का संकट आ गया है। इस बारे में हमारे पास कोई अध्ययन और योजना है ही नहीं। सिर्फ एक उम्मीद है कि महीने भर बाद पानी बरसेगा और सब ठीक हो जाएगा। इसके लिए मौसम विभाग के जरिए कहलवाया जा रहा है कि बारिश जल्दी आने वाली है और खूब पानी बरसने वाला है। लेकिन क्या यह अनुमानित खूब बारिश समस्या का समाधान कर देगी? क्या हमने बारिश के पानी का इस्तेमाल करने का इंतजाम कर लिया है।

अगर अच्छी बारिश हुई तो क्या सूरत बनेगी
मौसम विभाग का अनुमान है कि इस बार जल्दी बारिश होगी और अच्छी बारिश होगी। सरकारी अनुमान सामान्य से छह फीसदी ज्यादा बारिश का है। पुराना अनुभव है कि सामान्य वर्षा में भी हम बाढ़ की समस्या से घिर जाते हैं। वैसी सूरत में ज्यादा बारिश क्या गुल खिलाएगी? हमें इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि इस बीच बारिश के पानी को बांधों और तालाबों में रोककर रखने का इंतजाम हीलाहवाली का शिकार हो चुका है। पिछले दो-तीन साल से देश के बड़े बांधों में गाद यानी मिट्टी निकालने तक का काम ढंग से होता नहीं दिखा। यानी अच्छी बारिश के पानी को जमा करने लायक 'बर्तनों' तक का इंतजाम इस साल नहीं हो पाया है। इस तरह अगले महीने अच्छी बारिश में बाढ़ की समस्या खड़ी होने का अंदेशा हमारे सिर पर आकर खड़ा है। केंद्रीय स्तर पर और प्रदेशों के स्तर पर बाढ़ नियंत्रण के जो काम हर साल मई के महीने में शुरू हो जाया करते थे, वे कहीं होते नहीं दिख रहे हैं। क्यों नहीं दिख रहे हैं? इसके मुख्य कारण ये समझ में आ रहे हैं।

अध्ययन, नीतियां और योजनाएं गायब
लगातार दूसरे साल सूखे के बावजूद हमारे पास समस्या को समझने के लिए विश्वसनीय तथ्य एकत्रित नहीं हो पाए। पिछले दिनों में हमने सिर्फ नारे जमा किए। तथ्य होते तो विशेषज्ञ समूह सिफारिशें कर पाते। तब नई जल नीति बन पाती और फिर योजनाएं बन पातीं। वैसे जल विज्ञान के विशेषज्ञ बार-बार इशारा कर रहे हैं कि जल प्रबंधन बड़े खर्च का काम है। जल प्रबंधन की योजनाओं के लिए बजट में पर्याप्त प्रावधान होते तभी कोई योजना बनाने की हिम्मत जुटा पाता।

हालात से निपटने के लिए अभी से जुटना पड़ेगा
भले ही आने वाले दो साल में दिखाने लायक कुछ भी नया करने की गुंजाइश न बची हो लेकिन उसके आगे की भयावह स्थितियों से निपटने के लिए तो अभी से लगना पड़ेगा। मानसून आने के एक महीने पहले हम अच्छी वर्षा की खुशफहमी में रह सकते हैं लेकिन जब बाढ़ की तबाही मचाता हुआ बारिश का पानी समुद्र में वापस जा रहा होगा तब हमारे पास कहने के लिए क्या तर्क होगा। इसीलिए सुझाव है कि इस बीच जल्द ही समस्या से संबधित तथ्यों को जमा करने के काम पर लग जाएं। देर भले हो गई हो लेकिन आगे के बड़े संकट से बचने के लिए इसके अलावा कोई चारा है नहीं....।  

(सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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